25 अगस्त 2013

श्रीराम द्वारा शंकर के धनुष तोङने का रहस्य

आप यदि रामायण के पात्रों उनकी उत्पत्ति और अजीब से घटनाकृमों पर बिना किसी पूर्वाग्रह या धार्मिक चश्मा लगाये बिना गौर करें । तो ये सभी कुछ आपको प्रतीकात्मक और किसी गूढ रहस्य का संकेतात्मक ही लगेगा । जैसे प्रमुख पात्र राम चेतना ( गति ) के द्योतक चेतन ( पुरुष ) हैं । मैंने पहले भी बताया कि राम में र अक्षर चेतना और म अक्षर माया के लिये है । यानी ऐसी चेतना जो माया के साथ मिलकर ये सृष्टि खेल खेल रही है । इसके दूसरे पात्र लक्ष्मण ( जिसका लक्ष्य मन की गतिविधियां हैं - यानी जीवात्मा ) इसके तीसरे प्रमुख पात्र सीता ( वेदेही आदि नाम ) को विभिन्न घटकों के साथ अलग अलग स्थिति में माया और सुरति खास कहा गया है - राम लखन बिच सीय सोहे ऐसे । जीव बृह्म बिच माया जैसे । इसको माया और सुरति क्यों कहा गया है । इसको देखें - हमारा अंतःकरण - मन ( माने हुये को ) । बुद्धि ( सही गलत आदि निश्चय निर्णय करने वाली ) । चित्त ( इच्छा का आकार या चाह ) । अहम यानी मैं भाव इन चार अंगों से बना है । अगर आप सनातन धर्म से थोङा भी परिचित हैं । तो आत्मा से अलग सृष्टि विकार है ।

माया है । और ये सृष्टि अंतःकरण रूपी इसी मन से ( तीन गुणों के साथ क्रिया करके ) निर्मित संचालित और नष्ट भी होती है । अतः सीता बराबर माया ( सिर्फ़ एक स्थिति ) यही है । और गूढ अर्थों में सुरति को ही सीता कहा जाता है । सहज योग बिज्ञान के प्रयोगकर्ता जानते हैं । मन बुद्धि चित्त अहम ये चारों अंग ( छिद्र ) जब योग क्रिया द्वारा एक हो जाते हैं । तब इन्हीं को सुरति कहा जाता है । सुरति शब्द का बहुत सरल सा अर्थ है । सु + रति = अपनी चाह । सुरति वास्तव में सुनती है । और निरति देखती है । पर इस पर अधिक बात करना विषयांतर ही होगा ।
क्योंकि मैं आज आपको राम द्वारा शंकर के धनुष को तोङने का असली रहस्य बता रहा हूँ । राम हँस योगी थे । और मर्यादा पुरुष थे । हँस योगी की पहुँच बृह्म की चोटी तक ही होती है । यानी पारबृह्म ( का आरम्भ भी ) इनकी पहुँच से बाहर होता है । क्योंकि ये परमहँस ज्ञान का विषय है । राम इसीलिये मर्यादा पुरुष की भूमिका में थे ।

क्योंकि बृह्म की चोटी तक बृह्म का कायदा कानून चलता है । यानी यहाँ तक की स्थिति वाला कोई भी नियम से बाहर जाता है । तो वो असुर भाव में परिवर्तित हो जायेगा ।
रामायण के तीन प्रमुख पात्र राम ( अदृश्य चेतन पुरुष ) सीता ( सुरति और माया ) और लक्ष्मण ( जीवात्मा ) ये वास्तव में किसी भी हँस ज्ञान साधक के लिये आत्मा से जीवात्मा होकर सृष्टि रूपी खेल का ज्ञान अज्ञान जानने के भाव हैं । हँस का नीर क्षीर विवेक और साधू ऐसा चाहिये..थोथा देय उङाय । और वस्तुतः स्वयं की वास्तविकता से परिचित होना भी है - कैसा अदभुत खेल बनाया । ईश्वर बृह्म जीव और माया । यानी ये चारों एक ही है ।
अब क्योंकि बात शंकर के धनुष तोङने की है । शंकर तमोगुण का प्रतिनिधित्व करने वाले देव हैं । बात को समझिये । धनुष से क्या होता है ? इच्छित लक्ष्य का वेधन किया जाता है । यानी ऐसा धनुष जिससे सभी तमोगुणी लक्ष्य वेधन ( शिकार ) किये जाते हैं । इसके बहुत ही भारी और मजबूत होने का वर्णन भी है । बिलकुल सही है । तमोगुण बेहद भारी जटिल और बेहद मजबूत भी होता है । ये धनुष कहाँ रखा था - जनक की यज्ञशाला में । जनक यानी शरीर उत्पन्न करने वाला पिता । यानी मनुष्य शरीर में स्थित सभी कुछ । यज्ञशाला क्या है - आपके पेट में जो पंचाग्नि जल रही है । यही यज्ञशाला है । इसमें प्राण वायु द्वारा होम किया जाता है । कुण्डलिनी या सहज योग में सभी मन्त्र ॐ क्लीं आदि बीज मन्त्रों या महामन्त्र सोहं के साथ इसी प्राणवायु के द्वारा संयोग या योग क्रिया की जाती है । तो ये तमोगुण 

