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29 जुलाई 2013

सहज योगगुरु श्री राकेश महाराज जी

लगभग एक वर्ष पूर्व की बात है जब (शिमला मूल के निवासी और वर्तमान में) दिल्ली के श्री राकेश शर्मा जी फ़ोन पर मेरी पहली बार बात हुयी । मेरे लिये ये रोजमर्रा की भांति आने वाली सामान्य काल जैसी ही थी । 
राकेश जी ने गूगल पर हमारे ‘मुक्तमंडल’ के बारे में जानकारी पढ़ कर योग से सम्बन्धित जिज्ञासावश फ़ोन किया था । इससे पूर्व राकेश जी नारायणदत्त श्रीमाली और प्रमुख सच्चे नाथपंथी योगियों आदि से काफ़ी समय से जुङे रहे थे ।
बातचीत में उस समय तो राकेश जी की योग उपलब्धियों और पहुँच पर मैंने प्रत्यक्ष कुछ नहीं कहा फ़िर भी आजकल योग, ध्यान, भक्ति के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है । उसके तुलनात्मक राकेश जी उस समय भी इस सबकी तुलना में काफ़ी श्रेष्ठ योगी थे और ये मेरे लिये आकर्षण का विषय था ।
दिल्ली की अति व्यस्त जिन्दगी और कार्य व्यवसाय की अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से घिरे किसी हिमालय पर ध्यानरत योगी की भांति ही योग यात्रा करते हुये राकेश जी किसी के लिये भी आश्चर्य का विषय हो सकते थे ।
खैर..राकेश जी मुझसे जानना चाहते थे कि उनका योग किस स्थान पर है और अब उसमें किस तरह क्या होगा ?
लेकिन उससे पूर्व उन्होंने अपने बचपन से ही जो अनुभव उन्हें पूर्वजन्म की योग यात्रा और भक्ति संस्कार के प्रभाव से होते थे । उन सबके बारे में विस्तार से बताया ।
इसके बाद जो कुछ मैं सदगुरु के सानिंध्य में सीखा था, जानता था । मैंने उन्हें बताया ।
लेकिन जो बताया, वह ‘समय के गुरु या सदगुरु’ के सहयोग के बिना अकेले सम्भव नहीं था । 
अतः राकेश जी ने हमारे सदगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’ जी से मिलना तय किया । यहाँ महत्वपूर्ण बात ये है, मैंने उसी समय राकेश जी से कहा - आपकी जाने के कुछ समय बाद ही ‘हँसदीक्षा’ इसके कुछ घण्टों में ही परमहँस दीक्षा और समाधि ज्ञान कराया जायेगा और एक वर्ष बाद आप हमारे ‘मुक्तमण्डल’ के लिये गुरु रूप में कार्य करेंगे ।
उस समय राकेश जी को मेरी बातों पर काफ़ी आश्चर्य हुआ और एक तरह से विश्वास नहीं हुआ । जो व्यक्ति फ़ोन पर पहली बार सिर्फ़ किसी से बात कर रहा हो । निसंदेह उसे इस सब पर आश्चर्य ही होगा पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं था । 
इतिहास गवाह है, ठीक ऐसा ही हुआ ।
मुझे फ़ोन करने के बाद यथाशीघ्र राकेश जी हमारे ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ नगला भादों, जिला फ़िरोजाबाद पर आये ।
महाराज जी ने उनको ध्यान पर बैठाकर उनकी अभी की ध्यान स्थिति जांची और 2 घन्टे बाद ही परमहंस दीक्षा दी ।
इसके बाद ही उनके सक्षम सदगुरु के अभाव में अटके हुये योग को तीवृगति मिल गयी और वह निर्बाध योग ऊँचाईयों की तरफ़ सतत और सफ़ल यात्रा करने लगे ।
क्योंकि वह पूर्वजन्म के योगी रहे थे । अतः शीघ्र ही निश्चयात्मक ऊँचाई (जहाँ योगी में स्थिरता, समर्थता और शक्ति आ जाती है) का लक्ष्य प्राप्त कर लिया ।
तब उन्हें सदगुरु महाराज जी ने नये शिष्यों, साधकों को दीक्षा देने का आदेश कर दिया ।
राकेश जी अभी पिछले एक महीने में ही 30 के लगभग सफ़ल हँसदीक्षा कर चुके हैं ।
आत्मज्ञान की जानकारी न रखने वालों को ये साधारण बात लग सकती है पर कोई भी टाटा बिरला चौरासी लाख योनियों, नरक से मुक्ति और निश्चित अगला मनुष्य जन्म, धन या बुद्धि बल आदि से कभी प्राप्त नहीं कर सकता । 
ये सभी जानकारी मैं उन लोगों को देना चाहता हूँ जो ठीक से ध्यान, योग का महत्व और भक्ति का मतलब ही नहीं जानते । भक्ति के बिना कोई सुख सम्भव नहीं है ।
भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी ।
बिनु सतसंग न पावहि प्रानी ।
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा ।
जिमि हरि शरन न एक हू बाधा ।
अतः ये दिल्ली और आसपास के लोगों के लिये बेहद खुशखबरी और सौभाग्य वाली बात है कि आप ध्यान के उच्चतम स्तरों को दिल्ली में ही सरलता से जान सकते हैं । अक्षय ऊर्जा, अक्षय धन और निरन्तर सरल सहज भक्ति और सर्वाधिक दुर्लभ और उच्च सहज योग (सुरति शब्द योग) को आसानी से सीख सकते हैं ।
सत साहेब ! 
सम्पर्क सूत्र -
श्री राकेश महाराज जी  ‘परमहंस’  
0 84478 15644 
0 98183 12908

