17 मई 2012

अगला जन्म मनुष्य का प्राप्त करने का मार्ग

13 अगला जन्म भी मनुष्य जन्म प्राप्त करने के मार्ग क्या हैं ? कहते हैं कि - पशुपति नाथ के दर्शन करने से अगला जन्म पशु योनि में नहीं होता । तो क्या किसी अन्य योनि ( ऊश्मज । स्थावर आदि ) में संभव है ?    इसकी सत्यता क्या है ?
ANS - हम अपने जीवन में पिण्ड शरीर द्वारा 4 तत्वों के बरताव या व्यवहार में ही अधिक निपुण है । ये 4 तत्व है - प्रथ्वी । जल । अग्नि । वायु । इन चारों से ही हमें किसी न किसी रूप में काम रहता है । यहाँ तक कि एक दृष्टिकोण से पशुओं को भी इनकी प्रत्यक्ष आवश्यकता होती है । पशु सर्दी के समय धूप का ही सही । अग्नि तत्व का भी उपयोग करते हैं । गर्म स्थान की तलाश कर बैठते हैं । यह अप्रत्यक्ष अग्नि तत्व का ही उपयोग है । लेकिन 5 वां आकाश तत्व हमारे व्यवहार में नहीं आता । जबकि ये महज निरा अज्ञान ही है । आकाश ( खाली स्थान या स्थान ) के बिना तो हमारा शरीर व्यवहार 1 मिनट नहीं चल पायेगा । प्रथ्वी कहाँ है ? आकाश में ना । जल । अग्नि । वायु भी आकाश ( ये किसी स्थान में ही तो है ) में ही है । इस 
तरह ये 5 तत्व आपस में मिले हुये हैं । अग्नि में वायु मिली हुयी है । तभी तो वह ऊपर को गति करती है । प्रथ्वी में जल । अग्नि । वायु सभी है । इस तरह  सूक्ष्म बैज्ञानिक दृष्टि से परीक्षण करने पर सभी तत्व आपस में मिले हुये स्पष्ट नजर आयेंगे । लेकिन लाख टके की बात वही है । जिस चीज को हम तकनीकी तौर पर जान कर सिद्ध कर लेते हैं । उस पर हमारा अधिकार हो जाता है । अब हम जितना जान सके ? गौर करें । ये कोई तिलिस्मी बात नहीं है । जीवन के प्रत्येक क्षण में हरेक व्यवहार में भी यही बात लागू होती है । हरेक चीज को तकनीकी जानना । उसकी प्रकृति से जानना । इसी को चाहे कुण्डलिनी कह लो । सांख्य कह लो । दर्शन कह लो । आत्म ज्ञान कह लो । ये प्रकारों के आधार पर बस स्थितियों के नाम दे दिये गये हैं ।
अपनी पिछली ( पूर्व जन्म की ) योग यात्रा के चलते मैं बहुत बचपन से ही ऐसा महसूस करने लगा था कि मैं हमेशा खुले विस्त्रत आकाश में रहता हूँ । किसी भूमि से मेरा कुछ लेना देना ही नहीं है । यदि आप चन्द्रमा । मंगल । बुध आदि किसी भी ग्रह पर हों । तब क्या आपको ऐसा थोङे ही लगेगा कि आप किसी ऊँची छत पर आ गये । और किसी वायुयान की तरह रोमांचक तरीके से सब तरफ़ देख रहे हैं । वो देखो - नीचे प्रथ्वी । उधर - शुक्र । बल्कि आपको ठीक ऐसा ही लगेगा । जैसा प्रथ्वी पर लगता है । क्योंकि उसके आकार के अनुसार आप बहुत छोटे हैं । इसलिये छत की तरह नीचे झांक नहीं सकते । तब इसका मतलब आप आकाश में पहुँच गये । फ़िर भी फ़ीलिंग भूमि की ही रही । जबकि  थोङा नजरिये । थोङा मनोवृति में स्पष्टता बैज्ञानिकता लायें । तो आप इसी क्षण आकाश में ही हैं । और ये कोई बच्चे जैसा खुद को बहलाना भर नहीं होगा । ऐसा सोचते ही आपके अन्दर एक क्रांति घटित होने लगेगी । एक रासायनिक परिवर्तन शुरू हो जायेगा । आकाश आपके अन्दर आने लगेगा । जिसे होते हुये भी आपने सिर्फ़ मान कर रोक रखा है । तव आप खुद में एक