लक्ष्यों वाला धनुष इन्हीं जीवन से सम्बन्धित क्रियाओं के मध्य स्थित था । 
सीता इन्हीं जनक की पुत्री ( अंश ) थी । आत्मज्ञान सम्बन्धित ग्रन्थों में प्रथम स्त्री अष्टांगी थी । जो सतपुरुष ने कालपुरुष की वासना ( सृष्टि चाह ) हेतु भेजी थी । हँस ज्ञान में इसको सीता कहा जाता है । और चेतन पुरुष को राम कहा जाता है । क्योंकि जब यही चेतन पुरुष जीव संज्ञा में आ जाता है । तब माया रूपी सृष्टि में यह इसकी विभिन्न मन इच्छायें पूर्ण करती हुयी सहयोग करती है । लेकिन जब जीव अपने मूल यानी आत्मा हेतु अपनी पहचान के लिये मुढता है । तव यह सुरति हो जाती है । सीधी सी बात है । जब मन बुद्धि चित्त अहम के सभी खेलों से ( ऊबकर ) निवृति हुयी । और ये चारों अंग एक हो गये । ( जो अभी तक विभिन्न वासनाओं में बिखरे हुये थे ) तब ये भक्त स्थिति के लिये तैयार हो जाती है । हँस ज्ञान में चेतन पुरुष चेतना और माया का क्या संयोग ? बस यही जाना जाता है । परमहँस ज्ञान में यही सुरति राधा (  रा - चेतना युक्त । धा - दौङना ) और चेतन पुरुष कृष्ण ( अनहद शब्द ध्वनि का आकर्षण या चुम्बकीय शक्ति ) होता है । यानी हँस को पार कर गयी सुरति ऊपर के आकर्षण से खिंचने लगी । क्योंकि यहीं से कभी नीचे उतरी थी । आत्मज्ञान की भाषा में इसे सुरति शब्द योग कहा जाता है । देखें - जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाये । सुरति समानी शब्द में ताको काल न खाय । यानी काल की सीमा से जीव बाहर हो गया । यानी ये राधा कृष्ण का योग किसी भी साधक को कृष्ण स्तरीय योगेश्वर बना देता है । पर आत्म ज्ञान यहीं खत्म नहीं हो जाता । बल्कि अभी बहुत बहुत आगे जाना है । लेकिन उसके बजाय मूल विषय पर आते हैं ।
और इस धनुष को सीता ने खेल खेल में उठा लिया । सीधी सी बात है । माया का प्रमुख हथियार या खिलौना ही तमोगुण है । तो फ़िर धनुष उठाना क्या बङी बात है । जब योग स्थिति में ये एकाग्र होकर सुरति हो जाती है । तब तमोगुण इसके लिये बहुत ही हल्का हो जाता है । क्योंकि तमोगुण सिर्फ़ अज्ञान मात्र है । यानी अंधकार । और हँस साधक इस अज्ञान को ज्ञान यानी ( आत्म ) प्रकाश द्वारा जानने लगता है । तो सीधी सी बात है कि अज्ञान रूपी भार भारहीन हो जाता है । तब भी धनुष को उठाना कोई बङी बात नहीं है ।
अब लक्ष्मण की बात देखिये । यह जीव के अहंकार मैं पन और अक्खङपन की भूमिका है । जो रामायण में जगह जगह दृष्टिगोचर होती है । फ़िर ध्यान दें कि ये राम लक्ष्मण और सीता तीन अलग अलग नहीं हैं । बल्कि संयुक्त ही एक शरीर में स्थितियों का अन्तर है । राम सिया मैं सब जग जानी । करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानि । जब लक्ष्मण जीव भाव स्थिति में होता है । तब वह अहंकारी बात कहता है । पर राम और गुरु का ध्यान या संकेत आते ही भाव में विनमृता आदि स्थिति परिवर्तन हो जाता है । कुल मिलाकर पूरी और असल बात बहुत विस्तार युक्त है । अतः संक्षेप में ही बताया जा सकता है । जब लक्ष्मण की प्रवृतियों का आप सूक्ष्म अध्ययन करेंगे । तो बात स्पष्ट हो जायेगी ।
अब आ जाईये - राम पर । राम यानी हँस साधक । हँस योगी । आध्यात्म की सूक्ष्मता से परिचित न होने पर आपको संशय हो सकता है कि - धनुष राम ने क्यों उठाया । दरअसल यहाँ लक्ष्मण जीव की भूमिका में है । और जीव तमोगुण रूपी भार बिना चेतन या योग संयोग के नहीं उठा सकता । और राम..अब जीव के साथ ऐकाकार चेतन हँस साधक की भूमिका - रमता के संग समता हुय गयी । परो भिन्न पर पानी । मतलब चेतन के साथ एकता हो गयी । जब ते रघुनायक मोहे अपनाया । तब ते मोहि न व्यापे माया .. आदि आदि ।
