03 दिसंबर 2016

आत्मबोध के सूत्र

षट संपत्ति आदि तप से पापविहीन, शान्तचित्त, वैराग्यवान मुमुक्ष पुरुषों को आवश्यक यह आत्मबोध विधिपूर्वक वर्णित है । 
दूसरे साधनों से ज्ञान ही एक स्वयं मोक्ष का साधन है । बिना ज्ञान के मोक्ष सिद्ध नही होता ।
(जैसे बिना अग्नि के रसोई)
विरोध न रखने से कर्म अज्ञान को दूर नही कर सकता । ज्ञान ही अज्ञान का नाश करता है । 
(जैसे तेज गहन अंधकार को)
आत्मा अज्ञान से ढका हुआ सा है । अज्ञान के दूर होते ही अकेला और स्वयं प्रकाशित होता है ।
(जैसे बादल हटने से सूर्य)
जीवात्मा अज्ञान से मलीन है । ज्ञान के अभ्यास से ही निर्मल होता है । ज्ञान हो जाने पर ज्ञान का अभ्यास स्वयं नाश हो जाता है ।
(जैसे जल को निर्मली)
राग द्वेष से भरा हुआ संसार स्वपन (के बराबर) ही है । अपने समय में (अज्ञान में संसार, नींद में स्वपन) सच्चा ही मालूम होता है । किन्तु ज्ञान होने, जानने पर झूठा ही हो जाता है ।
(जैसे अंधेरे में रस्सी का सर्प)
जब तक सबका आधार अद्वितीय ब्रह्म नही जाना जाता तब तक संसार सत्य ही मालूम होता है ।
(जैसे सीप में चांदी)
अनेकानेक प्रकार के जीव नित्यस्वरूप सच्चिदानन्द में बंधे हुये सं-कल्पित (ही) हैं ।
(जैसे सुवर्ण में कङे)
इन्द्रियों का स्वामी सर्वव्यापी परमात्मा अनेक प्रकार की उपाधियों में मिलकर उनके भेद से जुदा सा मालूम होता है और उन उपाधियों का नाश होते ही अकेला (ही) दीख पङता है ।
(जैसे आकाश)
जाति, (ग्रहस्थ, सन्यास आदि) आश्रम, नाम आदिक अनेक प्रकार की उपाधि के वश से ही आत्मा में कल्पित हैं ।
(जैसे जल में मीठा, खारी तथा नीला, सफ़ेद रंग)
पञ्चीकरण महाभूत से उत्पन्न, कर्मों का समूह, सुख दुख भोगने का घर ‘शरीर’ कहाता है । 
पाँच प्राण, दस इन्द्रियां, मन, बुद्धि इन 17 तत्वों से युक्त अपञ्चीकरण महाभूत से उत्पन्न सुख दुःख आदि भोगों का साधन करने वाला ‘सूक्ष्म शरीर’ है । 
कहने में न आने वाला अनादिकाल की माया से भरा हुआ ‘कारण शरीर’ कहाता है ।
आत्मा इन तीनों उपाधियों (शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर) से अलग ‘निरुपाधि’ है ।
आत्मा निर्मल है । अन्नमय आदि पाँच कोशों के संयोग से उस उस धर्म वाला सा स्थित जान पङता है ।
(जैसे नीले आदि वस्त्रों के साथ स्फ़टिक मणि)
कोशों से युक्त निर्मल अन्तरात्मा को युक्ति से विचार पूर्वक ग्रहण करना चाहिये ।
(जैसे कूटने से भूसी आदि से मिले धान्य को)
तो भी सब में रहता हुआ आत्मा सब में नही मालूम होता ।
(जैसे निर्मल दर्पण में प्रतिबिम्ब)
देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्रकृति इन सबसे विलक्षण इनके कार्यों का साक्षी आत्मा सदैव ही राजा के समान है । 
अज्ञानियों का आत्मा इन्द्रियों के मेल होने में व्यापारी सा दिखाई देता है । 
(जैसे दौङते हुये बादलों में दौङता चन्द्र) 
देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि ये सब चैतन्यात्मा का आसरा लेकर अपने अपने कार्यों में लगते हैं ।
(जैसे सूर्योदय पर जीव)
देह, इन्द्रिय, गुण, कर्म ये सब निर्मल सच्चिदानन्द परमात्मा में अज्ञान से कल्पित हैं ।
(जैसे आकाश में श्यामता)
मन की उपाधि का (कर्ता भोक्तापन आदि) आत्मा में अज्ञान से कल्पना किया जाता है ।
(जैसे जल का हिलना, जल में चन्द्र प्रतिबिम्ब)
सुख दुःख इच्छा आदि राग जो कि बुद्धि में उसके होते ही रहते हैं । सुषुप्ति अवस्था में उस बुद्धि के नाश हो जाने पर नही रहते । इसलिये ये बुद्धि के ही धर्म हैं आत्मा के नहीं ।
जैसे सूर्य का प्रकाशपना, जल की शीतलता, अग्नि की उष्णता स्वभाव से है । ऐसे ही आत्मा का सत्य, शाश्वत होना, ज्ञान, आनन्दस्वरूप, निर्मल होना ये स्वाभाविक है ।