14 जून 2013

मुक्तमंडल की हंसदीक्षा अब दिल्ली में भी

परम पूज्य सदगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’ के तत्वावधान में मनुष्य जीवन के लिये परम कल्याणकारी हंसदीक्षा (ब्रह्म दीक्षा) अब दिल्ली में भी सदगुरुदेव के अधिकारी शिष्य श्री राकेश महाराज जी ‘परमहंस’ द्वारा सुलभ कराई जा रही है । 
हंसदीक्षा में दीक्षा के समय ही समर्थ, सक्षम, सच्चे, अधिकारी एवं ‘समय के सदगुरु’ के द्वारा आपके शरीर के अंदर स्वतः गुंजायमान अनहद शब्द एवं अजपा जाप को प्रकट किया जाता है तथा ‘आत्मप्रकाश’ को जाग्रत किया जाता है । 
जिससे करोङों जन्म जन्मान्तरों के अज्ञान और मायामोह से ग्रसित अपने स्वरूप को विस्मृत कर चुका जीव अपने निज स्वरूप को जान सकता है और कष्टपूर्ण आवागमन से मुक्त होकर निज सत्यधाम को जा सकता है ।  
इसे जान लेने के बाद कुछ भी अनजाना नहीं रह जाता । यही वह नाम है जिसका विवरण हर एक धर्म के ग्रन्थ करते हैं और यही परमात्मा को जानने का एकमात्र साधन है ।
जो जिज्ञासु भक्त, योगी, साधक (हमारे मुक्तमंडल अथवा अन्य किसी भी मंडल से दीक्षित) जन अपने ध्यान मार्ग सम्बन्धी प्रश्न अथवा समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए इच्छुक हैं । हम सदैव ही उनका हार्दिक स्वागत करते हैं । 
ध्यान एवं प्रवचन का कार्यक्रम दिनांक 15 जून 2013 से प्रारम्भ किया जा रहा है ।
ध्यान एवं प्रवचन का दिन तथा समय -
प्रत्येक रविवार, दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक ।
हंसदीक्षा गुरु पूर्णिमा - 22 जुलाई 2013 - के बाद प्रारंभ होगी ।

मेरे बारे में

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326