यानी अब इस हँस साधक ने अपने योगबल से परिचय या संयोग होते ही शंकर के इस तमोगुणी लक्ष्यों वाले धनुष को उसी सुरति से उठा लिया । जो सुरति पहले जीव भाव में मायावी थी । वह अब भक्ति भाव में भक्त ( चेतन शक्ति से जुङना ) हो गयी । जैसे ही धनुष उठाया । अज्ञान रूपी सृष्टि कांपने लगी । और साधक के समक्ष से अहंकार छल कपट आदि दोष भागने लगे । या दूर हो गये । देखिये रामायण भी यही कहती है ।
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ।
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ।
राजाओं की आशा रूपी रात्रि नष्ट हो गई । उनके वचन रूपी तारों के समूह का चमकना बंद हो गया ( वे मौन हो गए ) अभिमानी राजा रूपी कुमुद संकुचित हो गए । और कपटी राजा रूपी उल्लू छिप गए ।
और फ़िर धनुष को तोङ डाला । और सीता ( सुरति द्वारा ) लक्ष्मण ( जीव ) का राम से एका ( विवाह हुआ ) । कहन सुनन की बात नही देखा देखी बात । दूल्हा दुल्हनि मिल गये फ़ीकी पङी बारात । सुरति समानी शब्द में ताको काल न खाय । शब्द भी यहाँ ररंकार ध्वनि या चेतन को कहा गया है । यानी हँस ज्ञान का पूर्ण हो जाना ।
अब देखिये । इस ज्ञान प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण अंग - गुरु । जब राम धनुष को उठाने चले । तो उन्होंने गुरु को मन ही मन प्रणाम किया । यहाँ एक बङी ही गूढ बात है । मैं फ़िर से कहता हूँ । तुलसीदास ने राम का चरित्र कविता के माध्यम से आपके मनोरंजन के लिये नहीं लिखा कि कुछ भी घटना कृम अनुसार कविता बन जाये ठीक ही है । बल्कि एक एक बात सटीक और बेहद रहस्यमय है । प्रश्न ये उठता है कि - राम ने अपने गुरु को मन ही मन प्रणाम क्यों किया ? प्रकट रूप से क्यों नहीं । दरअसल ये गुरु शिष्य मर्यादा का नियम था । अगर राम प्रकट रूप से प्रणाम करते । और तमोगुण रूपी धनुष नहीं तोङ पाते । तो उनकी वजह से गुरु की हँसी होती । जो कि शिष्य की मर्यादा के प्रतिकूल था । अतः राम ने मन ही मन प्रणाम करते हुये मर्यादा का पालन भी किया । और धनुष न तोङ पाने की स्थिति का पूरा दोषी भी स्वयं को ही रखा । क्योंकि धनुष नहीं टूटता । तो गुरु का तो कोई दोष नहीं था । शिष्य ही कहीं न कहीं अयोग्य था ।  
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा॥
मन ही मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया । और तिनके के समान धनुष को उठा लिया ।
विशेष - जैसा कि मैं हमेशा ही कहता हूँ कि इस लेख को भी आप सभी अंगों में पूर्ण हरगिज न मानें । स्थिति वर्णन भी मुख्य मुख्य और स्थूलता लिये हुये हैं । क्योंकि इतनी ही घटना में जितने पात्र और स्थितियां हैं । उन सभी का हरेक पहलू से वर्णन करने पर एक छोटा ग्रन्थ तैयार हो जायेगा ।
जैसा कि तुलसीदास ने कहा भी है ।
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनत न जात बखानी । यानी ये कथा अकथनीय है । कहना संभव ही नहीं । सिर्फ़ इसको योग भक्ति द्वारा ही समझा अनुभव किया जा सकता है ।
- आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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