18 सितंबर 2016

एक दिन साहिब बेनु बजाई

विदेही ‘हंस’ से कृमशः ‘कैवल्य’ फ़िर एक छोटे दाल के गोल दाने बराबर ‘महाकारण’ उसके बाद अंगूठे के आधे पोरुवे के बराबर ‘कारण’ तथा इसके भी बाद अंगूठे के ही बराबर आकार और बनावट वाला ‘सूक्ष्म’ शरीर (जिसकी ही कारण वासनाओं/कल्पनाओं से स्थूल प्रकट हुआ है) तथा उसके उपरान्त प्रत्येक मनुष्य का (स्वयं के हाथ माप अनुसार) साढ़े तीन हाथ का यह ‘स्थूल’ शरीर ही वास्तव में ‘ब्रह्म से जीव’ तक की यात्रा है ।
इनके स्थान और उदय होने का कृम ठीक से समझ लेने पर तथा स्वांस की उत्पत्ति और फ़िर प्राण वायु में

मिलकर प्रसार को भलीभांति जान लेने पर निज स्वरूप आत्मा या परमात्मा को जानने का मार्ग या तरीका बेहद सरल हो जाता है । क्योंकि जिस कृम में जीव की विदेही हंस से देही स्थूल तक की यात्रा हुयी है । कृमशः ठीक इसके विपरीत कृम में चलने पर वह वापस फ़िर विदेही और आनन्ददायक, जन्म मरण रहित अवस्था में पहुँच जाता है ।
यदि आप चित्रों का सही अध्ययन कर लेते हैं । तो अब तक प्रकाशित चित्रों में इस गूढ़ रहस्य को बेहद आसान कर दिया गया है । शेष साहिब की कृपा पर भी निर्भर है ।
जेहि जानहि जाहि देयु जनाई । जानत तुमहि तुमही होइ जाई ।
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बस थोङा बुद्धि पर जोर दें । और अबूझ रहस्य पायें ।

दो सुर चलै सुभाव सेती । नाभी से उलटा आवता है ।
बीच इंगला पिंगला तीन नाङी । सुषमन से भोजन पावता है ।
पूरक करै कुम्भक करै । रेचक करै झरि जावता है ।
कायम कबीर का झूलना जी । दया भूल परे पछितावता है ।
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इससे भी ज्यादा सरलता से क्या बताया जा सकता है ? 

मुरसिद नैनों बीच नबी है ।
स्याह सफ़ेद तिलों बिच तारा । अविगत अलख रबी है ।
आँखी मद्धे पाँखी चमकै । पाँखी मद्धे द्वारा ।
तेहि द्वारे दुर्बीन लगावै । उतरै भौजल पारा ।
सुन्न सहर में बास हमारी । तहँ सरबंगी जावै ।
साहेब कबीर सदा के संगी । सब्द महल ले आवै ।
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कबीर साहिब का यह बेहद गूढ़ मगर मनोरंजक और एक अदभुत रहस्य कहने वाला पद मुझे बहुत पसन्द है । फ़िर भी इसे मैंने पहली बार प्रकाशित किया है । तो खोजिये इसमें क्या रहस्य है ?

एक दिन साहिब बेनु बजाई ।
सब गोपिन मिल धोखा खाई । कहैं जसुदा के कन्हाई ।
कोई जंगल कोई देवल बतावैं । कोई द्वारिका जाई ।
कोई अकास पाताल बतावैं । कोई गोकुल ठहराई ।
जल निर्मल परबाह थकित भै । पवन रहे ठहराई ।
सोरह बसुधा इकईस पुर लौं । सब मूर्छित होइ जाई ।
सात समुद्र जवै घहरानो । तैतीस कोटि अघानो ।
तीन लोक तीनों पुर थाके । इन्द्र उठो अकुलानो ।
दस औतार कृष्ण लौं थाका । कुरम बहुत सुख पाई ।
समुझि न परो वार पार लों । या धुन कहँ ते आई ।
सेसनाग औ राजा वासुक । वराह मुर्छित होइ आई ।
देव निरंजन आद्या माया । इन दुनहिन सिर नाई ।
कहें कबीर सतलोक के पूरूष । सब्द केर सरनाई ।
अमी अंक ते कुहुक निकारी । सकल सृष्टि पर छाई ।
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