10 नवंबर 2011

साधारण स्थिति का मृत्यु ज्ञान

ज्ञान और बिज्ञान वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । ज्ञान किसी चीज की अनुभवजन्य स्थिति है । और बिज्ञान उसी चीज की सिद्ध हो चुकी स्थिति । अतः इन दोनों में ही किन्तु परन्तु । कही सुनी बातों । बनाबटी धारणाओं का स्थान नहीं होता । बल्कि जाना हुआ । प्रयोग किया हुआ । सिद्ध किया हुआ..ही कहा जाता है । सभी योनियों का जीवन एक निरन्तर यात्रा है । किसी का उत्थान हो रहा है । किसी का पतन हो रहा है । तो किसी का उत्थान पतन मिश्रित हो रहा है ।
और ये ही तीन स्थितियाँ जीवन के हर भाव में बनती हैं । सही । गलत । सही गलत मिश्रित । दिन । रात । दिन रात मिश्रित संध्याकाल । सुख । दुख । सुख दुख मिश्रित । पाना । खोना । खोना पाना मिश्रित । दरअसल इस रहस्य के पीछे तीन गुणों - सत रज तम.. का बिज्ञान काम करता है । इन तीन गुणों पर आधारित ही ये समस्त सृष्टि खेल संचालित है । इन गुणों की अधीनता में देवता आदि बङी शक्तियाँ भी आती है । इसको सरलता से समझने हेतु - सत ( सही या उत्तम ज्ञान पक्ष ) रज ( गुण की क्रियाशीलता ) तम ( गलत या अँधेरा अज्ञान पक्ष ) अब सत के प्रभावी होने से सात्विकता सत्य ज्ञान या उजलापन बढ जाता है । तम के प्रभावी होने से अज्ञानता अँधेरा और तामसिकता प्रभावी हो जाती है । इन दोनों गुणों के मिश्रित ‍% से अन्य विभिन्न स्थितियाँ बनती हैं । उस क्रियाशील स्थिति को रजोगुण कहा जाता है ।
उदाहरण के लिये सतोगुण की अधिकता जब रजोगुण से मिश्रित हो । तब एक राजा धर्मप्रिय दयालु आदि सभी अच्छे गुणों की परिभाषा वाला होता है । लेकिन जब यही राजा तमोगुण की अधिकता के साथ रजोगुण के साथ मिश्रित हो । तव वह दुष्ट पापी अत्याचारी क्रूर आदि हो जाता है । इसके भी अलावा जब रजोगुण की क्रियाशीलता सतगुण और तमगुण दोनों से मिश्रित हो रही हो । तो उस राजा में मिश्रित गुण यानी दयालुता क्रूरता । पापी धर्मात्मा । दुष्टता सज्जनता आदि मिश्रित भाव होती है । और ये बात छोटे से छोटे से लेकर बङे से बङे पर लागू होती है । योग और सन्तज्ञान इन गुणों से ऊपर गुणातीत होता है । तुलसीदास जी ने कहा है - कहिय तात सो परम विरागी । तृण सम सिद्ध तीन गुन त्यागी ।
तब जीवन को ठीक से समझने हेतु जीवन से अधिक मृत्यु का अध्ययन आवश्यक है । क्योंकि जीवन का नियन्त्रण तो बहुत कुछ हमारे हाथों में है । सहनीय स्थिति है । सहारा देने वाले भी हैं । परन्तु मृत्यु उपरान्त जीव एकदम असहाय दीन हीन है । और तब उसके कर्मफ़ल ही साथी हैं - राजा हो या रंक सभी का अन्त एक सा होय । हमारे यहाँ देहाती क्षेत्र में शमशान की एक बङी मजेदार परिभाषा कही जाती  है । जो काफ़ी हद दूसरे भावों में ठीक भी लगती है । समशान ( शब्द बदलाव पर ध्यान दें ) यानी यहाँ आकर सभी की शान सम ( बराबर ) हो जाती है । राजा का शरीर हो । या भिखारी का । उसे समान रूप से मिट्टी में मिलना ही होगा । कोई भेदभाव नहीं ।
