13 मई 2012

परम संतुष्टि और परमात्मा की प्राप्ति कैसे ?

जय जय श्री गुरुदेव ! प्रणाम 
यह मेरा प्रथम मेल है आपके लिए । मैं अपना परिचय करा दूँ आपको, थोड़ा बड़ा हो गया है । कष्ट के लिए कृपया क्षमा करें ।
मेरा नाम स्वपनिल तिवारी है और मैं 22 वर्ष का हूँ । मैं सतना (म. प्र.) में अपने माता पिता और बड़े भाई के साथ रहता हूँ । मैं स्वभाव से थोड़ा शर्मीला और शांत प्रवृत्ति का हूँ, मुझे एकांत पसंद है । मैंने 1 वर्ष पूर्व कम्प्यूटर विषय से अभियांत्रिकी की पढ़ाई पूरी की है । पढ़ाई के लगभग अंतिम समय के दौरान मुझे ऐसा लगता था कि मैं भी अगर नौकरी करूँगा, पैसा कमाऊंगा, मान बढ़ाऊंगा  तो यही करते करते जिंदगी निकल जायेगी और अंत में मर जाऊंगा । इससे कुछ नहीं मिलने वाला । इस विषय पर गहन चिंतन करने से मेरा आध्यात्म से लगाव हुआ । पढ़ाई समाप्त होने पर मैंने सोचा कि ज्ञान की तलाश में निकलूँ पर मुझे लगा कि घरवाले नहीं मानेंगे ।
इसलिए मैंने नौकरी का बहाना बनाया और निकल गया दिल्ली । असल में यह बहाना नहीं था । गया तो मैं कुछ परिचितों के साथ काम करने के लिए ही था पर मेरा मुख्य उद्देश्य वहाँ से हरिद्वार या ऋषिकेश निकलने का था पर ऐसा हो न सका ।
दिल्ली में ही मेरे साथ कालेज के 1 मित्र भी रहते थे । हम दोनों अधिकतर ही आध्यात्म के बारे में बाते करते थे । जिसके बीच ही वो अपने गुरुजी का भी विवरण करते थे और उन्होंने बताया था कि - वे परमहंस हैं और कानपुर के पास के ही हैं । 
जितनी भी उनसे बात हुई । उससे तो मुझे उनके गुरुजी बहुत ही अच्छे संत जान पड़ते हैं । दिल्ली में ही 1 बार उनके गुरूजी से मेरी फोन पर बात हुई थी और उन्होंने मुझसे मिलने को कहा था पर अभी तक ऐसा संभव न हो सका ।

फिर वहीं पर मेरे साथ ही काम करने वाले 1 और भईया थे । उन्होंने भी अपने गुरुजी के बारे में मुझे बताया, उनके अनुसार - वे भी परमहंस हैं और बहुत ही कम बोलते हैं और लोगों के नाम पहचान भूल जाया करते हैं । उन्हें बार बार याद दिलाना पड़ता है ।
उन्होंने बताया कि उनके गुरूजी लोगों के प्रश्न पूछने पर गीता के श्लोकों के माध्यम से उत्तर दिया करते हैं । इसके अलावा यदाकदा ही बोला करते हैं और गुरूजी के वचनों का अर्थ तथा अन्य बातें उनके साथ के महंत जी बताते हैं । तब तक मैं संत मत के बारे में कुछ भी नहीं जानता था और मेरे लिए साधू, संत, सन्यासी, फ़कीर, परमहंस सब 1 ही थे ।
दिल्ली में 3 माह रहने के बाद मुझे ऐसा लगने लगा कि यहाँ पर मैं किन्ही कारणों वश फँसा जा रहा हूँ और ऋषिकेश या हरिद्वार जाने की व्यवस्था के अभाव में मेरा मुख्य उद्देश्य भी विफल रहा । 
