06 अप्रैल 2010

समझ लेना तुम । तुम्हारी ही मृत्यु के कारण बन रहे हो

इस संसार में जितना सेक्स को बुरा कहा गया । उतना ही आंतक, अराजकता, अनैतिक का जन्म हुआ है । यह मेरा निजी भी अनुभव है कि जब भी बीज रोपते हैं । तो उस वक्त जो वर्तमान में जो स्थिति है । वो ही विचार पैदा होता है । उस बीज में वही संस्कार आ जाते हैं ।
जिसने भी लड़ते झगड़ते मारपीट कर या नशा करके जो भी भोग या सेक्स में उतरेगा । समझ लेना तुम । तुम्हारी ही मृत्यु के कारण बन रहे हो । जब बीज जो आचार विचार आपके द्वारा उसमें गये हैं । बस वो ही तुम ही हो । तेरे बिना मैं पैदा भी नही हो सकता है । और मैं ही तुम हो । तुम ही बेटा हो । तुम ही बाप हो । तो जो युवा है । वो जरुर जीवन को जानें ।  पर आने वाला ही तुम उसके साथ जीवन सुंदर बने । जीवन को जानो । और जीवन साथी को भी जानो । और मिटा दो । अपने अंहकार को । और प्रेम देना शुरू करो । लेना नही । हर छोटी सी बात को अपने अंदर नहीं रखना । हर शब्द को पकड़ना नहीं है । अपने आप नहीं सताना है । अपने लिए जिओ । अपने से मित्रता पैदा करो । तो पूरे घर और मोहल्ला और देश में भी प्रेम फ़ैलेगा ।
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हसीबा खेलीबा धरीबा ध्यानम - मूर्ख दूसरों पर हंसते हैं । बुद्धिमत्ता खुद पर - ओशो ।
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27 अक्टूबर 1986 सुमिला । आपके नाम के साथ सेक्स गुरु और अमीरों के गुरु आदि भ्रांति पूर्ण विशेषण क्यों जुड़े हुये हैं ? 
ओशो - हर्षिदा ! यह बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय साज़िश है । हिटलर का यह पुराना फार्मूला है कि झूठ को यदि बारबार दोहराया जाये । तो वह सच मालूम होने लगता है । अब मेरे प्रवचनों को लेकर अब तक 400 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । और उनमें से एक है - संभोग से समाधि । और उन पुस्तक में छपे मेरे पाँच प्रवचनों का सार यही है कि तुम सेक्स से कैसे मुक्त हो सकते हो ? उसका कैसे अतिक्रमण कर सकते हो ? वह किताब सेक्स के बारे में कुछ ऐसी जानकारी नहीं देती । जो सेक्सुअल हो । अश्लील हो । यदि ऐसा होता । तो उस किताब पर सरकार तुरन्त प्रतिबंध लगा देती । अब जिन धर्म गुरुओं की मैं आलोचना करता था । उन्होंने पुस्तक के नाम को मेरे विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुये मुझे " संभोग से समाधि वाला बाबा " कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया । अब उनके भी अनुयायी तो हैं ही । और वह अनुयायी बड़े बड़े राजनेता और पूंजीपति हैं । जो अखबारों के मालिक हैं । सारी दुनियां में उन्होंनें मुझे सेक्स गुरु के नाम से प्रचारित कर दिया । अब यही बात मेरे धनियों का गुरु होने के संबंध में भी है । मैंने बारबार कहा है कि - धन की व्यर्थता का बोध होने पर अंतर्यात्रा प्रारम्भ होती है । और जिनके पास धन है । केवल उन्हीं को धन की व्यर्थता दिखाई देती है । भूखे व्यक्ति को पहले परमात्मा नहीं । रोटी चाहिये । भूखे व्यक्ति को ध्यान सिखाने से लाभ क्या ? मैं तो चाहता हूँ । देश समृद्ध हो । संसार समृद्ध हो । गरीबी जड़ मूल से समाप्त हो । क्योंकि दुनिया में जितनी अधिक सम्रद्धि होगी । हम अध्यात्म की प्यास उतनी ही अधिक बढ़ा सकते हैं । अब यदि इसका यह अर्थ निकाला जाय कि मैं धनपतियों का गुरु हूँ । और उनके पास प्रचार के साधन हों । तो वह दुनिया भर में यह झूठ फैला देते हैं । और मैं अकेला आदमी हूँ । जो पूरी दुनिया से लड़ रहा हूँ । लेकिन झूठ के पास चाहे जितनी ताकत हो । पर सत्य के आगे झूठ नपुंसक है । झूठ के पैर नहीं होते । मैं इनका खंडन इसलिए नहीं करता । क्योंकि झूठ संतति नियमन के सिद्धांत को नहीं मानता । मेरे उर्जावान सत्य के साहसी युवक युवतियों और सृजनशील सम्रद्ध लोगों का जो प्रवाह आकर्षित हो रहा है । उसे देखकर ये लोग ईर्ष्या से भर गये हैं । और उनके पास उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं है । मैं मानव कल्याण के अन्य श्रेष्ठतम कार्यों में व्यस्त हूँ ।