पर ये बात सिर्फ़ शरीर के लिये ठीक है । क्योंकि शरीर ही मरता है । जीव तो मरता ही नहीं । तब इसके लिये आगे हेतु बहुत सटीक बात कही गयी है - आये हैं सो जायेंगे । राजा रंक फ़कीर । एक सिंहासन चढ चले । एक बंधे जंजीर ।
यानी मृत्यु के बाद की दो मुख्य स्थितियाँ । एक ने जीवन का लक्ष्य जिस अनुपात में प्राप्त कर लिया हो । वह उसी अनुपात में सिंहासन पर चढकर बाइज्जत जायेगा । और आगे भी स्व स्थिति अनुसार राज प्राप्त करेगा । दूसरे ने इस अमूल्य जीवन को व्यर्थ गंवा दिया हो । उसे सजा के तौर पर जंजीर में बँधे हुये अपराधी के समान ताङना सहित जाना होगा । और पुण्य कर्म आदि की निर्धनता स्थिति से दीर्घकाल तक गुजरना होगा ।
इसीलिये मैंने कहा । जीवन से अधिक मौत का अध्ययन आवश्यक है । तब आईये देखें । मरते कैसे हैं ? और  इसको जानना समझना बहुत कठिन नहीं । बल्कि बहुत सरल है ।
मृत्यु भले ही एकदम सिर काट देने से हो । या एक्सीडेंट में परखचे उङ जाने पर । या सामान्य तरीके से । असल क्रिया समान ही होगी । और उतने ही समय में होगी । कैसे ?
कृमशः निचले चक्रों का टूटना । या तत्वों का अपने तत्वों में लय होना । सबसे पहले गुदा लिंग के बीच स्थित प्रथ्वी चक्र ( या तत्व ) ढहा । ये जल तत्व में विलीन होता है । जो इसके ठीक ऊपर है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी आसानी से देख सकते हैं । प्रथ्वी ही जल में लय ( समाती ) होती है । जल कभी प्रथ्वी में लय नहीं होता । क्योंकि प्रथ्वी का निर्माण ही जल के फ़ेने से हुआ है । इसका सबसे बङा प्रमाण 75% जल और 25% प्रथ्वी होना है

। इस तरह ये प्रथ्वी तत्व जल तत्व में विलीन हो गया । शरीर में एक तत्व खत्म हो गया । मृत्यु के समय इसका ज्ञान या 1 - पहचान स्वतः मल निकल जाना है । जिसको आम भाषा में मल खसकना कहा जाता है । इसमें भले ही मृतक ने बहुत दिनों से कौर न खाया हो । पर उसको बहुत सारा मल आता है ।
अब आगे जल तत्व अग्नि में लय होता है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी जल का अग्नि में स्थिति होना साफ़ नजर आता है । जब सूर्य की गरमी या अग्नि ताप से जल वाष्पित हो जाता है । जल तत्व लिंग मूल में स्थिति होता है । इसके अग्नि तत्व में लीन होते ही अधिकांश मृतकों का मूत्र निकल जाता है । और 2 - पहचान हेतु उनका गला सूखने लगता है । तब बहुधा लोग पानी गंगाजल आदि पिलाते हैं ।
इसके आगे अग्नि तत्व वायु तत्व में लीन होता है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी अग्नि का वायु में स्थिति होना साफ़ नजर आता है । जब जलती अग्नि वायु में लय हो रही होती है । अग्नि तत्व की स्थिति नाभि में है । यहाँ ये पंचाग्नि रूप में है । पर मूल अग्नि तत्व ही है । इसका कार्य शरीर को गर्म रखना । ऊर्जा देना । खाना पचाना आदि बहुत से कार्य हैं । अग्नि तत्व के वायु तत्व में लीन होते ही मृतक का शरीर ठण्डा पङ जाता है । तब आपने देखा होगा । बहुत से लोग मृतक के शरीर को हाथ से रगङकर गर्म रखने की चेष्टा करते हैं । अग्नि तत्व लीन होने की 3 - पहचान यही है । शरीर का ठण्डा पङ जाना ।