तब मैं तत्काल ही वापस घर लौट गया । घर लौटने पर कुछ दिनों के पश्चात मुझे अपने अंदर अजीब सा खालीपन लगने लगा । पहले जितनी इच्छाएँ थी अब किसी का भी पता नहीं था, यह लगभग 7 महीने पहले की बात है ।
ऐसे में मैंने सोचा कि इस स्थिति को लंबे समय तक बनाये रखने के लिए कुछ प्रयोग करना चाहिये । क्योंकि उस स्थिति में एक अनोखी शांति थी । मैं इस विषय में टहलते हुए चिंतन कर ही रहा था कि मुझे अपने घर में रखी हुई भगवद गीता पर नजर पड़ी । वह छोटी सी पुस्तक के रूप में थी और थोड़ी पुरानी थी । मुझे बचपन में उससे बहुत लगाव था । जबकि मैंने उसे पहले कभी पढ़ा नहीं था । मैंने उसे पढ़ने का निर्णय किया । मुझे उस छोटे आकार की गीता पढ़ते देख मेरी माताजी ने मुझे बड़े आकार वाली गीता दे दी, जो वे स्वयं पढ़ा करतीं थीं ।
वह साधारण गीता ही थी जिसमें संस्कृत श्लोक के साथ हिंदी में अर्थ भी था । मैं प्रत्येक दिन 1 अध्याय पूरा करता था और पूरे दिन अपनी बुद्धि के अनुसार उस पर चिंतन करता था । हर दिन नए अध्याय के साथ अनेकों प्रश्न आते रहे । मैं अपने स्तर पर उन प्रश्नों का हल कभी इंटरनेट के माध्यम से कभी आस लगाकर टीवी कम्प्यूटर आदि पर प्रवचन (मोरारी बापू, चिन्मयानन्द बापू, प्रेम भूषण जी महाराज, जगतगुरु श्री कृपालू जी महाराज) और संत वाणी सुनकर ढूँढता ।
मैंने लोगों से सुना कि गीता महागुप्त विषय है, इसमें अनेकों रहस्य छुपे हैं तो मैंने और जानने के लिए गीता का शांकर भाष्य भी माँग कर अच्छे से अध्यन किया और शंकाओ का समाधान भी उपरोक्त माध्यमों से करता रहा जिससे मुझे अद्वैत का मूलभूत ज्ञान हुआ । 
फिर द्वैत के बारे में भी जानने को सोचा तब मैंने कृपालु जी महाराज की ‘प्रेम रस सिद्धांत’ पढ़ी । अब बड़ी अजीब विडंबना ये लगी कि - पहले तो मैंने अद्वैत पढ़ा था जिसमें ज्ञान ही सब कुछ था । पर अब इस पुस्तक में ज्ञानी को ‘शठ’ कहकर संबोधित करा गया और बहुत आलोचना करी गयी । कहा गया कि ज्ञानी व्यक्ति कभी भी ‘कृष्ण’ के प्रेमरस का पान नहीं कर सकता परन्तु फिर बाद में मैंने कहीं से पढ़ा कि यह दोनों ‘ज्ञान और भक्ति’ एक दूसरे के पूरक हैं । एक को प्राप्त करने निकलो तो दूसरा अपने आप ही प्राप्त हो जाता है । इससे मुझे थोड़ी संतुष्टि मिली ।
मैंने पता करना चाहा कि - परम संतुष्टि और परमात्मा की प्राप्ति कैसे संभव है ?
तब किसी ने कहा 12 वर्ष का अखण्ड बृह्मचर्य (जिसके 8 प्रकार हैं) मात्र का पालन करो ।
किसी ने कहा - ज्ञान की प्राप्ति एकांत देश में होती है । हिमालय जैसी जगह में साधने से ।
किसी ने कहा - कलयुग में केवल तंत्र मार्ग ही है ऐसा शंकर जी ने बताया है ।
हर जगह से अलग अलग मार्ग के बारे में कहा जाने पर मैंने निश्चय किया कि - मैं स्वयं अध्ययन करके पता करूँगा कि - कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है ?