आत्मा का सत्य चैतन्य का अंश और बुद्धि के सुख, दुःख, इच्छा आदि कार्य ये दोनों मिलकर अज्ञान से ‘मैं जानता हूँ, सुखी हूँ दुःखी हूँ’ ऐसे व्यवहार चलते हैं ।
आत्मा के विकार नही है और बुद्धि के ज्ञान नही होता । जीवात्मा सब मलीनता को जान के ‘मैं करता हूँ, मैं देखता हूँ’ ऐसा मोहित होता है ।
रस्सी को सर्प की तरह, आत्मा को जीव जानकर भय प्राप्त होता है । यदि ‘मैं जीव नही आत्मा ही हूँ’ ऐसा जाने तो निर्भय होता है ।
एक ही आत्मा बुद्धि और इन्द्रियों को प्रकाशित करता है । उन जङों से आत्मा प्रकाशित नही होता ।
(जैसे दीपक घङे को)
आत्मा ज्ञानरूप होने से अपने जानने पर दूसरे के जानने की इच्छा नहीं होती । जैसे दीपक को दूसरे दीपक की इच्छा नहीं होती । ऐसे ही आत्मा स्वयं प्रकाश करता है ।
‘नेति नेति’ इस वेदवाक्य से सब उपाधियों का निषेध कर ‘तत्वमसि’ महावाक्य से जीवात्मा परमात्मा की एकता जाने ।
विद्यमान शरीर आदिक जो दिखाई पङता है बुलबुले की भांति नाशवान जाने और मैं इनसे विलक्षण निर्मल ब्रह्म हूँ ऐसा जाने ।
जन्म, मरण, बुढ़ापा, दुबला होना आदि देह में हैं मुझ में नहीं हैं । क्योंकि मैं उससे अन्य हूँ और बिना इन्द्रिय वाला हूँ । इससे शब्द, स्पर्श आदि विषयों का संग भी मेरा नही है ।
मन रहित होने से राग, द्वेष, दुःख, भय आदि मुझ में नहीं हैं । मैं प्राणरहित मनरहित निर्मल रूप हूँ ।
इस आत्मा से प्राण, मन, समस्त इन्द्रियां, आकाश, वायु, अग्नि, जल और संसार के धारण करने वाली प्रथ्वी उत्पन्न होती है । 
सत, रज, तम गुण से रहित, आना जाना जैसी क्रियाओं से रहित, संकल्प विकल्प से रहित, मायिक दोषों से रहित, जन्म आदि षट विकारों से रहित, निराकार, सदा मुक्तस्वरूप, निर्मल ही हूँ ।
मैं आकाश की तरह सब में बाहर भीतर रहने वाला, नाशरहित, सदा सब में बराबर निर्दोष, सबसे अलग, निर्मल, अचल हूँ ।
सदा स्वच्छ, मुक्त, एक अखण्ड आनन्द जो सत्य, अनन्त, ज्ञानरूप परब्रह्म है, वह ही मैं हूँ ।
ऐसी प्रतिदिन की अभ्यास वाली यह वासना कि - मैं ब्रह्म ही हूँ । अज्ञान के विक्षेपों को दूर करती है ।
(जैसे रसायन रोगों को)
एकान्त स्थान में आसन पर बैठ वैराग्यवान व जितेन्द्रिय हो एकाग्रचित्त कर उस अनन्त अद्वितीय परमात्मा का ध्यान करे ।
सुन्दर बुद्धि वाला पुरुष बुद्धि से सब दिखते हुये संसार को आत्मा में ही लीन करके सदा निर्मल आकाश की तरह एक परमात्मा का ध्यान करे ।
आत्मज्ञानी पुरुष सब नाम वर्ण आदि छोङ के पूरे चैतन्यानन्द रूप से रहता है ।
जानने वाला व जानने की वस्तु और जिसके द्वारा जाना जाये, ये भेद परमात्मा में नही है । सच्चिदानन्द रूप होने से अपने आप ही प्रकाशित होता है ।
इस प्रकार सदा अरणिरूपी आत्मा में मंथनरूपी ध्यान करने से उत्पन्न हुयी अग्निरूपी अभ्यास की गति सारे ईंधनरूपी अज्ञान को भस्म करती है ।
पहले घोर अन्धकार के दूर करते अरुण (ललाई) की तरह ज्ञान से अज्ञान दूर होता है फ़िर सूर्य की तरह आत्मा अपने आप ही उदय होता है ।
निरन्तर रहता हुआ भी आत्मा अज्ञान से न रहने के ही बराबर है और उस अज्ञान के दूर होते पहले ही से रहता हुआ सा मालूम होता है ।
(जैसे गले का आभूषण)
भ्रम से ठूंठ में मनुष्य की तरह ब्रह्म में जीवत्व किया गया है । जीव का तत्व स्वरूप उस ब्रह्म के देखने से अज्ञान से हुआ जीवभाव दूर हो जाता है ।
अपना तत्वरूप जान लेने से उत्पन्न हुआ ज्ञान शीघ्र ही ‘मैं, मेरा, यह’ अज्ञान दूर करता है ।
(जैसे ज्ञान होने पर दिशा का भ्रम)
अच्छे प्रकार का ब्रह्मज्ञानी योगाभ्यास में लगा हुआ ज्ञानदृष्टि से अपने ही में सबको स्थित और सब एक आत्मा है, ऐसा देखता है ।
यह सब संसार आत्मा ही है । आत्मा से अन्य कुछ नही है । जैसे मिट्टी और घङे आदि मिट्टी ही हैं । ऐसे ही सबको अपनी आत्मा ही देखता है ।