व्यापकता महसूस करेंगे । अब बात वही है । जितना विस्तार आप कर सकें । यह आप पर निर्भर होगा । और मैं कोई खास नहीं हूँ । ये सब आपके अन्दर भी है । बस इसको गृहण करना भर होगा । अब क्योंकि आप पिण्ड ( आँखों से नीचे । शरीर ) ही खुद को मानने के बुरी तरह आदी हो गये हैं । इसलिये मृत्यु के समय आपके प्राण पखेरू यहीं रह जाते हैं । क्योंकि जितना जानते होंगे । वहीं तो जायेंगे । तब सबसे पहले दोनों कानों से प्राण निकलने पर - शब्द द्वारा जाने जाने वाले । प्रेत योनि । दोनों आँखों से प्राण निकलने पर - प्रकाश के प्रेमी । कीट पतंगे योनि । नाक के  दोनों छिद्रों से प्राण निकलने पर - वायु ( स्वांस रूपी हवा का आना जाना नाक से होता है ) में विचरने
वाले - पक्षी योनि । यहाँ विशेष ध्यान दें । दोनों का मतलब ये नहीं कि किसी भी मृतक के दोनों आँखों या दोनों कानों या दोनों नाक से निकलेंगे । सिर्फ़ 1 आँख या 1 कान या नाक से निकलेंगे । और इनमें दायें बायें की स्थिति अनुसार ही मृतक जीवात्मा की स्थिति में बहुत परिवर्तन हो जाता है । बायाँ अंग काल क्षेत्र है । दाँया अंग सिद्ध क्षेत्र है ।
मुँह से प्राण निकलने पर - सिर्फ़ भोजन के इच्छुक । पशुवत मनोवृति के कारण - पशु योनि । स्त्री योनि या पुरुष लिंग के मूत्र मार्ग से प्राण निकलने पर - जल प्रवाह अंग - जलचर जीव । और गुदा मार्ग से प्राण निकलने पर - घृणित मल । नारकीय स्थिति - नरक प्राप्त होगा । इस तरह आपके ये 9 द्वार - 2 कान । 2 आँख । 2 नाक छिद्र । 1 मुँह । 1 स्त्री योनि या पुरुष लिंग । 1 गुदा । हो गये । जाहिर है । आपका ये मनुष्य जन्म कहीं नहीं हुआ । पर - जब खुल जाये 10 दसवां द्वारा । तब मिल जाये सिरजन हारा । यानी इन 9 द्वारों पर आपको कोई मिलने वाला नही । सीधे सीधे प्राण निकला । सूक्ष्म शरीर ज्योति मैदान में निराधार अधर में जलती हुयी ज्योति के चारों ओर तेजी से घूमा । वहीं जीवात्मा के अन्तिम परिणाम अनुसार 3-4 शरीर नीचे भूमि पर होंगे । उसी में किसी 1 में वासना अनुसार समा जायेगी । ऐसा होते ही फ़ल अनुसार उस गर्भ में उसका स्थापन हो जायेगा । और ऐसे ही
84 लाख योनियों में साढे 12 लाख साल तक भटकने की यात्रा शुरू हो गयी । मनुष्य शरीर दशम 10 द्वार में हैं । ये झींगुर कीट जैसा निरंतर ध्वनि रूप है । जिसका दोनों भौंहों के मध्य से बृह्माण्डी क्षेत्र के लिये रास्ता जाता है । मगर समस्या ये है कि इस द्वार पर 1 कानून के तहत ताला डाल दिया गया है । क्योंकि फ़िर चालाक किस्म के लोग बिना किसी प्रयास के ही पशुवत जीवन जीने के बाद भी मनुष्य बनते रहते । तब फ़िर कर्म फ़ल का दण्ड निर्धारण बहुत मुश्किल हो जाता । दूसरे आँखों से ऊपर अलौकिक ज्ञान बिज्ञान का दुर्लभ क्षेत्र शुरू हो जाता है । तब कभी कभार या सोते में सुरति उधर चली जाती । और मनुष्य दिव्य राग रंग देखकर मनुष्य जीवन या कर्म से निष्क्रिय उदासीन हो जाता । ऐसे सृष्टि ही खत्म हो जाती । ऐसे कई कारण हैं । जिसके तहत ये व्यवस्था सिर्फ़ दुर्लभ मनुष्य शरीर में पहुँचे हुये गुरु द्वारा अलौकिक ज्ञान से ही प्राप्त होती है । जब