02 अगस्त 2013

इस संसार में दुःख क्यों है ?


Mukesh Sharma पोस्ट " शिवजी कैलाश पर दिखाई क्यों नहीं देते - मुकेश " पर एक टिप्पणी 
गुरूजी ! आपको मेरा शत शत प्रणाम । मेरे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । पुनः आपकी सेवा में ? उपस्थित हूँ | आपके द्वारा दिए निम्न उत्तर के आधार पर मेरे निम्न सवाल और उत्पन्न हुये हैं ।
- जो आपको अभी पूर्व लिखित लग रहा है । वो कर्म आधार पर आपने ही पहले स्वयं लिखा था । और आज जो भी आप लिख रहे हैं । वह आगे फ़लित होगा । आपके पूर्व जन्म के कर्मफ़ल के आधार पर भाग्य ठीक उसी तरह से है । जैसे आपने पहले कमाकर अपने घर में दाल चावल मक्खन मलाई और फ़्रिज टीवी जैसे सभी सामान इकठ्ठा किये हों । और आगे उससे सुख उठायेंगे । या दुख ? ये आपकी बुद्धि विवेक और दूसरी अन्य चीजों पर निर्भर करता है ।

दूसरे उदाहरण में आपकी आज खोली गयी दुकान ( संचित धन या वस्तु आदि ) भाग्य की तरह है । लेकिन अब आगे उस दुकान से आप कमाते हैं । या गंवाते हैं । ये कर्म आपका अग्रिम कर्मफ़ल बनायेगा । थोङा सोचने से आराम से समझा जा सकता है । श्रीकृष्ण तो सभी जानते हैं । नम्बर 1 के झूठे थे । लेकिन वास्तव में इस बात का काफ़ी गहरा अर्थ है । चेतना और प्रेरणा आत्मदेव और प्रकृति के मिले जुले सौजन्य से होती है । और श्रीकृष्ण आत्म रूप में ही अपनी बात कह रहे थे । बुद्ध को वैसे आत्मज्ञान तो प्राप्त नहीं हुआ था । शून्य ज्ञान आदि ही प्राप्त हुआ था । फ़िर भी एक परम्परा वश ऐसा आंतरिक क्रियाओं में स्व प्रेरित ही होता है । यदि आप एक चीज को मानें कि जो आपके अनुभव में आये । वही सबसे बङा सत्य है । इतिहास जहाँ मूल जानकारी देता है । वहीं बारीक तथ्यों में भृम पैदा कर देता है । आप किसी भी चरित्र का गहराई से समग्र अध्ययन करें । तो तमाम विरोधाभास उसी एक चरित्र में उत्पन्न हो जायेंगे ।

पर गुरूजी उपरोक्त दिए आपके उत्तरों से मैं और ज्यादा भृमित हो गया हूँ । तथा मेरा मन अशांत हो गया । आपके दिए गए उत्तरों से लगता है कि मनुष्य पूर्ण रूपेण स्वतंत्र है । ( वास्तव में मनुष्य 84 लाख योनियों की कैद से मनुष्य जन्म में एक तरह से अपने कर्म जाल काटकर उद्धार करने के लिये जमानत पर छूटा है । ये सब बात उसे गर्भ तक तो याद रहती है । परन्तु गर्भ से बाहर आते ही वह माया के प्रभाव में आने लगता है । और मनुष्य जन्म का उद्देश्य ही भूल जाता है । इस तरह मनुष्य मनुष्य जीवन में स्वतन्त्र और परतन्त्र दोनों है । परवश जीव स्ववश भगवन्ता । जीव अनेक एक श्रीकन्ता - राजीव )
तो मनुष्य इतना दुखी क्यों होता है ? ( सुख और दुख मन के धर्म हैं । आत्मा के नहीं । और ये मनुष्य न तन है । न मन है । बल्कि यह आत्मा ही है । अतः ये जीव मन से खुद को शरीर ही मानता हुआ किसी शराबी के भांति वासनाओं के नशे में चूर हुआ करोंङों जन्मों से दुख भोग रहा है । और अज्ञानतावश स्वयं के कर्मों से ही दुखी है । जिस क्षण इसे खुद का बोध होगा । और समय के सच्चे सन्त या सदगुरु से इसकी भेंट होगी । यह दुखों से पार हो जायेगा - राजीव )
वह अपने कर्मों से अपना भाग्य क्यों नहीं बदल लेता ? सभी मनुष्य ताकतवर पैसे वाला होना चाहते हैं । क्यों नहीं हो पाते