इस प्रकार अलग अलग यत्नों से धीरे धीरे मुझे - सांख्य, योग, आसन, मुद्रा, बंध, प्राणायाम, स्वर योग, पंचकोश, सप्त 7 कुण्डलिनी चक्र, त्रिग्रंथी, परमात्मा की शक्तियां, परा, अपरा विद्या, मन्त्र, तंत्र, यंत्र इत्यादि के विषय में ज्ञात हुआ । तभी से मैंने अपने अध्ययन के साथ ही इन सभी विषयों पर प्रयोग भी शुरू किये ।
सर्वप्रथम मैंने मन्त्र की सहायता ली । मुझे मेरे दिल्ली में साथ में रहने वाले मित्र ने ही बताया था कि श्रीकृष्ण महामंत्र (हरे कृष्ण हरे कृष्ण .....हरे राम) में बहुत अदभुत शक्ति है और इसे हर परिस्थिति में प्रयोग किया जा सकता है ।
तब मैंने सोचा कि अन्य किसी मन्त्र कि अपेक्षा यह सरल भी है और इसमें त्रुटि होने की सम्भावना भी कम है और मैं तत्क्षण इस मन्त्र का मुख के अंदर ही उच्चारण करने लगा । मैं इस मन्त्र को हर समय उच्चारता रहता । सोने से पहले तक उच्चारता रहता और सोने के समय इसे मन ही मन कहने की कोशिश करता । समय के साथ ही इसके प्रयोग से मेरे मन का भटकाव कम हो गया ।
जितना मुझे समझ में आया था । उससे मुझे ये अंदेशा था कि - मन 1 समय में 2 ही विषयों पर कार्यरत रहता है । 1 तो जो हम प्रत्यक्ष कर रहे होते हैं और दूसरा जिसके बारे में हम विचार कर रहे होते हैं । क्योंकि मैं इसे हर कार्य के समय उच्चारता था । इसलिए मेरा ध्यान किसी 1 कार्य से कहीं और नहीं जाता था । इससे मुझे बहुत स्थिरता मिली । मैंने इस स्थिरता का प्रयोग योग के लिए किया । मैं प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करता हूँ । उसी के साथ मैं पाठ के पहले योग और ध्यान करने लगा ।
मैंने पढ़ा था कि योग की शक्ति सूर्य नारायण भगवान से प्राप्त होती है और सृष्टि के प्रारंभ में परमात्मा ने सूर्य को ये ज्ञान दिया था । तभी से मैं सूर्य भगवान को जल अर्पित करने लगा ।
योग के लिए मैं सर्वप्रथम पदमासन में बैठ जाता । फिर थोड़ी देर तक स्वांस को सहज होने देता । मुझसे पूरक और रेचक 5 सेकंड से अधिक न हो पाता । इसलिए मैं आंतरिक और बाह्य कुम्भक पर ज्यादा ध्यान देता । मैं बाह्य कुम्भक लगभग 3 मिनट तक कर लेता । यह क्रिया मैं 5 बार दोहराता । पश्चात मैं भस्त्रिका, अनुलोम विलोम और कपाल भांति करता ।
अनुलोम विलोम को मैं ज्यादा समय देता । अंत में मैं 3 बार त्रिबंध कर सहज हो जाता । फिर मैं ध्यान लगाने का प्रयास करता । 
