10 अप्रैल 2010

परमात्मा का साक्षात्कार

आत्मा के बारे में जानें ?  आत्मा आकाश की तरह सूक्ष्म तथा सर्वत्र समाया हुआ है । आत्मा के स्वरूप का ज्ञान होने पर जीव अपने जीव होने के भाव को छोङ देता है । इसे ( आत्मा ) जानकर जीव का स्वभाव आत्मा के समान न जनमने वाला न मरने वाला अविनाशी भाव हो जाता है । अविवेक अनित्य है । यानि ज्ञान होने पर नष्ट हो जाता है । ज्ञान विज्ञान आत्मा के ही अधीन है । जिस प्रकार सर्व व्यापक आकाश में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संगत पाता है । उसी प्रकार आत्मा भी आकाश की तरह इससे भी अति सूक्ष्म है । बिना आत्मा की संगति के शरीर चेष्टा नहीं पाता । आत्मा अपनी इच्छा से ही सिमट जाती है । शरीर का अस्तित्व नहीं रहता । शरीर के द्वारा ही वह ज्ञान करता है । ध्यानावस्था में सुरति के द्वारा स्वर में शब्द को पूरक कुम्भक रेचक स्थिति को पा जाता है । फ़िर कुछ देर का अभ्यास वर्ण वाले शब्द को पार करके बिन्दु रूप में पहुँच जाता है । बिन्दु रूप में पहुँच कर वह बिन्दु परमात्मा में संगत पाता है । इसलिये बिन्दु के द्वारा ब्रह्म में मिलकर उस परमात्मा का साक्षात्कार करता है । साधक इन्द्रियों को एकाग्र कर लेता है । तथा सुषमणा में प्रवेश करता है । तब सूक्ष्म शरीर सुषमणा से ब्रह्मरन्ध्र में होता हुआ शरीर में ऊपर दसवें द्वार होकर आत्मा में लीन हो जाता है । इन्द्रियों के सब दरवाजे बन्द करें । तब तन मन अन्दर ही जम जायेगा । तथा दबाया हुआ मन ह्रदय में ही पङा रहेगा । तब प्राण के द्वारा अक्षर का ध्यान करना चाहिये । जो प्राण तथा प्राण के परे भी है । फ़िर ब्रह्मरन्ध्र से होता हुआ ध्यान को ऊपर की ओर ले जाकर परमात्मा में स्थिर कर दें । जो परमात्मा सर्वत्र सर्व शक्तिमान प्रकाश स्वरूप आनन्द का भंडार है । ऐसी स्थिति में योगी सुषमना से शब्द में मिलकर शरीर से निकल जाता है । तथा परमात्मा का साक्षात्कार करता है ।
साधक जब ध्यानावस्था में स्थिति होकर अन्तःकरण को प्राण के समान सूक्ष्म तथा स्वच्छ बना लेता है । तब वह वाणी से परावाणी का प्रत्यक्ष अनुभव कर उसमें लीन हो जाता है । उस परा में लीन होने पर वह एक ऐसी शक्ति का अनुभव करता है । जिसकी शक्ति से सारे संसार के जीव अपनी क्रिया कर रहे हैं । तथा प्रकृति भी क्रीङा करती हुयी इसी जगत  में दिखायी देती है । यह सारे काम परमात्मा की सत्ता में ही क्रियावान है । साधक सुरति से परा शब्द का बोध करता है । तो वह परा में प्रवेश होकर आत्मा का साक्षात्कार करता है ।.
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