इस तरह - प्रथ्वी । जल । अग्नि 3 तत्व कृमशः वायु में लीन हो गये । अब आगे वायु तत्व शरीर को छोङता है । तब पहचान 4 - इसके द्वारा चलती - स्वांस । धङकती नसें नाङियाँ । नब्ज आदि वायु गतिविधियाँ शान्त हो जाती हैं । और प्राण का चलना बन्द हो जाता है । और तब मृतक को जिलाने का प्रयास कर रहे परिजन या डाक्टर आदि निराश होकर कह देते हैं - अब कुछ नहीं रहा । 
साधारण या ज्ञान रहित मनुष्य और 84 के जीवों की मृत्यु स्थिति यहीं तक हैं । क्योंकि जीते जी वे आकाश या आकाश तत्व या इससे ऊपर की स्थितियाँ प्रयोगात्मक या व्यवहारिक स्तर पर नहीं जानते । और अपने ज्ञान स्तर में इन्हीं 4 तत्वों में जीवन भर बरतते हैं । तो स्वाभाविक ही गति भी यहीं तक होती हैं । आँख । कान । नाक । मुँह । लिंग । गुदा । साधारण ज्ञानरहित जीवों के प्राण इन्हीं 9 द्वारों में से किसी 1 द्वार से निकलते हैं ।  और जिस द्वार से भी निकलते हैं । वह फ़ैलकर विकृत हो जाता है । थोङा गौर से देखने पर स्पष्ट पता चल जाता है । प्राण कहाँ से निकले हैं ।
आगे भी साधारण स्थितियों की ही बात करते हैं । 84 लाख योनियों के परिणाम को प्राप्त हुये जीवों को खास कोई लेने नहीं आता । मन । बुद्धि । चित्त । अहम । इन 4 से मिलकर बना अंतकरणः यानी सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से 


निकलकर एक अँधेरे मैदान में पहुँचता है । जहाँ निराधार अक्षर यानी ज्योति कुछ ऊँचाई पर निरन्तर स्वतः प्रकाशित है । वहाँ इसी का पीला मद्धिम सा प्रकाश फ़ैला होता है । इसी ज्योति के आधार पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । तब वह अंतकरण रूपी सूक्ष्म शरीर इसके चारों ओर घूमता है । ध्यान रहे । अब एक स्वचालित ढंग से आपके तमाम कर्मों के आधार पर निचोङ रूप वहाँ 84 लाख योनियों में से किसी के भी परिणाम अनुसार 3-4 शरीर मैदान में स्वतः नजर आने लगेंगे । आप अपने भाव अनुसार खुद ही लपकोगे । क्योंकि शरीर रहित हो जाने पर शरीर बहुत अच्छा लगता है । जल्दी से कोई भी शरीर प्राप्त करने की इच्छा बलबती हो जाती है । चाहे वह पशु पक्षी का ही क्यों न हो । ये एक स्वतः भाव बन जाता है । बस उनमें से किसी शरीर के प्रति इच्छा बनते ही सूक्ष्म शरीर उसमें समा जाता है । और जीवात्मा प्राप्त  84 के उसी जीव गर्भ में चली जाती है । यहाँ एक विशेष बात ये है कि वहाँ दिखाई देने वाले सभी शरीर पूर्ण आकार वाले होंगे । जैसे हाथी चूहा मोर बिलाव आदि सभी युवा और स्वस्थ शरीर जैसे आकार वाले । न कि शिशु आकार के । ये 84 लाख योनियों में जाने वाले की अन्तिम गति हुयी ।
इसके बाद साधारण स्थिति में ही तीन मुख्य गतियाँ -  प्रेत । नरक । और मनुष्य रूप पुनर्जन्म भी होती हैं । 84 की स्थिति लगभग 70% जीवों की बनती है । शेष 30% में ये तीनों आते हैं । जिनमें मनुष्य रूप में पुनर्जन्म का % 1% से भी काफ़ी कम होता है ।
