10 दिसंबर 2016

कैसे जीता रवि से कवि ?

प्रथमदृष्टया यह आत्मज्ञान के बेहद गूढ़ दृष्टांतों में से है और जिनको समाधि में प्रत्यक्ष होने वाले दृश्यों और खाली अन्तःकरण का अभी अनुभव नही है । उनके लिये समझना कठिन ही है । फ़िर भी ‘एकात्मा सर्वाय’ होने से यह ‘चेतना’ को गहरे में ‘कहीं’ झंकृत अवश्य करेगा । इसी आशा के साथ !
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एक राजा ने दो निपुण चित्रकारों (रवि और कवि) की प्रतिभा परीक्षा ली । 
उसने दोनों चित्रकारों से कहा - आमने सामने स्थित इन दो गज का फ़ासला रखने वाली दोनों दीवारों पर आप लोग अलग अलग चित्रकारी करिये ।
राजा की आज्ञा होते ही दोनों दीवारों के मध्य पर्दा तान दिया गया । जिससे वे चित्रकार एक दूसरे का कार्य न देख सकें ।
चित्रकार प्रतियोगिता सम्पन्न करने में लग गये । वे प्रतिदिन आते और अपनी अपनी दीवार पर काम करने के पश्चात चले जाते ।
नियत अवधि बीतने पर राजा साहब अपने सभासदों के साथ चित्रकारों की कला देखने उनके स्थान पर पधारे ।
पहले रवि की दीवार से पर्दा उठाया गया । सभी दर्शक दंग रह गये ।
- अ हा..अ हा । करते हुये बोले - चीन के चित्र भला इससे बढ़कर क्या होंगे ?
तुरा दीदा व मानी रा शुनीदा ।
शुनीदा कै बुबुद मानिंदे दीदा ।
(मैंने तुझको तो देखा है और मानी का केवल नाम सुना है । भला सुना हुआ देखे के बराबर कैसे होगा)
सभी कहने लगे - यह तो हद ही हो गयी । इससे अच्छा चित्रण हो ही नही सकता । रवि चित्रकार ही यह प्रतियोगिता जीतेगा । महाभारत की समस्त घटनाओं को नये सिरे से सजीव ही कर दिया । चित्र जैसे बोल पङने ही वाले थे । इससे बढ़कर तो ख्याल (कल्पना) भी नही हो सकता ।
रवि को पूरे अंक मिलने चाहिये । इनाम इसी को दिया जाना चाहिये । अब कोई आवश्यकता ही शेष नही कवि की कारीगरी देखने की । कमाल है भाई कमाल है ।
त्रप्त तो स्वयं राजा साहब भी ऐसे हो गये थे कि जी नही चाहता था कि कवि की चित्रकारी देखने का कष्ट उठायें ।
किन्तु कवि ने स्वयं ही पर्दा उठा दिया ।
पर्दा उठने की देर थी कि चारो ओर घोर आश्चर्य से निस्तब्धता छा गयी । राजा साहब और अन्य श्रीमन्त लोग दाँतों तले उंगली दबाकर रह गये । कुछ पल के लिये भीतर का स्वांस भीतर और बाहर का बाहर ही रह गया । जिधर देखो सबके सब जङवत और विस्मित से खङे थे ।
आखिर क्या हुआ ! कवि ने ऐसा क्या सितम कर दिया, क्या गजब ढाया उसने ?
ओहो ऐसी अदभुत सफ़ाई..दृष्टि फ़िसली सी जा रही थी । देखो तो सही, दीवार के दो गज भीतर घुसकर चित्र बना आया ।
- हाय जालिम ने मार डाला । क्या ही ठीक निकला यह वाक्य - जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि ।
रवि से कवि कैसे जीता ?
दोनों दीवारों का अन्तर लगभग दो गज का था । तय समयावधि के भीतर रवि तो अपनी दीवार पर रंग रोगन चढ़ाता रहा और इतने समय में कवि अपनी दीवार की सफ़ाई एकाग्रचित्त होकर करता रहा । यहाँ तक कि उसने दीवार एकदम स्वच्छ (दर्पण) बना दी । अतः इस झलकती ढलकती दीवार के मुकाबले रवि की दीवार खुरदरी और भद्दी लगती थी । इसलिये रवि की सब मेहनत एक सफ़ाई की बदौलत कवि ने मुफ़्त हासिल कर ली ।
और दृक शास्त्र (optics) के प्रसिद्ध सिद्धांत के अनुसार जितना अन्तर दीवारों के मध्य में था । उतने ही अन्तर पर कवि की दीवार के भीतर (रवि के) चित्र दिखाई देते थे ।
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ऐ अपरा विद्या के विद्यार्थियो ! ह्रदय पटल पर रवि की भांति चित्रकारी कहाँ तक पङे करोगे । सतह ही सतह (प्रथ्वी तल) पर विविध भांति के रूप कहाँ तक भरोगे । धंसे हुये (crammed) विविध वर्ण मस्तिष्क में कब तक रंग जमायेंगे और बिखरे हुये विचार ठूंस ठूंस कर भरे हुये कब तक काम आयेंगे ।
(आत्म) शिक्षा का अर्थ है - भीतर से बाहर निकालना (खाली करना, होना) न कि बाहर से भीतर ठूंसना । शिक्षा के मुख्य उद्देश्य को कब तक गङबङ करोगे ?
क्यों नहीं कवि की तरह उस पवित्रता (purity) और आत्मज्ञान दिलाने वाली विद्या की ओर चित्त देते ।
(मैं अपने घायल चित्त को हरदम नाखूनों से छीलता हूँ जिसमें यार (परमात्मा) के ख्याल के अतिरिक्त प्रत्येक ख्याल को चित्त से बाहर निकाल दूँ)
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