ध्यान के लिए मैं अपना अवलोकन करता, देखता कि - मेरा मन कहाँ कहाँ जा रहा है ? कभी कभी मैं मन ही मन खुद से बात करता और मन को शांत करने का प्रयास करता । यह प्रयोग बहुत हद तक सफल रहा । मुझे 4 से 5 बार ऐसा लगा । जैसे मैं दोनों आँखों के मध्य से कहीं अंदर जाता जा रहा हूँ । इस कारण मैं रोमांचित हो जाता । अँधेरे से जैसे ही मैं पार होता वैसे ही मुझे हर ओर प्रकाश फैलता दिखाई देने लगता पर यह ज्यादा समय तक न हो पाता । रोमांच और अनजाने के भय के कारण मेरा ध्यान टूट जाता । शरीर काँपता रहता, रोवें खड़े हो जाते और हाथ पैर से पसीना निकलने लगता और यह सब ठण्ड के मौसम की बात है ।
ध्यान के समय मुझे ठण्ड का पता न रहता था और जब भी आँखे खुलती तो मैं देखता कि - मेरी आँखें नासिका के अग्रभाग पर केंद्रित रहतीं पर ध्यान भी हर बार नहीं लग पाता है ।
मैंने इस बात पर गौर किया कि - जब भी मैं बिना किसी अपेक्षा के बिना कोई समय सीमा तय किये ध्यान करता तभी मुझे सफलता मिलती । इसकी कोशिश मैं अभी भी करता रहता हूँ ।
अध्ययन के लिए मैं इंटरनेट का बहुत प्रयोग करता क्योंकि मेरे घर में या आसपास कोई भी इन विषयों पर ध्यान नहीं देता ।
मैं हमेशा से ही पूजा पाठ वाले वातावरण में बड़ा हुआ हूँ पर यहाँ पर अधिकतर लोग कर्मकांड पर ही ज्यादा ध्यान देते हैं तो मैं गूगल यू टयूब आदि वेबसाइटों पर ही अध्यात्मिक विषयों के बारे में खोजता रहता ।
ऐसे में ही कई बार आपके ब्लॉग से मैंने कुछ विषयों को पढ़ा पर वे संतमत से नहीं जुड़े थे और मैंने ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया था क्योंकि मेरा विषय योग ध्यान और परमात्मा की शक्तियों पर था । और खोजते समय भी परिणाम उसी से जुड़े हुए मिलते थे जिनमें आपका ब्लॉग भी था ।
फिर 1 दिन मैं टीवी पर धार्मिक चैनलों पर अपनी रूचि के अनुसार विषय खोज रहा कि तभी मैं 1 चैनल पर आकर रुका जिसमे श्री मधु परमहंस जी का सतसंग चल रहा था और वो 5 मुद्राओं के बारे में बता रहे थे । 
फिर उन्होंने जैसे ही बोला कि - साहिब कहते हैं तब मुझे लगा ‘साहिब’ स्वामी, गुरूजी, भगवान अन्य ऋषि मुनियों में नाम सुने थे, भला ये क्या हैं ? 
मैं बैठ कर सुनता रहा पर मुझे साहिब का पता न चला ।
फिर मैंने देखा जैसे ही वह कार्यक्रम समाप्त हुआ । टीवी पर लिख कर आया - श्री मधु परमहंस जी । मैं त्वरित गति से उठा और इंटरनेट में खोजने लगा और परिणाम में आया - साहिब बंदगी ।
मैं फिर यू टयूब में जाकर उनके और सतसंगो को खोजा तब मुझे ये लिंक मिली - साहिब बंदगी लिंक यू टयूब
 http://www.youtube.com/user/rohitnitin81/videos?sort=da&view=0
(क्लिक करें)
उसमें उनके द्वारा बताये गए विषयों को मैं जैसे ही खोजने निकला । मुझे खोज के परिणाम में आप ही आपका ब्लॉग हर बार मिला ।
मुझे आभास हुआ कि - मुझे किसी तरह का खजाना मिल गया है । आपके ही ब्लॉग में मैंने कहीं पर ‘अनुराग सागर’ के बारे में पढ़ा । ज्यादा जानने के लिए मैंने पुस्तक को खोजा तो मुझे ये लिंक मिली - अनुराग सागर.