मेरे प्रति प्रचारित असत्य । अपनी मौत आप मरेंगे ।
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मुझसे बारबार पूछा जाता रहा है कि - मैं लोगो को तभी संबुद्ध घोषित करता हूँ । जब वह अपना शरीर छोड़ देते हैं । यह केवल इसलिये है । जिससे कम्यून में शांति बनी रहे । यदि मैं किसी को संबुद्ध घोषित कर दूं । तो तुम उसे जीने नहीं दोगे । तुम यह सहन नहीं कर पाओगे कि यह व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया । तुम उसमें हज़ार कमियां खोज लोगे । तुम ईर्ष्या से भरकर उसकी निंदा करोगे । उसके जीवन के गड़े मुर्दे उखाड़कर तुम अपने आपको उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने का जी तोड़ प्रयास करोगे । तुम कहोगे । वह तो अभी नया शिष्य है । मुझे तो संन्यास लिये उससे दस वर्ष अधिक हो गये । मैंने उससे अधिक ध्यान किया है । मैं उससे अधिक शिक्षित और समझदार हूँ । तुम ईर्ष्या से भरकर महत्वाकांक्षा की दौड़ में शामिल हो जाओगे । तुम अपनी अंतर्यात्रा की बात भूल ही जाओगे । मैंने रजनीशपुरम में प्रयोग के रूप में कुछ लोगो की बुद्धत्व को उपलब्ध होने की घोषणा की थी । उस सूची में मैंने जानबूझ कर ऐसे कई नाम सम्मलित कर दिये गये थे । जो स्वयं भी जानते थे कि बुद्धत्व घटना तो दूर वे अभी तक ध्यान की गहराई में भी नहीं उतरे हैं । उनका मन महत्वाकांक्षा से भरा हुआ है । वे सहज, सरल और निर्दोष नहीं थे । उनमें अधिकतर ऐसे लोग सम्मलित थे । जिनका नाम यदि सूची में सम्मलित न किया जाता । तो वे ईर्ष्या से भरकर कुछ भी कर सकते थे । ऐसे लोगों ने अपने सम्मान में स्वयं पैसे खर्च कर स्वागत समारोहों का आयोजन शुरू कर दिया । वे अकड़ कर चलने लगे । आज संन्यासी भी उनके चरण स्पर्श कर अपने को धन्य मानने लगे । पर जिन्हें बुद्धत्व सचमुच घटा था । वे लोग जैसे पहिले रहते थे । वैसे ही शांत निरासक्त और मौन रहे ।
उनमें से एक मैत्रय जी भी थे । जब लोग उनके चरण स्पर्श करने लगे । उन्होंने अपने पैर समेटते हुये कहा था - मुझे कुछ भी नहीं घटा । भगवान तो ऐसे मज़ाक करते ही रहते हैं । यह भी उनका एक मज़ाक है । मैं जैसा पहले था । वैसा अब भी हूँ । लोग हैरान रह गये यह सुनकर । जिनके नाम उस सूची में सम्मलित नहीं थे । और उन्हें यह भ्रम था कि उन्हें कुछ घटा है । उन लोंगो ने कई तरह से मुझे लिखकर या किसी और के द्वारा यह जताने की कोशिश की कि वे सम्बुद्ध हैं । और उनका नाम सूची में मैं शायद शामिल करने से भूल गया हूँ ।
किसी जीवित व्यक्ति को संबुद्ध घोषित करने से । यदि कोई उसके प्राण न भी ले । फिर भी उसके लिये कई परेशानियां खड़ी हो जायेंगी ।
अब यदि वह सिगरेट पी रहा है । या बियर की चुस्कियां लगा रहा है । तो लोग उसे टोकेंगें - यह कैसा बुद्ध पुरुष है ? उसे शर्म आयेगी । मेरे जर्मन संन्यासी तो बिना बियर के रह ही नहीं सकते । वह उसका प्रयोग पानी की तरह करते हैं । वह उनकी जीवन शैली का एक अंग बन गई है । उनके लिये तो बियर की ख़ास छूट देनी ही होगी । अब बुद्धत्व को उपलब्ध मेरे संन्यासी लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये उनके अनुशासन से नहीं चलने वाले हैं । वे अपने छंद से जियेंगे । मैं नहीं चाहता कि तुम्हें शर्म का अनुभव करना पड़े । अच्छा है । तुम संबुद्ध होने की कोशिश कर रहे हो । राह में हर चीज़ का रस और मज़ा लो । जब तुम आराम से कब्र में लेटे होगे । मैं तुम्हें संबुद्ध घोषित कर दूंगा । फिर तुम्हें सिगरेट, बियर और प्रेमिकाओं के कारण न कोई परेशान कर सकता है । और न तुम्हें शर्म का अनुभव होगा । तुम कब्र में अधिक से अधिक करवटें ही तो बदल सकते हो ।
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