कोई कुण्डलिनी का गुरु आपका बृह्माण्डी द्वार खोल देता है । तब की गयी साधना अनुसार आपको देवत्व या समकक्ष स्वर्ग अपवर्ग में अनगिनत छोटी बङी  स्थितियाँ प्राप्त होती हैं । लेकिन जब कोई आत्म ज्ञान का सतगुरु आपको निर्वाणी नाम देकर आपका बृह्माण्डी द्वार और तीसरी आँख 3rd eye खोल देता है । तो अपनी साधना नाम कमाई अनुसार - आपको ज्ञान प्राप्त होने तक निरंतर मनुष्य जन्म । या 1 ही जन्म में मुक्त होकर सचखण्ड के सबसे
छोटे हँस से लेकर बहुत ऊपर परमात्मा में लीन होने तक का अन्तिम लक्ष्य प्राप्त हो सकता है ।
अब पशुपति नाथ के संदर्भ में - देखिये काल पुरुष या काल क्षेत्र का जितना भी ज्ञान या प्राप्ति है । यह कर्म फ़ल पर आधारित है । काल का मतलब है । समय भूमि । जैसा आपने बोया । वैसा काटा । आपके पुण्य प्रयास से भूमि जितनी हासिल थी । और सदकर्म से फ़सल जितनी हुयी । उतने ही लम्बे समय तक आप उसका आराम से भोग करेंगे । पर अर्जित कमाई में कोई बढोत्तरी नहीं हो सकती । जैसे ही धन खत्म हुआ  । आपको सीधा 84 में फ़ेंक दिया जायेगा । अभी बरसात के मौसम में देखना । गिजाई । सुन्दर गुलाबी रंग की राम गुजरिया । अनेक बरसाती कीङे । जो आपको वर्ष भर नहीं दिखाई देते । कुछ समय के लिये देखने को मिलेंगे । ये वही लोग हैं । जो दिव्य लोकों । सिद्ध लोकों आदि से समय पूरा होने के बाद फ़ेंक ( पानी के द्वारा उतरे ) दिये गये हैं । ये कुछ दिन जीवित रहकर 84 में 
चले जाते हैं । बाकी कुटिल काल ने अपना खेल बङा चालाकी से फ़ैलाया है । उसने - मन्दिरों । तीर्थों । नदियों । जलाशयों । जङ वृक्षों । पत्थरों । किताबों । भूत प्रेतों तक को बेहद चालाकी से पुजबा दिया । जबकि हासिल कुछ नहीं । बहुराष्ट्रीय फ़ोन आदि कंपनियों जैसा शब्दों का आडम्बर उसके ? धर्म शास्त्रों में भी है । आप पशुपति नाथ उर्फ़ शंकर की बङी से बङी भक्ति क्यों न करो । परिणाम स्वरूप आप - भूत । प्रेत । वैताल । मसान ( महिला हो तो - गौरी शंकर की करने पर ) डाकिनी । शाकिनी । चामुण्डा । कर्ण पिशाचिनी । पंचागुली आदि गण ही बनेगें । लेकिन कुण्डलिनी के द्वैत का अच्छा गुरु मिलने पर आप सीधा शंकर भी बन सकते हैं । और भी विभिन्न कोर्सेज हैं । जो और जैसा आप कर सकें । अतः जन्म पशु योनि में तो नहीं होता । वो भी कब ? जब आप अंतर में किसी तरीके से गहन भक्ति द्वारा शंकर का पशुपति रूप दर्शन कर सकें । लेकिन आपको शंकर के लोक में गण रूप में चाकरी प्राप्त हो जाती है । कुण्डलिनी के द्वैत योग को छोङकर बाकी आप मंत्र योग द्वारा बृह्मा विष्णु शंकर या किसी भी देवी की साधना करें । परिणाम यही होगा । उसी के लोक में छोटे मोटे नौकर टायप हो जाना । हालांकि बेहद कष्टदायक 84 को देखते हुये ये भी काफ़ी अच्छी प्राप्ति हो जाती है । पर जब आप इससे भी कम मेहनत में सिर्फ़ ज्ञान को सही समझने से हमेशा के लिये स्थायी सुख शान्ति और मुक्त ( मुक्ति नहीं ) होना प्राप्त कर सकते हैं । तब कोई पागल ही होगा । जो बिना आँख या नाक या कान या अजीव सी शक्ल वाला भूत प्रेत छाप गण बनना पसन्द करेगा । क्यों सही कह रहा हूँ ना ?