https://docs.google.com/viewer?url=http://sahib-bandgi.org/pdf/anuragsagar-vaani.pdf
(क्लिक करें)
मैंने जैसे ही इसको पढ़ा, मेरी सारी धारणायें हिल गयी, मेरी स्थिरता डगमगाने लगी ।
फिर मैंने थोड़ा संयम से काम लिया । मैं शांत मन से वापस आपके ब्लॉग पर आया और शुरू से आपका ब्लॉग पढ़ने लगा । धीरे धीरे मेरे सारे भय नष्ट होते गए और मुझे वापस स्थिरता प्राप्त होने लगी । आपके द्वारा दिए गए तर्कों अनुभवों और ज्ञान से सभी पहेलियाँ सुलझती गयीं । जिनका किन्हीं शास्त्रों में विवरण नहीं था ।
ऐसे तथ्यों से आपने खोई हुई कड़ियों को जोड़ दिया, आपके द्वारा बताये गए ज्ञान से पूर्ण संतुष्टि मिली और मुझे खोये हुए सर्वश्रेष्ठ मार्ग का पता चला ।
आपने कालपुरुष के बारे में बताया कि उसी ने कृष्ण और राम अवतार लिए । तबसे मैंने श्रीकृष्ण महामंत्र का जाप भी छोड़ दिया । अब मैं समय समय पर ‘जय जय श्री गुरुदेव’ का उच्चारण करता हूँ । जैसा आपने बताया था तथा किसी भी तरह की प्रार्थना में मैं साहिब को याद करता हूँ । बिना किसी भी आकृति या प्रकृति का ध्यान किये ।
दीक्षा के बारे में आपने बताया था कि - बहुत लंबे मार्ग के बाद अद्वैत का ज्ञान प्राप्त होता है । मैंने कभी भी गुरुदीक्षा नहीं ली और साधना भी मात्र उतनी ही करी । जितनी मैंने ऊपर बताई ।
क्या इन कारणों से किसी प्रकार की समस्या का प्रकट होना संभव है ? मेरे द्वारा किसी भी तरह की तामसिक वस्तु जैसे - अंडा, माँस, मदिरा (बीयर भी नहीं) सिगरेट, गुटखा, चाय, काँफी आदि का सेवन नहीं किया जाता ।
हाँ कालेज स्कूल में कुछ कुसंग के कारण अपशब्द का प्रयोग करना जैसे कुछ कुसंस्कार थे । जिन पर मैंने बहुत नियंत्रण कर लिया । ऐसे कुसंस्कार अब मात्र 5% ही प्रकट होते हैं वो भी मन से नहीं । ये मात्र में कुछ लोगों को उन्हीं की भाषा में समझाने के लिए प्रयोग करता हूँ ।
मैंने आपके द्वारा प्रकाशित मेरी टिप्पणी पर लेख पढ़ा । उन टिप्पणियों में सारा ज्ञान आप ही के द्वारा दिया हुआ है । मैंने मात्र अपनी तुच्छ बुद्धि का प्रयोग करके शब्दों को संगठित किया । उसका भी आपने इतना भव्य अर्थ प्रस्तुत किया । यह भी मात्र आपकी दृष्टि के कारण ही जो हर स्थान पर सत्यार्थ देखती है ।
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।
मेरा आध्यात्म से बहुत लगाव है । मेरा अब दुनियादारी में मन नहीं लगता । मैं मजबूरी में
फँसा हूँ । मैं भी ज्ञान के परस्पर आदान प्रदान पर विश्वास करता हूँ । मुझे आपके साथ आध्यात्म पर शोध करने का अवसर मिले और आपके मंडल से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हो तो मैं कृतार्थ हो जाऊंगा ।
आपके लिए ये लिंक -
आपने इसे कभी पढ़ने के लिए बोला था । कुरआन  की लिंक हिंदी में
http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/1:1 | 1:1 (क्लिक करें)
इसमें पहला अंक अध्याय तथा दूसरा अंक आयतों का संबोधन करता है । वेबसाइट में बाएं हाथ की ओर नीचे आपको अन्य भाषा में अनुवाद के लिए सुविधा भी दी गयी है और एक से अधिक अनुवादकों द्वारा अनुवाद प्रस्तुत करे गए हैं ।
3 अध्याय अवश्य पढ़िए और इसका अर्थ बहुत कम लोग निकाल पाए हैं ।
महा योगी सत्येन्द्र नाथ - इनके अनुसार इनके पास इनके गुरूजी का दिया हुआ हिमालय का गुप्त ज्ञान है ।
