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25 नवंबर 2011

तुम मेरी और दो डग चलो मैं तुम्हारी ओर चार डग चलता हूँ

जय गुरुदेव !  राजीव जी नमस्ते ! गुरूजी से मिलने से पहले मैं बहुत कर्मकाण्ड करता था । मेरा इनसे बहुत लगाव था । अब मैं ये सब छोड़ चूका हूँ । व गुरूजी द्वारा बताये रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहा हूँ । आज मैंने मंगलवार का वृत भी नहीं किया । लेकिन दिल में दुःख सा होता है जी । जिनको मानता हुआ मैं बड़ा हुआ । आज एकदम से सब छोड़ दिया । मंदिर के पास से गुजरता हूँ । तो ग्लानि सी मन में आती है ।
गुरूजी ने कहा है कि हमेशा चलते हु्ये । काम करते हु्ये भजन करो । सांस पर ध्यान दो । इसमें ढाई अक्षर ( सो हम । जो हमेशा अपने आप हो रहा है ) का भजन कैसे करे । ये मैं समझ नहीं पा रहा । सांस लेते समय " सो " का ध्यान नासिका से अन्दर जा रही सांस पर करे । या जो सांस नाभि तक पहुँच रही है । उस पर करें  । व सांस बाहर निकालते समय " हम " का ध्यान नासिका से सांस निकलते हुए पर करें । या अन्दर । भैया ! मेरे प्रश्नों से आपको परेशानी हो । या आप जवाब नहीं देना चाहे । तो कोई बात नहीं । लेकिन नाराज न होना । एक दीक्षित ।
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मंगल भवन अमंगल हारी  । दृवहु  सो दशरथ अजिर बिहारी । कौन सा असली है ? वो मंगल का वार ( दिन ) वृत ( वरतना ) हनुमान का बरताव क्या है ? हनु - मान । जिसने अपनी मान रखने की चाहत को हनु यानी मार दिया है । समाप्त कर दिया है । वही हनुमान है । अब ये अमंगल को हरने वाला मंगल भवन कौन सा है । आपका शरीर ही ना । जो भी  सुख चैन आपको महसूस होगा । इसी के द्वारा तो होगा । अब दशरथ । यानी दसों दिशाओं में निरन्तर दौङने वाला ये मन जब इस शरीर में स्थिति अजर बिहारी प्रभु की तरफ़ दृवित होकर बहता है । तो सब अमंगल समाप्त होकर मंगल ही मंगल हो जाता है । अब इसी से अन्दाजा लगा लें । आप वास्तव में हनुमान का बरताव और मंगल का बरत करते थे ।
तेरे पूजन को भगवान । बना मन मन्दिर आलीशान । आप शिक्षक हैं । बच्चों को शिक्षा देते हैं । आपके छात्र यदि क से कबूतर ही कहते रहें । और कबूतर के चित्र को ही कबूतर मानें । और आसमान में मुक्त भाव से विचरते कबूतर को कबूतर मानने से इंकार ही कर दें । क्योंकि आपने तो चित्र वाला ही और क से बताया है । तो आपको कितनी झूँझल होगी । अब क भी खत्म करो । चित्र भी खत्म करो । अब असली की तरफ़ जाने का प्रयोजन हुआ है । इसलिये छोङा कहाँ । अब तो असली प्राप्त होगा । आपके अन्दर ही सुगन्धित धूपवत्ती भी जल रही है । घण्टा 