प्रेत - दोनों कानों में से किसी से भी प्राण निकलने पर जीवात्मा प्रेत बन जाता है । बाँये कान से प्राण निकलने पर इसी प्रथ्वी । और नीच लोक स्थिति का । तथा शक्तिहीन प्रेत बनता है । क्योंकि बाँया भाग काल क्षेत्र के अंतर्गत आता है । दाँये कान से प्राण निकलने पर इससे ऊँची स्थिति । उच्च लोक । गण आदि तथा शक्तियुक्त प्रेत बनता है । क्योंकि दाँया भाग सिद्ध क्षेत्र के अंतर्गत आता है । ये मृत्यु उपरान्त प्रेतक स्थितियाँ हुयीं ।
नरक - पाप कर्मानुसार नरक को प्राप्त हुये जीवात्मा को उसके द्वारा जीवन में अपनाये गये यम ( यम की पूरी जानकारी हेतु अष्टांग योग के 8 अंग - यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार । धारणा ध्यान समाधि देखें ) के आधार पर लेने यमदूत या जमदूत आते हैं । जिनको देहाती बोली में जमघट्टा कहा जाता है । इनकी आकृतियों की भयंकरता या सामान्य डरावना पन व्यक्ति के जीवन आचरण पर निर्भर करता है । क्योंकि उसी आधार पर ये दिखते हैं । या सताते हैं । मारते हैं । यही यात्रा बेहद कष्टदायक है । जो अलग अलग स्थिति अनुसार 13 से लेकर अधिक दिनों तक में पूर्ण होती है । इसी जीव की यमपुरी आदि में पेशी होती है । और फ़िर सजा अनुसार इसे तय नरक में भेज दिया जाता है । जिनमें खास नरकों की संख्या ही हजारों में हैं ।
पुनर्जन्म - आयु शेष रहने पर । या किसी अपवाद स्वरूप । या अन्य कोई विशेष वजह होने पर जीवात्मा मनुष्य का मनुष्य रूप पुनर्जन्म भी होता है । पर ये 1 का भी 1% ही होता है । यानी ना के बराबर । इसका सबसे बङा प्रमाण यही हैं । यदि ये इतना आसान और सुलभ होता । तो तमाम गृंथ सन्त ज्ञानी आदि मनुष्य शरीर को अति दुर्लभ नहीं बताते । जिसकी देवता भी इच्छा करते हैं ।
मृत्यु बाद पुनर्जन्म होने वाले इस जीवात्मा की विभिन्न मुख्य स्थितियाँ बन सकती हैं । कुछ समय का नरक भी हो सकता है । 2-4 जीवों तक की 84 भी हो सकती है । 1-2 साल को प्रेत भी बन सकता है । या सीधे सीधे ही जन्म ले सकता है ।
स्वर्ग - बहुत अच्छे और काफ़ी पुण्य कर्मों और सीमित दिव्य ज्ञान से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । पुण्य फ़ल और ज्ञान स्थिति अनुसार ही स्वर्ग में रहने की अवधि और स्थान अधिकार आदि तय होता है । इसमें भी जीवात्मा की स्थिति अनुसार मृत्यु बाद लेने देवदूत या उच्च लोग दिव्य विमान द्वारा आते हैं । साधारण मृत्यु के बाद उच्चता में ये सबसे पहली मगर सबसे निम्न स्थिति है । जो वास्तव में ज्ञान के बिना हो ही नहीं सकती । क्योंकि पुण्य कर्म और प्रयोगात्मक हवन यज्ञ आदि करने की इच्छा । बिना ज्ञान भाव जागे कोई कैसे कर सकता है । और अज्ञानता में तो करेगा ही नहीं । अतः ये साधारण जीवों की मृत्यु स्थिति हुयी ।
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