इन्हें मैं सुना करता था । यद्यपि इन्हें गुरु की उपाधि 10 वर्ष की आयु से ही प्राप्त है परन्तु इनकी साधनाएँ अभी भी चल रही हैं । इन्होंने 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया है और ये - तंत्र, मन्त्र, यंत्र,  यक्ष, गंधर्व, किन्नर, अप्सरा, देवी, देवता, दस महा विद्या आदि साधनाओं के बारे में बताते हैं । लिंक यूटयूब
http://www.youtube.com/user/kaulantakpeeth/videos
(क्लिक करें)
कृपया इन पर अपने विचार प्रकट करें ।
कृपया इन पुस्तकों इनके लेखकों और इनके विकल्पों के बारे में बताएं और अन्य पुस्तकों के विषय में भी आपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दें ।
सांख्य दर्शनम (आचार्य उदयवीर शास्त्री)
http://pustak.org/home.php?bookid=8742 (क्लिक करें) मूल्य 160 रु
योगवसिष्ठ महारामायण, हिंदी, मात्र ~1200 पृष्ठ । कुल-2 भाग । प्रकरण 1-5 http://www.hariomgroup.org/hariombooks/paath/ShriYogaVashishthaMaharamayan.pdf
(क्लिक करें)
प्रकरण 6 - http://hariomgroup.org/hariombooks/paath/Hindi/ShriYogaVashishthaMaharamayan/ShriYogaVashihthaMaharamayan-Prakarana-6.pdf
(क्लिक करें)
पतंजल योग प्रदीप, स्वामी ओमानंद तीर्थ, षट दर्शन का समन्वय, द्वैत अद्वैत का समन्वय दर्शाने का प्रयत्न, योग सूत्रों का अनुभव अनुसार विस्तृत व्याख्या ।
http://jainsonbookworld.com/showbookdetails.php?id=540
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श्रीमद भगवद गीता शंकर भाष्य - गीता प्रेस - http://gitapress.org.whbus12.onlyfordemo.com/BookDetail.aspx?ID=10
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श्रीमद भागवत महापुराण, वेद, उपनिषद, दर्शन शास्त्रों के अनेकों गूढ़ रहस्य समाहित, श्रीकृष्ण (कालपुरुष) के 24 अवतारों का विवरण । गीता प्रेस
प्रथम खंड -
http://gitapress.org.whbus12.onlyfordemo.com/BookDetail.aspx?ID=26
(क्लिक करें)
द्वितीय खंड -
http://gitapress.org.whbus12.onlyfordemo.com/BookDetail.aspx?ID=27
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ज्ञानेश्वरी हिंदी भावानुवाद - गीताप्रेस -
http://gitapress.org.whbus12.onlyfordemo.com/BookDetail.aspx?ID=1796
(क्लिक करें) अनुराग सागर - लालचंद दुहन
http://jainsonbookworld.com/showbookdetails.php?id=3071
(क्लिक करें)
कबीर-बीजक (टीका मनोरमा - गंगाशरण शास्त्री) बीजक ग्रन्थ का मूल पाठ के साथ हिंदी व्याख्या मुझे नहीं मिल सकी है । कृपया प्रकाशक लेखक के साथ पुस्तक का शीर्षक बताएं । इनमें से कुछ पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं । कुछ पढ़ रहा हूँ और कुछ मेरे पास अभी नहीं हैं । जिनमें दुर्भाग्य वश कबीर साहिब की दोनों रचनायें भी नहीं हैं ।
ऊपर दी गयी जानकारियां कृपया ब्लॉग पर मत प्रकाशित करियेगा । क्योंकि इसमें मुझसे जुड़े हुए कुछ लोगो का परिचय है । मैं उनकी या किसी कि भी भावनाओं को अनजाने में भी आहत नहीं करना चाहता । यह जानकारी मात्र आपके लिए है और बाकी आप जैसा उचित समझें ।
उपरोक्त जानकारी से निकाल कर प्रश्न उत्तर या विचार के रूप में आप प्रकाशित कीजिये । नीचे दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर अवश्य प्रकाशित कीजियेगा । 
इतनी बड़ी कथा मैंने मात्र अपने आपको और अपनी मनोवृति को समझाने के लिए आपके समक्ष प्रकट करीं । आपके बहुमूल्य समय में  किसी भी प्रकार के व्यवधान के लए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ ।
प्रश्न -
1 सतगुरु, परमात्मा (काल पुरुष) और परम पुरुष इनकी प्राप्ति में पुरुषार्थ की क्या भूमिका है ?