14 मनुष्य शरीर पिंडज खंड से है । जिसमे पिंडज के 4 तत्वों के साथ आकाश तत्व भी है । कहते हैं कि - इसकी संरचना परमात्मा के शरीर जैसी ही है । याने काल पुरुष के शरीर जैसी ? अगर मोक्ष मात्र मनुष्य शरीर में ही संभव है । और काल पुरुष ने सभी योनियाँ जीव को फँसाकर भटकाने के लिए ही बनायीं । तो उसने मनुष्य शरीर को बनाया ही क्यों ?
ANS - आपने कभी डायनासोर देखे हैं ? मूवी में देखे हैं । बैज्ञानिक मानते हैं कि कुछ डायनासोर और अन्य पक्षी पूर्वकाल में ऐसे थे । जो हाथी को भी पंजो में दबाकर उङ जाते थे । कल्पना करिये । ये जीव कैसे होते होंगे ? कुछ लोगों ने इन्हें पौराणिक कथाओं जैसा भेष बदले राक्षस आदि कह दिया है । पर सत्य क्या है ? आखिर ऐसा क्या हो गया । इतनी शक्तिशाली जीव प्रजाति लुप्त हो गयी । और चींटे । कीङे मकौङे जैसे जीव अब भी प्रथ्वी पर मौजूद
हैं । जबकि इनको नष्ट होना चाहिये । उनको बचना चाहिये । दरअसल इसका उत्तर कहीं बाहर नहीं । हमारे अन्दर छिपा है । हमें कोई बनाता बिगाङता नहीं । हम अपने विभिन्न भावों से अपने अन्दर के रसायनों का केमिकल रियेक्शन द्वारा जो नया पदार्थ सृजित करते हैं । अन्तिम परिणाम स्वरूप वही हो जाते हैं । दूध आदि चीजों से देखिये । थोङा बदलाब क्रिया होते ही क्या क्या बन जाता है - दही । छाछ । घी । मक्खन । मलाई । रबङी । छैना । पनीर । खोया । चाय । आइसक्रीम । मेरी गारंटी है । आप सिर्फ़ दूध से ही क्या क्या हो सकता है । इसी को नहीं जान सकते । गौर करिये । जानते हैं क्या ? इसलिये जैसा कि मैंने कल के लेख में बताया । ( द्वैत को मानने और आत्मा को न जानने पर ) ये सब ? हैं भी । फ़िर कोई नहीं है । लेकिन आप हो । और शाश्वत हो । बाकी काल पुरुष । स्वर्ग । नरक । देवी । देवता । भूत प्रेत आदि सब आपकी ही बनाई स्थितियाँ हैं । एक मनुष्य को देखिये । वह क्या क्या नहीं है ? कभी गिन सकते हो । शराबी । जुआरी । चोर । निर्धन आदि तमाम नीच स्थितियाँ । शिक्षक । क्लर्क । बैज्ञानिक । दार्शनिक । धनिक आदि तमाम उच्च स्थितियाँ । लेकिन इनमें ढांचागत मनुष्य 1 जैसा ही है । अंतर है । तो सिर्फ़ आंतरिक इच्छाओं भावों रसायनों का । और फ़िर उनसे हुयी बाह्य क्रिया का । इसलिये वास्तव में ये आत्मा 1 पूर्ण स्वतंत्र इकाई के रूप में विभिन्न खेल खेल रही है । अब जैसे कि 1 कंपनी की कोई छोटी यूनिट अच्छी स्थितियों में अच्छे परिणाम देने पर मध्यम या वृहद इकाई का रूप ले सकती है । जिस कंपनी ने उसको कभी स्थापित किया था । उससे भी बङा रूप होकर सर्वे सर्वा बन सकती है । मुख्य बन सकती है । किसी भी % पर स्तर जा सकता है । और खराब परिणाम में दुर्गति से लेकर अत्यन्त दुर्गति को भी प्राप्त हो सकती हैं । देखिये 1 
