20 सितंबर 2016

मजनूं - एक विशुद्ध प्रेम

कुछ ही पुराने समय में मजनूं नाम का एक मनुष्य हुआ है । इसकी प्रेम दीवानगी के चलते इसे ‘प्रेमियों का राजा’ कहकर पुकारा गया है । कहते हैं मजनूं के समान किसी ने प्रेम नही किया । लेकिन प्रेम मार्ग की कठिन असफ़लताओं और अति दुश्वारियों ने उसका मानसिक सन्तुलन ही बिगाङ दिया । वह विक्षिप्तों के समान ही उन्मत्त हो गया और अपनी प्रेमिका लैला की चाह में माता पिता, घर द्वार आदि त्याग कर वन वन भटकने लगा ।
वह खिले गुलाब के फ़ूल में लैला को देखता । दौङकर उसके पास जाता । और लैला जान कर बातें करता । वह सरु वृक्ष cypress को लैला समझ कर प्यार करने लगता । हिरन आदि में वह अपनी प्रेयसी की झलक देखता । और दीवाना होकर दौङ जाता । 
हर जगह हर क्षण उसे सिर्फ़ लैला ही नजर आती थी । अब वह पागलों के समान नहीं बल्कि पागल ही हो गया था और अपनी माशूका लैला के प्रति अपनी भाव अभिव्यक्त को शब्दों के माध्यम से कविताओं में उकेरता ।
कितना मुश्किल है मुहब्बत की कहानी लिखना ।
जैसे पानी पे पानी से पानी लिखना
मैले फ़टे चिथङे गन्दे वस्त्र, अस्त व्यस्त तन मन, सदा बेहाल अवस्था में रहने के कारण ही लोगों ने कैस को मजनूं का नाम दिया । जो उसकी प्रेमकहानी की भांति ही उसके मूल नाम से अधिक अमर हुआ ।
कहते हैं, लैला कोई बहुत आकर्षक और सुन्दर युवती नही थी । बल्कि वह काली थी । अतः राजा को जब मजनूं की अति दीवानगी के बारे में पता चला । तो उसने मजनूं को दरबार में बुलाया । और राज्य भर की कई चुनिंदा खूबसूरत आकर्षक कमनीय लङकियों को उसके सामने खङा कर दिया ।
और कहा - लैला में क्या है । देख ये लैला से कई गुना सुन्दर हैं । इनमें से जो अच्छी लगे । उसे ले ले ।
मजनूं ने उपेक्षा से उन्हें देखा और बोला - नहीं, इनमें लैला से बढ़कर कोई नहीं । लैला को देखने के लिये मजनूं की आँख ही चाहिये ।
इसी तरह वन बीहङों में भटकते हुये एक दिन मजनूं वन में गिर कर बेहोश हो गया । संयोगवश उसी समय उसका पिता उसे खोजते हुये वहाँ आ पहुँचा ।
उसने मजनूं को होश में लाकर उसे गोद में रख कर पूछा - बेटा, क्या तू मुझे पहचानता है ?
सुधबुध खोया मजनूं बेसुध सा ही उसे देखता रहा । लैला को छोङकर सब कुछ उसकी दृष्टि में शून्य था । कुछ और नजर ही नही आता था । उसका रोम रोम लैला लैला पुकारता था ।
उसके पिता ने उसे फ़िर से हल्का सा झिंझोङा और कहा - कैस, देख मैं तेरा पिता..मुझे पहचान ।
मजनूं जैसे कहीं अथाह गहराईयों में डूबा हुआ सा बोला - कौन पिता ?
मजनूं जब तक जीवित रहा । न तो लैला को देख सका । न मिल सका । 
(अरबी संस्कृति की यह ऐतिहासिक प्रेमकथा यहीं समाप्त नही होती । क्योंकि मृत्यु के बाद जीवन की धारणा सनातन है । इसलिये कवि लेखक साहित्यकार इससे आगे भी कल्पित करते हैं)
मरने के बाद जब मजनूं को खुदा के सामने लाया गया । तो खुदा बोला - अरे मूढ़ ! तूने एक भौतिक सांसारिक पदार्थ (लैला) को इतना प्यार क्यों किया । जितना प्रेम तूने अपनी प्रियतमा पर व्यर्थ किया । उसका कोटिअंश भी मुझे किया होता । तो मैं आज तुझे विहिश्त का फ़रिश्ता (स्वर्ग का देवता) बना देता ।
मजनूं घोर उपेक्षा से बोला - ऐ खुदा ! मैं तुझे इस (धृष्टता) के लिये क्षमा कर देता हूँ । पर यदि सचमुच ही तुझे मेरे इश्क की इतनी चाह थी । तो तू स्वयं लैला बन कर मेरे पास क्यों न आया ?यदि तू मेरी मुहब्बत का भूखा था । तो तुझे मेरी प्रेमिका, मेरे प्रेम का विषय बनना था ।
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चेतन और प्रकृति, स्त्री और पुरुष, बीज और भूमि, चाह और रंग, पद और अर्थ ये शब्दों से भिन्न होने पर भी अर्थ में एक ही हैं । लैला मजनूं की प्रेमगाथा क्या सिर्फ़ एक नारी देहासक्ति रखने वाले पुरुष मजनूं की वासना भर है । या इसमें (और ऐसी सभी बङी घटनाओं में) सृष्टि का कोई गहरा रहस्य छुपा हुआ है ?
मेरे अनुभव से निसन्देह गहरा रहस्य है । क्योंकि यह बात सिर्फ़ लैला मजनूं पर ही नही । किसी भी आबाल वृद्ध पर यह लैला मजनूं सिद्धांत स्थापित है । सम्बद्ध है । लेकिन इसकी परिणित आम विपरीत लिंगी दैहिक वासना नही है । बल्कि कुछ और ही है ।
गहरे..और गहरे..और गहरे..अथाह गहरे तल में इसका भेद रखा है ।
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