2 संतमत में श्रीमद भगवद गीता का महत्व क्या है ?
3 राम और कृष्ण ने काल पुरुष अवतार होने पर भी गुरु बनाये । ऐसा क्यों ? (यहाँ कबीर का नाम मैंने अपनी तरफ़ से जोङा)
4 राम का वशिष्ठ जी को गुरु बनाना (जिन्हें त्रेता युग में कबीर जी के द्वारा नामदान मिला था) क्या वशिष्ठ जी ने राम को भी नाम दान दिया था ?
5 क्या कृष्ण अवतार में भी काल पुरुष ने गुरु से नाम दान या कोई अन्य संतमत की दीक्षा ली थी ?
6 आपके ही ब्लॉग पर शायद कहीं पर पढ़ा था - काल पुरुष बुरा भी है और अच्छा भी है । यह बात क्या आत्माओं के वापस सतलोक जाने के सन्दर्भ में भी सत्य है ?
7 जब सतपुरुष ने आद्यशक्ति के द्वारा काल पुरुष की सृष्टि में जीव भेजे तो असल में उन्होंने क्या भेजा । क्या तब जीव हंस थे या मात्र उनकी सुरती को ही कालपुरुष की सृष्टि से जोड़ा ?
8 परम पुरुष ने कितने जीव भेजे । सभी (अर्थात कोई सीमित संख्या) अनन्त या ऐसा लगातार हो रहा है ?
9 सतपुरुष के द्वारा प्रकट किये गये प्रत्येक तत्व चेतन हैं । अगर ऐसा है तो जड़ क्या है । क्या जड़ तत्व भृम मात्र है ?
10 क्या सिर्फ सतपुरुष ही चेतन तत्व को प्रकट करते हैं । क्या उनके द्वारा प्रकट करे गए चेतन तत्व । अगर कोई वस्तु प्रकट करते है तो वह क्या जड़ होती है ?
11 अष्टांगी कन्या को परम पुरुष ने ही प्रकट किया है पर सांख्य में अष्टांगी कन्या को प्रकृति के रूप में जड़ कहा गया है । इसका वास्तविक तत्व क्या है ?
12 काल पुरुष को इस देश का राज्य 17 असंख्य चतुर्युगों का मिला है । इसमें से कितना समय निकल गया है । इसके बाद क्या सभी जीव वापस हंस होकर लौट जायेंगे ?
13 अगला जन्म भी मनुष्य जन्म प्राप्त करने के मार्ग क्या हैं । कहते हैं कि - पशुपति नाथ के दर्शन करने से अगला जन्म पशु योनि में नहीं होता तो क्या किसी अन्य योनी (ऊश्मज, स्थावर आदि) में संभव है । इसकी सत्यता क्या है ?
