10 अप्रैल 2010

जिसे पाने के लिए सारा संसार दौड़ रहा है

तुम परमात्मा का आश्रय किसलिए खोजते हो । कभी तुमने ख्याल किया ? कभी विश्लेषण किया ? परमात्मा का भी आसरा तुम किन्हीं वासनाओं के लिए खोजते हो । कुछ अधूरे रह गये हैं - स्वप्न । तुमसे तो किये पूरे नहीं होते । शायद परमात्मा के सहारे पूरे हो जायें । तुम तो हार गये । तो परमात्मा के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाने की योजना बनाते हो । तुम थक गये । और गिरने लगे । अब तुम कहते हो - प्रभु ! अब तू सम्हाल । असहाय का सहारा है तू । दीन का दयाल है तू । पतित पावन है तू । हम तो गिरे । अब तू सम्हाल । लेकिन अभी सम्हलने की आकांक्षा बनी है । इसे अगर गौर से देखोगे । तो इसका अर्थ हुआ । तुम परमात्मा की भी सेवा लेने के लिये तत्पर हो अब । यह कोई प्रार्थना न हुई । यह परमात्मा के शोषण का नया आयोजन हुआ । वासना तुम्हारी है । वासना की तर्पित की आकांक्षा तुम्हारी है । अब तूम परमात्मा का भी सेवक की तरह उपयोग कर लेना चाहते हो । अब तुम चाहते हो । तू भी जुट जा मेरे इस रथ में । मेरे खिंचे नहीं खींचता । अब तू भी जुट जा । अब तू ही जुटे । तो ही खींचेगा । 
हालांकि तुम कहते बड़े अच्छे शब्दों में हो । लफ्फाजी सुन्दर है । तुम्हारी प्रार्थनाएं । तुम्हारी स्तुतियां । अगर गौर से खोजी जायें । तो तुम्हारी वासनाओ के नये नये आडंबर हैं । मगर तुम मौजूद हो । तुम्हारी स्तुति में तुम मौजूद हो । और तुम्हारी स्तुति परमात्मा की स्तुति नहीं । परमात्मा की खुशामद है । ताकि किसी वासना में तुम उसे संलग्न कर लो । ताकि उसके सहारे कुछ पूरा हो जाये । जो अकेले अकेले नहीं हो सका । ज्ञानी वही है । जिसने जागकर देखा कि पाने को यहाँ कुछ भी नहीं है । जिसे हम पाने चले हैं । वह पाया हुआ है । फिर आश्रय की भी क्या खोज ? फिर आदमी निराश्रय निरालंब होने को तत्पर हो जाता है । उस निरालंब दशा का नाम ही सन्यास है । अष्टावक्र महागीता
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प्रेम एक रासायनिक घटना है । यदि किसी का ह्रदय भी तुम्हारी ओर प्रवाहित हो रहा है । तो ह्रदय के द्वारा परमात्मा ही तुम तक आ पहुंचा है । किसी ने प्रेम भरी चितवन से तुम्हे निहारा । उस क्षण परमात्मा ने ही तुम्हारी ओर अपनी दृष्टि उठाई है । जरा उन प्रेम भरी आंखों की झील में देखो । वहाँ प्रेम ही प्रेम छलक रहा है । और तुम वहाँ हर धडकन में परमात्मा को धडकता पाओगे । क्योंकि जो हमेशा प्रेम करता है । वह परमात्मा ही तो है । प्रेम करना । परमात्मा ही बन जाना है । प्रेम घटने की अनुमति देना ही परमात्मा बन जाना है - ओशो ।
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आदमी सुखी हो सकता है । अगर वह प्रतिपल, जो उसे मिल रहा है । उसे पूरे अनुग्रह से और पूरे आनंद से आलिंगन कर ले । सांझ फूल मुरझाएगा । अभी तो फूल जिंदा है । सांझ की चिंता अभी से क्या ? जब तक फूल जिंदा है । तब तक उसके सौंन्दर्य को जीया जा सकता है । और जिस व्यक्ति ने जिंदा फूल के सौन्दर्य को जी लिया । वह जब फूल मुरझाता है । और गिरता है । तब वह दिन भर के सौन्दर्य से इतना भर जाता है कि फूल की संध्या और गिरती हुई पंखुड़ियां भी फिर उसे सुंदर मालूम पड़ती हैं । आंख में सौन्दर्य भर जाए । तो पंखुड़ियों का गिरना पंखुड़ियों के खिलने से कम सुंदर नहीं है । और आंख में सौंन्दर्य भर जाए । तो बचपन से ज्यादा सौन्दर्य बुढ़ापे का है । लेकिन जीवन भर दुख से गुजरता हो । तो सांझ भी कुरूप हो जाती है । सांझ कुरूप हो ही जाएगी । वह जिंदगी भर का जोड़ है ।