और उस ब्रह्म का जानने वाला पहले के नाम वर्ण आदि उपाधि और गुणों को छोङ देवें सच्चिदानन्द रूप होने से जीता ही हुआ मुक्तिरूप हो जाता है ।
(जैसे कीङा भ्रमर)
योगाभ्यास करने वाला मोहरूपी समुद्र को उतर राग द्वेष आदि राक्षसों को मार शान्ति से भरा हुआ अपनी आत्मा ही में आराम करता हुआ विराजमान होता है ।
बाहर के झूठे सुखों का लगाव छोङ आत्मसुख से युक्त अपने अंतस में ही घङे में रखे दीपक की तरह साफ़ प्रकाशता है ।
नाम वर्ण आदि उपाधियों में रहता हुआ भी मुनि उनके धर्मों से आकाश की तरह नहीं लिपटता है । सब कुछ जानता हुआ भी अज्ञानी की तरह रहे और बिना लगाव वायु की तरह आचरण करे ।
मनन करने वाला उपाधियों के दूर होने से भगवान में पूरी तरह लीन होता है ।
(जैसे जल में जल, आकाश में आकाश और अग्नि में अग्नि)
जिस आत्म लाभ से अधिक दूसरा लाभ नही, जिस सुख से अधिक दूसरा सुख नहीं । जिस ज्ञान से अधिक दूसरा ज्ञान नहीं । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जिस आत्मा को देखकर और देखना नही रहता व जिस आत्मरूप हो जाने पर फ़िर होना नही होता व जिसका ज्ञान होने से और जानना नही रहता । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जो एक, नित्य, अनन्त, अद्वितीय, सच्चिदानन्द ऊपर नीचे तिरछे पूर्ण है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जो अविनाशी, एक, अखंड, आनन्दरूप, बारबार नेति नेति रूप से वेदान्त द्वारा समझाया जाता है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
उस अखन्ड आनन्दरूप परमात्मा के लव मात्र आनन्द का आसरा लेकर सब ब्रह्मा आदिक क्रम से अधिकाधिक आनन्दित होते हैं ।
सारी वस्तु उस परमात्मा से मिली हुयी है और सब व्यवहार में भी उसका मेल है । इसलिये ब्रह्म सर्वत्र है ।
(जैसे सभी दूध में घी)
जो बहुत बारीक अणु नही है, स्थूल नही है, छोटा नही है, बङा नही है, न जन्म लेता है न मरता है और रूप गुण वर्ण नाम आदि नही है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जिस परमात्मा के प्रकाश से सूर्य आदि प्रकाशित होते हैं और जिस सूर्य आदि के प्रकाश से वह नही प्रकाशित होता है । जिससे यह सब संसार सुशोभित है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
परमब्रह्म अपने आप भीतर बाहर व्याप कर सारे संसार को प्रकाशित करता हुआ जलते हुये अग्नि से लोहे के गोले सा प्रकाशित होता है ।
ब्रह्म संसार से विलक्षण है । ब्रह्म से अन्य कुछ भी नही है । यदि ब्रह्म से अन्य मालूम हो तो झूठ है ।
(जैसे निर्जल स्थान में जल की तरह सूर्य की किरण)
जो जो दिखाई सुनाई पङता है । वह ब्रह्म से अन्य नही होता है और वह तत्वज्ञान से अद्वितीय सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है ।
ज्ञान दृष्टि वाला सच्चिदानन्द परमात्मा को सब में रहता हुआ देखता है । अज्ञान दृष्टि वाला नही देखता है ।
(जैसे अन्धा प्रकाश करते हुये सूर्य को)
वेदान्त श्रवण मनन आदि से जगाये हुये ज्ञान रूपी अग्नि से जले हुये सब मलीनताओं से छूटा हुआ जीव सोने की तरह अपने आप चमचमाता है ।
आत्मा ज्ञानरूपी सूर्य है । आकाशरूपी ह्रदय में उदय हो अंधकाररूपी अज्ञान को दूर कर सब में व्याप्त होकर सबको धारण करते व सबको प्रकाशित करते सुशोभित होता है ।
जो विचार त्यागी पुरुष स्थान समय आदि को बिना देखे शीत उष्ण आदि को दूर करने वाले सब में रहने वाले मायारहित, नित्य, आनन्दरूप अपने आत्मतीर्थ को सेवन करता है । वह सब कुछ जानने वाला सब में रहता हुआ मुक्त होता है ।
श्री परमहंस परिब्राजकाचार्य श्री मच्छंकराचार्य ‘आत्मबोध’
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