- आप ऐसा इसलिये कहते हैं कि आप ( इसी ) जीवन के छोटे से हिस्से को ही जानते हैं । लेकिन जबसे आदि सृष्टि का ये खेल शुरू हुआ है । प्रत्येक जीवात्मा इस खेल में अपने कर्म आधार पर कोई न कोई भूमिका निभा रहा है । पशु पक्षी सुर असुर नर जलधर कीट पतंग । सबही उत्पति कर्म से सहजो नाना अंग । काल सृष्टि में कर्म प्रधान फ़ल ही है - कर्म प्रधान विश्व रच राखा । जो जस करे सो तस फ़ल चाखा । दिद्धै दोष न दीजिये । दोष कर्मा आपणियां । जो कियो सो पायो । दोष न दीजै अमरजणा । आत्मज्ञान का एक महत्वपूर्ण सूत्र है - तप कर राज राज कर नरक । अर्थात पूर्व में कभी तप करने से अभी राज्य की प्राप्ति होती है । फ़िर राज्य ( भोगों ) में जो दोष होते हैं । उनसे आगे नरक की प्राप्ति होती है । जो मनुष्य आज ताकतवर और पैसे वाले हैं । वह पूर्व जन्मों के कर्मफ़ल स्वरूप हैं । और आज जो अच्छे कर्म धर्म पुण्य दान परोपकार आदि कर रहे हैं । वह अगले जन्मों में होंगे । और ये व्यवहारिक भी है । उदाहरण के लिये मान लीजिये । एक सामान्य आमदनी का व्यक्ति कार कोठी आदि ( आज ही ) खरीदना चाहता है । तो वह कई वर्ष तक आवश्यक धन को कमाकर बचाकर इकठ्ठा करेगा । तब वह दस बीस साल बाद ( यहाँ अगला जन्म ) अपनी वांछित वस्तु खरीदेगा । तो फ़िर कोई भी कमाकर एकदम से क्यों नहीं ले लेता ? अब क्योंकि जीवन निरन्तर है । अतः अच्छे बुरे कर्म एक लङी रूप में पिरोये हुये लगातार खट्टे मीठे जीवन का सृजन करते रहते हैं ।
1 सभी मनुष्यों में असमानता क्यों है ? 
- असमानता से आपका क्या आशय है । मैं समझ नहीं पाया । 84 लाख योनियों में चार लाख प्रकार के मनुष्य । आदि सृष्टि से अब तक के उनके पाप पुण्य आदि कर्म समूह । तीन गुणों का समावेश । काल माया का प्रभाव । वासना का नशा और आकर्षण । जाति वर्ण कुल देश काल आदि से मिले संस्कार । और जीव का निज स्वभाव आदि मिलकर इतनी विभिन्नता और असमानता का सृजन करते हैं । इसलिये सृष्टि के लिये विलक्षण शब्द का प्रयोग होता है । नाना भांति राम विस्तारा । रामायन सत कोटि अपारा । राम जन्म के हेत अनेका । अति विचित्र एक ते एका ।  यहाँ जो राम शब्द का प्रयोग हुआ है । वह दशरथ पुत्र राम या किसी अन्य राम के लिये नहीं । बल्कि आत्मा ( राम ) की चेतना ( ररंकार या चेतन राम ) के लिये हैं । जिसको सरल शब्दों में कहते हैं - सबमें वही परमात्मा ही है ।
2 क्यों हर मनुष्य की सीमाए निर्धारित क्यों है ?
- सिर्फ़ मनुष्य की ही नहीं अनगिनत सृष्टियों के देवी देवताओं महाशक्तियों तथा वहाँ के जीवों की भी सीमायें अपनी स्थिति के अनुसार निर्धारित हैं । जैसे मनुष्य और प्रथ्वी के अन्य जीव भी भाग्य और कर्मफ़ल वश वहुत विस्तार या बहुत सीमित पाते हैं । उदाहरण के लिये पिंजरें का पक्षी । और मुक्त आकाश में विचरने वाला पक्षी । उदाहरण के लिये एक बेहद गरीब और अनपढ इंसान । और एक बहुत धनी और उच्च शिक्षित इंसान । गौर करें । तो इनकी सीमाओं और पहुँच में बहुत अन्तर है । जबकि शरीर दोनों का एक सा ही है । उत्पत्ति एक ही तरह से है ।
3 हर मनुष्यों की सोच अलग -२ क्यों है ?