मैं समझ पाता हूं कि अगर एक नया मनुष्य पैदा करना है । जो कि नये समाज के लिए जरूरी है । तो हमें क्षण में सुख लेने की क्षमता और क्षण में सुख लेने का आदर और अनुग्रह और ग्रॅटीट्यूड पैदा करना पड़ेगा । हमें यह कहना बंद कर देना पड़ेगा कि सांझ फूल मुरझा जाएगा । सांझ तो सब मुरझा जाएंगे । सांझ तो आएगी । लेकिन सांझ का अपना सौंन्दर्य है । सुबह का अपना सौन्दर्य है । और सुबह के सौन्दर्य को सांझ के सौन्दर्य से तुलना करने की भी कोई जरूरत नहीं है । जिंदगी का अपना सौन्दर्य है । मृत्यु का अपना सौन्दर्य है । दीये के जलने का अपना सौन्दर्य है । दीये के बुझ जाने का अपना सौन्दर्य है । चांद की रात ही सुंदर नहीं होती । अंधेरी अमावस की रात का भी अपना सौम्दर्य है । और जो देखने में समर्थ हो जाता है । वह सब चीजों से सौन्दर्य और सब चीजों से सुख पाना शुरू कर देता है ।
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हंत का एक अर्थ और भी है । जो बड़ा कीमती है । हम तो इसका एक ही तरह से उपयोग करते हैं साधारण भाषा में । जब कोई आदमी अपने को मार लेता है । तो हम कहते हैं - आत्महंता । हंत का अर्थ होता है । जिसने अपने को मिटा लिया । जिसने अपने को समाप्त कर दिया । जिसके भीतर " मैं " न रहा । जिसके भीतर अहंकार न रहा । जिसने अपने को बिलकुल समाप्त कर दिया । जिसने अपनी कोई रूप रेखा न बचायी । नाम पता न छोड़ा । जो शून्यवत हुआ । जो महा शून्य हुआ । निर्वाण को उपलब्ध हुआ ।
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कुछ है तुम्हारे भीतर । जिसका तुम्हें भी पता नहीं । तुम उसे भूल रहे हो । तुम अनजान बने घूम रहे हो । बस कुछ करने की जरूरत नहीं है । बस उसे फलने दो । उसे उगने दो । एक सूरज है वो । जो तुम्हारी उर्जा को चमका देगा । जिसके अनन्त आनन्द का बोध तुम्हें होगा ।
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तुम्हारा मिलन भगवान से कभी न हो सकेगा । तुम जब तक खोजते रहोगे । तब तक भटकते रहोगे । क्योंकि तुम जब तक खोजते रहोगे । तुम तुम ही बने रहोगे ।
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अहंकार ही कठोरता को पहचानता है । जहां अहंकार खो गया । वहां तो सिर्फ महा करुणा ही ज्ञात होती है । वहां तो गुरु गरदन पर तलवार भी रख दे । तो फूलों का हार ही रखा हुआ मालूम होता है । वहाँ तो गुरु मार भी डाले । तो भी शिष्य मरने को तत्पर होता है । क्योंकि गुरु के हाथ से मौत । इससे शुभ और क्या होगा ? इससे महाजीवन और क्या हो सकता है ? यह तो गुरु की महा अनुकंपा है कि वह गरदन को अलग कर दे । तो तुम पिंजरे से मुक्त हो जाओ । अगर मृत्यु भी दे गुरु । और अहंकार न हो । तो करुणा का दर्शन होगा । और अगर अहंकार हो । और गुरु महाजीवन भी देता हो । तो भी संदेह उठेंगे ।
