10 अप्रैल 2010

परमात्मा का अनुभव । ध्यान । सुमरन । चिन्तन ।


अविनाशी अक्षर क्या है ?? वह शब्द ( जो वास्तव में ध्वनि रूप है । और अनादिकाल से निरन्तर हो रहा है । ) जो सम्पूर्ण बृह्माण्ड में स्पंदन करता है । और सारी सृष्टि में समाया हुआ है । वह अविनाशी अक्षर ही स्वांस की आने जाने की क्रिया को चलाता है । तथा प्राण का कारण रूप है । परमात्मा का अनुभव । ध्यान । सुमरन । चिन्तन । सुरति ( मन । बुद्धि । चित्त । अहम । ये अंतकरण के चार छिद्र होते हैं । इनको योग विधि द्वारा एक कर दिया जाता है । तब ये सुरति कहलाती है । )  द्वारा किया जाता है । जब सुरति अक्षर ( एक ध्वनि । जो अखन्ड रूप से अंतर आकाश में गूंज रही है । जिसकी वजह से ही प्रत्येक चीज का निरन्तर क्षरण और निर्माण होता है । जैसे किसी बालक का बढना और साथ ही साथ वृद्धावस्था की और जाना । अक्षर से ही होता है । संसार की धुनों में इसके समान वैसे कोई ध्वनि है तो नहीं । पर ये बहुत कुछ झींगुर की आवाज से मिलती जुलती होती है । )  में पूर्ण रूप से पहुँच जाती है । तब वह अक्षर से प्राण में । और प्राण से सूक्ष्म भूमा में पहुँच जाता है ।
भूमातत्व का उदाहरण - नींद में स्वप्न में आनन्द । इन्द्रियों का आत्मबोध ।
साधक इन्द्रियों को स्थिर कर प्राण में अक्षर को जानता है । अक्षर की संगत से वह बार बार अक्षर में ध्यान करता है । तब अक्षर के घर्षण से भूमानन्द का अनुभव होता है । वह भूमा आत्मा ही प्रथम पाद है ।
आकाश अणुओं से भरा पङा है । सुई की नोक के बराबर खाली स्थान नहीं है । उदाहरण - सूर्य के प्रकाश में दिखने वाले अणु परमाणु आदि । जिस प्रकार वाष्प से बिन्दु बनता है । बिन्दु से ध्वनात्मक शब्द उत्पन्न होता है । तथा ध्वनात्मक से " हँसो " वर्ण का रूप धारण कर लेता है । जब प्राण से प्राण टकराता है । तब एक झीना शब्द प्रकट कर लेता है । आकाश अक्षर में स्थित है । आकाश का सूक्ष्मतत्व । शब्द । शून्यता । चिन्ता । मोह । संदेह । ये सारे गुण आकाश के ही हैं  । जीव अपने को कर्ता मानता हुआ कार्य करता है । इसलिये उसे उसका भोग मिलता है  । आत्मसुख में बाधा डालने वाली ये विषय वासना ही है । जब अभ्यास से जीव बैराग्य को प्राप्त करता है । और प्राण में प्राण को होम करता है । तो  प्राण सूक्ष्म होने लगता है । जो कि अभी ( साधारण स्थिति में ) स्थूलता को प्राप्त है ।
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