इंसान अपनी मेहनत से देश राष्ट्रों का सर्वोच्च व्यक्ति हो जाता है । वही सर्वोच्च व्यक्ति गलती होने पर भयानक जेल या फ़ाँसी के फ़ंदे पर पहुँच जाता है । तो स्थिरता या निरंतर बदलाब कैसा किधर हो रहा है । सब कुछ इसी पर निर्भर है ।
आप देखिये । एक सामान्य आदमी पूरा जीवन जीकर अन्त में मर जाता है । लेकिन उनमें से बहुत से ये नहीं जान पाते कि - वे एक देश सत्ता के । तमाम कानूनी धाराओं के अधीन होकर जिये थे । उन्होंने भी तमाम धनिकों की तरह ही अपनी हैसियत अनुसार ? टेक्स दिये थे । जबकि परोक्ष रूप में कोई सरकारी आदमी कभी उनके सम्पर्क में नहीं आता । और न ही सीधे सीधे उन्हें कोई टेक्स भी देना होता है । जबकि सङक पर चलने का । हवा में सांस लेने तक का टेक्स उसे देना होता है । लेकिन दूसरी स्थितियों में यही आदमी जब कोई पुलिस । मजिस्ट्रेट । न्यायाधीश । मंत्री । महा मंत्री आदि बन जाता है । तब उसके अधीन पद अनुसार व्यवस्था आ जाती है । और वह अपने ऊपर के लोगों के अधीनस्थ होता है । ठीक इसी तरह सही मुक्त होने की कुछ स्थितियों को छोङकर सभी स्थितियों में 1 अटल नियम के अंतर्गत कार्य होता है । और ये नियम सर्व शक्तिमान आत्मा का है । यही आत्मा एक विलक्षण खेल के तरह स्वतंत्र इकाई के रूप में खेलती हुयी अपने ही नियम से संचालित है । और ये सब कुछ वास्तव में ज्ञान स्थिति में ? स्वचालित ढंग से हो रहा है । तो ऊपर के आदमी की तरह ये एकदम स्वतंत्र भी है । और फ़िर पूरी तरह नियम परवश भी । परवश जीव स्ववश भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता । इसलिये कल के लेख में मैं बता ही चुका हूँ । ये जीव आत्मा यदि जीव भाव से हटकर मन से परे हो जाये । तो यही चेतन पुरुष है । यदि रंरंकार पर रुक जाये । तो यही काल पुरुष है । सत गुण का पूर्ण अधिकारी हो जाये । तो यही विष्णु है ।
प्राचीन समय का मनुष्य बहुत मामलों में शक्तिशाली था । राक्षस आदि शक्तियों से भी उसका वास्ता था । वह मायावी शक्तियों के बारे में सोचा करता था । ऐसी स्थिति अदभुत शक्तिशाली डायनासोर जैसे जीवों का सृजन करती हैं । घूमते काल चक्र के साथ वो समय फ़िर फ़िर आता रहता है । जल्द ही फ़िर सब कुछ नया नये तरह से होने वाला है । तो परमात्मा ( को छोङकर ) से लेकर तुच्छ से तुच्छ जीव तक ये सिस्टम और विराट सृष्टि 1 बार बन चुकी है । अब बस इसी में चढना उतरना स्थिर रहना लगातार होता रहता है । वास्तव में काल पुरुष कोई अत्याचार भी नहीं करता । आप वासनाओं में ना फ़ँसो । और परमात्मा से लौ लगाओ । तो आपको केन्द्रीय नागरिकता हासिल हो जायेगी । आप शरीरी भोगों के इच्छुक हैं । वासनाओं का आकर्षण आपको खींचता है । तो आप काल सत्ता के नागरिक होंगे । लेकिन  योगस्थ पुरुष दोनों जगह समान रूप से रहता है । और उस पर कोई कर्जा नहीं चढता । जैसा कि सामान्य जीव भोग वासना के कर्जे से काल माया का कैदी है ।
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