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आश्चर्य प्रभु ! जनक कहने लगे अष्टावक्र से कि जिसे पाने के लिए सारा संसार दौड़ा जा रहा है । जन्मों जन्मों की यात्रा चल रही है । अनंत की खोज चल रही है । अनंत से चल रही है । उसे पाकर भी, उस सिंहासन पर विराजमान होकर भी योगी में हर्ष का भी पता नहीं होता । वह वहाँ भी साक्षी बना रहता है । उसका साक्षी भाव वहां भी नहीं खोता । जरा भी तरंग उठती नहीं । आकाश उसका कोरा का कोरा रहता है । न दुख के बादल । न सुख के बादल । बादल घिरते ही नहीं ।
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तुमने देखा । चूल्हा जलाते हो । धुआं उठता है । धुआं आकाश में फैलता है । लेकिन आकाश को गंदा नहीं कर पाता । न छूता । इतने बादल उठते हैं । सब धुआं हैं । फिर फिर खो जाते हैं । कितनी बार बादल उठे हैं । और कितनी बार खो गये हैं । आकाश तो जरा भी मलिन नहीं हुआ । न तो शुभ्र बादलों से स्वच्छ होता है । न काले बादलों से मलिन होता है ।
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अज्ञानी जगत को गंभीरता से लेता है । ज्ञानी हंसकर लेता । बस, उतनी मुस्कुराहट का फासला है । पत्नी मर जाती है । तो अज्ञानी भी उसे मरघट तक छोड़ आता है । लेकिन रोता, चीखता, चिल्लाता । ज्ञानी भी मरघट तक छोड़ आता । एक खेल पूरा हुआ । एक नाटक समाप्त हुआ । पर्दा गिरा । रोने, चीखने, चिल्लाने जैसा कुछ भी नहीं है । भीतर वह साक्षी ही बना रहता है । द्रष्टा भाव उसका क्षण भर को नहीं खोता । इतना ही भेद है ।
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पहला सूत्र । जनक ने कहा - हंत, भोग लीला के साथ खेलते हुए आत्म ज्ञानी धीर पुरुष की बराबरी संसार को सिर पर ढोने वाले मूढ़ पुरुषों के साथ कदापि नहीं हो सकती है । पहला शब्द है - हंत ! उसमें सारी श्रद्धा उंडेल दी । हंत बड़ा प्यारा शब्द है । जैनों में उसका पूरा रूप है - अरिहंत । बौद्धों में उसका रूप है - अर्हत। हिंदू संक्षिप्त " हंत । का उपयोग करते हैं । हंत का । अरिहंत का । अर्हत का अर्थ होता है - जिसने अपने शत्रुओं पर विजय पा ली । काम, क्रोध, लोभ, मोह, भोग, त्याग, इहलोक, परलोक । जिसने अपनी समस्त आकांक्षाओं पर विजय पा ली । जो निष्कांक्षा को उपलब्ध हुआ है । वही है - अरिहंत ।
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जनक कहते हैं - उस पद को जानने वाले का अंतःकरण ऐसे ही हो जाता है । जैसे - आकाश ।
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पत्नी की अंग्रेजी - घोंचू लाल अपनी पत्नी को अंग्रेजी का प्रशिक्षण दे रहे थे । दोपहर में उनकी पत्नी ने कहा - यह लो डिनर ।
घोंचू लाल - पागल, यह डिनर नहीं लंच है ।
पत्नी - पागल होगा तू । यह कल रात का बचा खाना है ।
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Universal Truth -  Kaamyabi TOILET  Ki smell ki tarah hoti hai .
Bardasht tabhi hoti hai, Jab apni hoti hai...
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सच्ची हंसदीक्षा वाले अपने पूर्व जन्म के संस्कार कर्म फ़ल और शिष्यता के कष्ट के अतिरिक्त हर प्रकार के दैहिक दैविक भौतिक तापों से परे हो जाते हैं । आम जीवात्मा वाले प्रभाव उन पर नहीं होते ।
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