- इसका उत्तर ऊपर के उत्तर में आ गया है । यदि ऐसा न होता । तो इंसान की जिन्दगी और सृष्टि में जो बहुरंगी विभिन्नता है । फ़िर वह न होकर सृष्टि मशीनी होती । और तब जीवन बेहद बोरिंग ही होता ।
4 क्यों दुःख है इस संसार में ? 
- जीवन का मतलब ही दो पक्षों का होना है । जन्म मरण । सुख दुख । दिन रात । अच्छा बुरा । पुण्य पाप आदि ।  यदि दूसरा पक्ष न हो । तो पहले का भान कैसे होगा ? सुख दुख जीव के कर्मों के आधार पर होते हैं । आप कैसे कह सकते हैं । सिर्फ़ दुख ही है इस संसार में । बहुत से मनुष्य इसी प्रथ्वी पर स्वर्गिक सुख भोग रहे हैं ।
5 एक मनुष्य अच्छे कर्म करता है । एक बुरे क्यों ? जैसा आप कहते हैं कि मनुष्य पर उसके पूर्व जन्मों का प्रभाव है । तो वो पूर्व जन्मों में ऐसे कर्म क्यों नहीं करता कि उसे सब अच्छा प्राप्त हो ?
- पूर्व जन्म की बात छोङिये । अभी सबको पता है । चोरी करेंगे । हत्या करेंगे । तो फ़ांसी और कठोर कारावास होगा । यदि मेहनत नहीं करेंगे । तो निर्धनता आयेगी । नशे आदि का व्यसन करेंगे । तो स्वास्थय और घर बरबाद होगा । फ़िर भी करोङों लोग ऐसा ही करते हैं । दरअसल ये जीवन इच्छाओं का मन शरीर और तीन गुणों से रचा गया खुद का खेल ही है । जो अज्ञानतावश सत्य सा प्रतीत होता है । स्व बोध हो जाने पर सुख दुख जन्म मरण ये खेल ही हो जाता है । देह धरे के दण्ड को भोगत है सब कोय । ज्ञानी भोगे ज्ञान से मूरख भोगे रोय ।
6 क्यों संसार में सभी मनुष्य की बुद्धि सोच ,शारीरिक क्षमतायें अलग -२ हैं ? और भी अनेक विभिन्नतायें हैं । 
- विलक्षण सृष्टि का रहस्य संक्षेप में नहीं बताया जा सकता । फ़िर भी ऊपर के उत्तरों पर गौर से मनन करने पर आप काफ़ी जान सकते हैं । प्रायोगिक स्तर पर जानने अनुभव करने के लिये किसी सच्चे सन्त या गुरु के सानिध्य में द्वैत अद्वैत ज्ञान द्वारा जाना जा सकता है ।
मेरा मानना है कि सभी मनुष्यों पर भौगोलिक अवस्था उसके परिवार के संस्कार और भी अनेक प्रकार की परिस्थियों का असर होता है । अर्थात मनुष्य परिस्थियों के वश है । जब मनुष्य इतना बंधा हुआ है । तो स्वतंत्र कैसे हो सकता है ? अर्थात मेरा मानना है कि पूरा संसार ( मनुष्य , जानवर , प्रकृति etc ) सभी साम्य की अवस्था में होते हैं । सभी के कर्मो का प्रभाव एक दूसरे पर होता है । अर्थात कोई भी मनुष्य स्वतंत्र नहीं है । सभी एक दूसरे से बंधे हुए हैं । हाँ यदि सारे संसार को एक मान लिया जाये । तो " संसार " स्वतंत्र है । अलग-२ मनुष्य स्वतंत्र नहीं हैं । मेरा मानना है कि सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । जैसे for eg. यदि एक नेता भृष्टाचार करता है । तो उसका फल सभी को भुगतना पड़ता है । कृपया गुरुदेव इसका उत्तर मुझे विस्तार से दें । जब तक मुझे इसका स्पष्ट उत्तर नहीं मिलेगा । तब तक मेरा मन अशांत रहेगा । कृपया मैं ये ...( अधूरा और यहीं तक ) मुकेश शर्मा,अलवर, राज .m.k sharma 

आप सभी के अन्तर में विराजमान सर्वात्म प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर साष्टांग नमन ।

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