शंख मजीरों की ध्वनि भी हो रही है । असली देव भी बैठा है । तो छोङा कहाँ । सही रूप में तो अब जुङने वाले हैं । वो भी जाने कितने जन्म भटकने के बाद । तो अब ग्लानि हो कि खुशी हो ।
सामान्य स्वांस 4 सेकेण्ड में पूर्ण होती है । 2 सेकेण्ड में कुम्भक यानी स्वांस भरना - सो‍ऽऽ । फ़िर अगले 2 सेकेण्ड में स्वांस रेचक यानी स्वांस बाहर निकलना - हंऽऽऽऽग । कुम्भक और रेचक के बीच की स्थिति जिसमें स्वांस भरी रहती है । उसे पूरक कहते हैं । कुण्डलिनी का पूरा योग ही ॐ ह्यी क्लीं आदि बीज मन्त्रों के साथ इसी कुम्भक पूरक रेचक पर आधारित होता है । पर उसका तरीका बेहद जटिल और भिन्नता लिये हुये है । साथ ही कठिन और खतरे वाला भी है । इसमें पूरक में स्वांस को रोके रहना । कुम्भक में स्वांस को इच्छानुसार गति देना । और रेचक यानी छोङने आदि में भी बहुत सी बातें होती है । इसलिये इसे सहज योग तो कतई नहीं कह सकते ।
खैर..4 सेकेण्ड में 1 स्वांस के आवागमन के हिसाब से 1 मिनट में 15 स्वांस बनती हैं । और 1 घण्टे में 900 । इस तरह 24 घण्टे में 21600 । इसलिये सिर्फ़ 3 घण्टे के नाम अभ्यास से भी 2700 अजपा को देख सकते हैं ।
अब क्योंकि इसको अजपा कहा गया है । जिसकी वजह यह है कि स्वांस आपके लेने से तो आ जा नहीं रही । वह तो 24 घण्टे स्वयँ आ जा रही है । अगर लेने की बात होती । तो फ़िर जपा होता । लेकिन वह तो स्वयं ही है । अजपा है ।
अब गौर से समझिये । मैं आपसे कहूँ कि - ये मकान देखिये । या यह वृक्ष देखिये ।  तो आप उसके किस हिस्से पर पहले निगाह डालेंगे । जैसे मैं कह दूँ । ये खिङकी पहले देखो । दरबाजा पहले देखो । दीवाल बाद में देखना । साइड में उसके बाद देखना । अब ये तो बङी टेंशन की बात हो गयी । और लगभग असंभव भी । क्योंकि दरबाजा देखते समय खिङकी भी नजर में आ सकती है । दूसरे हिस्से पर भी नजर जा सकती है । क्योंकि नजर के विस्तार में तो मकान क्या और आसपास का हिस्सा भी आ रहा है । यहाँ तक कि कैमरे का फ़ोकस भी आप एकदम बताये गये स्थान पर सही सही नहीं घुमा सकते । वह भी आउट साइड हो ही जायेगा । उसको भी हर बार सैट करना ही होगा । तो ये सहज कहाँ हुआ । ये तो बङा जटिल और टेंशन वाला हो गया । फ़िर ये सुमरन कहाँ हुआ । ये तो उलझन हो गयी ।
अब इसका दूसरा पहलू समझें । मैं कहता हूँ । मकान पर नजर रखिये । और कोई भी नियम नहीं । अब कितना आसान हो गया । बस मकान पर निगाह रखनी है । वह किस जगह जा रही है । इससे कोई फ़र्क नहीं । कुछ ही दिनों के अभ्यास से आप पायेंगे । आपको ये भी नहीं लग रहा कि आप मकान पर निगाह रख रहे हैं । वह तो खुद ही आपसे जुङ गया । परिचित सा हो गया । और बिना प्रयास ही आपकी निगाह में रहने लगा । यह सहज योग हुआ । सहज भक्ति हुयी ।
और भी समझिये । बिना किसी नियम के आप मकान को सहजता से देख पायेंगे । अपने अन्दर सहेज पायेंगे । महसूस कर पायेंगे । पर नियम बताने से पूरा ध्यान नियम पर ही लगा रहेगा । अक्सर हाथ से माला फ़ेरने वाले लोग अपना अनुभव बताते हैं  कि उनका ध्यान सुमरन पर कम 108 वें बङे मनके पर अधिक रहता है । फ़िर कितने चक्र पूरे किये । इस पर अधिक रहता है । अब बताईये । ये भावपूर्ण सुमरन हुआ । या बेगार हुयी । मजदूरी हुयी । टेंशन हुयी ।
तो मुख्य बात है । समर्पण । आप जैसा भी सुमरन कर पाते हैं । वह भाव भक्ति का सुमरन ही आपको प्रवीण कर देगा । आप तो युवा हैं । अध्यापक हैं । हमारे बहुत से शिष्य 70 आयु को पार कर चुके हैं । उतने शिक्षित समझदार भी नहीं हैं । उन्हें खूब समझाया । पर ठीक से नहीं समझ आया । लेकिन एक बात उन्हें समझ आ गयी । सुबह शाम ध्यान पर बैठते हैं । रात को नींद नहीं आ रही । बिस्तर पर बैठकर भाव से बैठ जाते हैं । और भाव रहता है । सुमरन कर लूँ । बस उतने से ही उनका काम होने लगा । प्रभु के लिये बैठे । प्रभु उनकी सुनने लगे - तुम मेरी और दो डग चलो । मैं तुम्हारी ओर चार डग चलता हूँ ।
बस कर्ता नहीं है । उनके अन्दर । और यही असली समर्पण है । और कर्ता है । तो फ़िर कर लो । लगाओ अक्ल । पर आपकी जिज्ञासा भी अनुचित नहीं । नयी दीक्षा है । सतसंग भी अधिक नहीं ।
इसलिये सार यही है कि आप कैसे भी ध्यान दो । वह आटोमेटिकली ही आपको सही तरीके पर ले आयेगा । और ये बात सिर्फ़ यहीं लागू नहीं होती । आप छोटे बच्चे को खाने का सही तरीका सिखाओ । पर वह एकदम नहीं सीख सकता । मुँह सना लेगा । कपङे खराब करेगा । और आप किसी हालत में उसे ठीक नहीं सिखा सकते । वह खुद ही अभ्यास से ठीक सीखेगा । करत करत अभ्यास के जङमति होत सुजान । रसरी आवत जात ही सिल पर परे निशान ।
आपने साइकिल सीखी होगी । पहले हैंडल ठीक से पकङना । पैडल पर ध्यान । सामने ध्यान । फ़िर भी डगमगा रहे हैं । गिर भी जाते हैं । मगर अभ्यास के बाद निपुण हो गये । अब साइकिल चला रहे हैं । ये भी ख्याल नहीं । कैसे चल रही है । अपने आप ही चलने लगी ।
इसका सबसे सशक्त उदाहरण - पनिहारिनों द्वारा बिना पकङे मटकी सिर पर ले जाना है । बात भी कर रही हैं । चल रही हैं । मगर मटकी आराम से रखी है । अब ये सहज योग हो गया ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को सादर प्रणाम ।

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326