14 मनुष्य शरीर पिंडज खंड से है । जिसमें पिंडज के 4 तत्वों के साथ आकाश तत्व भी है । 
कहते हैं कि - इसकी संरचना परमात्मा के शरीर जैसी ही है याने कालपुरुष के शरीर जैसी । अगर मोक्ष मात्र मनुष्य शरीर में ही संभव है और काल पुरुष ने सभी योनियाँ जीव को फँसाकर भटकाने के लिए ही बनायीं तो उसने मनुष्य शरीर को बनाया ही क्यों ?
15 कालपुरुष ने 64 युगों तक तपस्या करके अष्टांगी कन्या को एवं पुनः तपस्या से जीवों को प्राप्त किया था अर्थात कर्म करके फल प्राप्त किया था और पुनः तपस्या करने में लीन है तो क्या कर्म फल का नियम हमेशा से ही है ?
16 अगर मन ही कर्ता है जो कि निरंजन का ही रूप है तो क्या मन चेतन है । क्या निरंजन चेतन है  या सुरती मन में लगने से ही यह चेतन प्रतीत होता है ?
17 या फिर चेतन तत्व एक मात्र परम पुरुष ही है और यह अखिल सृष्टि भृम मात्र होने के कारण जड़ ही है ?
18 कबीर साहिब के पंथों के विषय में बताएं । इनमे से बहुत से पंथ निरंजन द्वारा बनाये गए हैं । वर्तमान समय में इनके अस्तित्व के बारे में कृपा करके बताईए तथा निरंजन द्वारा फैलाये पंथो को कैसे पहचानें ।
इनमें से कुछ प्रश्न साहिब बंदगी के सतगुरु श्री मधु परमहंस जी की अनुराग सागर वाणी पर आधारित हैं । कृपया शंका का समाधान करे । जय जय श्री गुरुदेव ।
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सार सार को गहि रहे । थोथा देय उङाय ।
को चरितार्थ करता हुआ स्वपनिल तिवारी का ये बेहद महत्वपूर्ण मेल उनकी ऊपर की जानकारी को प्रकाशित न करने के अनुरोध के बाबजूद भी इसकी महत्ता को देखते हुये प्रकाशित किया जा रहा है । दूसरे इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिससे किसी की भावनायें आहत हों । इसके प्रकाशन से बहुत बङी संख्या में लोगों को लाभ होगा । ये शायद अभी स्वपनिल को भी पता नहीं ।
तीसरी बात - जब भी आप साहिब भक्ति या आत्मज्ञानी सन्त से जुङते हैं तो निडरता धारण करना या होना बेहद आवश्यक है । आप सच को इसलिये सच नहीं कहेंगे कि - दूसरों की भावनायें आहत होंगी तो फ़िर जनमानस में सदियों से फ़ैला भृम कैसे दूर होगा ?
आप जो भी अच्छा बुरा सही गलत जानते हैं । उस पर परस्पर विचार विमर्श से लाभ ही है । हानि कुछ नहीं जैसा कि आपका ही मानना है - मैं भी ज्ञान के परस्पर आदान प्रदान पर विश्वास करता हूँ ।
- आपके प्रश्नों के उत्तर शीघ्र अलग से लेखों के माध्यम से दिये जायेंगे जो वास्तव में बहुत विस्तार की अपेक्षा रखते हैं । इसलिये कुछ समय लगेगा ।
नोट - ये 1 भी लिंक मैंने चैक नहीं किया है । यदि कोई लिंक सही काम न करता हो तो कृपया टिप्पणी द्वारा बतायें ।

इस लेख पर टिप्पणी आने के बाद दूसरे दिन स्वयं श्री स्वपनिल तिवारी द्वारा भेजे गये लिंक -
॥ जय जय श्री गुरुदेव ॥ प्रणाम महाराज । टिप्पणीकर्ता द्वारा मांगे गए उत्तरों के लिंक -
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(अनेकों रहस्य साथ में होने के कारण उत्तर अस्पष्ट प्रतीत होते हैं । अधिक जानकारी के लिए कृपया अनुराग सागर पढ़ें) स्वपनिल तिवारी ।
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