19 सितंबर 2016

पति..पत्नी का दर्पण

याज्ञवल्क्य के दो स्त्रियां थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी । याज्ञवल्क्य बेहद धनी थे और भारत के धनी राजा के गुरु थे । एक समय आने पर अपना सभी धन सम्पत्ति दोनों स्त्रियों में बराबर बांटकर निर्जन एकान्त सेवन हेतु उनकी वनगमन की इच्छा हुयी ।
लेकिन मैत्रेयी ने धन सम्पत्ति लेने से इंकार कर दिया और कहा - यदि धन से अमरता प्राप्त हो सकती तो मेरे पति स्वयं उसका त्याग न करते ।
मैत्रेयी विदुषी महिला थी । उसने सोचा - मेरे पति जो भारतवर्ष के धनी इंसान हैं । इस दौलत को छोङकर विरक्तों का जीवन क्यों अपना रहे हैं ? कोई भी मनुष्य सुख सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन को त्याग कर विरक्तों वाला असुविधाओं भरा जीवन तब तक ग्रहण नही करेगा ।
जब तक नये जीवन में पुराने के अपेक्षा अधिक सुख चैन और कुछ अतिरिक्त न हो । अतः अवश्य ही मेरे पति को इस जीवन से उस जीवन में अधिक सुख चैन नजर आता होगा ।

अतः उसने अपने पति से पूछा - क्या सांसारिक सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक सम्पत्ति में अधिक सुख है । अथवा फ़िर इसके विपरीत है ?
याज्ञवल्क्य बोले - अमीरों की जिन्दगी जो कुछ है सो है । परन्तु उसमें असली सुख, सच्चा आनन्द और वास्तविक स्वाधीनता नही है ।
मैत्रेयी ने कहा - वह कौन सी चीज है । जिसकी प्राप्ति मनुष्य को स्वतन्त्र बना देती है । जिसकी प्राप्ति मनुष्य को लौकिक लोभ और तृष्णा से मुक्त कर देती है । वह जीवन सुधा मुझे बताओ । मैं उसे चाहती हूँ ।
तब याज्ञवल्क्य की सभी सम्पत्ति कात्यायनी को मिल गयी । और मैत्रेयी को याज्ञवल्क्य की आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त हुयी ।
न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो ।
भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया । 
भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भव । 
वृहदारण्यक उपनिषद ।
- पति के प्रिय होने का कारण यह नही कि उसमें कुछ गुण हैं । या उसमें कोई विशेषता है । जो प्यार के योग्य है । उसके प्रिय होने का कारण कि वह स्त्री के दर्पण का काम देता है । जिस तरह हमें शीशे में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई पङता है । उसी तरह पति रूपी दर्पण में स्त्री अपने आपको देखती है । और इसीलिये वह पति को प्यार करती है ।
- स्त्री पति को पति के लिये प्यार नही करती । बल्कि इसलिये कि पति में सच्चे तत्व, परमेश्वर, सच्चे परमात्मा के दर्शन होने चाहिये । 
यदि प्रेम के बदले प्रेम न मिलता । तो कोई किसी को प्रेम न करता । इससे सिद्ध है कि दूसरों में प्रतिबिम्बित हम केवल अपने आपको ही प्यार करते हैं । हम अपने सत्य आप (आत्मा) अंतरात्मा को  देखना चाहते हैं । और कभी किसी वस्तु को हम उसी के लिये प्यार नही करते ?
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