15 मई 2012

क्या राम और कृष्ण ने भी गुरु दीक्षा ली थी

1 सतगुरु । परमात्मा ( काल पुरुष ) और परम पुरुष । इनकी प्राप्ति में पुरुषार्थ की क्या भूमिका है ?
ANS - पहले तो ये बात एकदम उलटी या विपरीत सी हो जाती है । आप इनको प्राप्त नहीं करते । बल्कि खुद इनको प्राप्त होते हो । क्योंकि सूक्ष्मता के स्तर पर बात कही जाये । तो इनको प्राप्त करने वाला इनका स्वामी हुआ । फ़िर अगर कई लोगों ने इनको प्राप्त किया । तो परमात्मा या अन्य बङी शक्तियाँ कई हो गयीं ना । फ़िर किसी 1 को प्राप्त हुआ । तो वो किसी दूसरे को क्यों देने लगा । ऐसे बङा झगङा खङा हो जायेगा । दरअसल 1 अति तुच्छ जीव से लेकर सर्व शक्तिमान परमात्मा तक सभी । चेतन की अनगिनत स्थितियाँ उपाधियाँ हैं । केवल अन्तिम यानी आत्मा या परमात्मा ही सब स्थितियों और उपाधियों से रहित है । क्योंकि वो कोई स्थिति नहीं । वो तो सदा से - है । है । आप जिस स्थिति को योग द्वारा जानने लगते हो । उस पर नियंत्रण करना जान जाते हो । वही हो जाते हो । ये सिर्फ़ योग में ही नहीं । चेतन या जीवन की हर गतिविधि में यही बात लागू होती है । जैसे तैरना या ड्राइविंग । तैरना आ जाने पर आपको तैराक । और ड्राइंविंग आ जाने पर ड्राइवर की उपाधि स्वतः मिल जाती है । पर ये सिद्धांत द्वैत योग में लागू होता है । आत्म ज्ञान वास्तव में लय योग है । इसमें आत्मा का सभी ज्ञान और स्थितियाँ उपाधियाँ स्वतः समायी  हुयी हैं । इसमें एक तरह से योग के बजाय वियोग करना होता है । यानी सब तरफ़ के जुङाव से ध्यान हटाकर आत्म स्थिति में अधिकाधिक केन्द्रित होना 
। इस वियोग में कभी उत्पन्न हुआ द्वैत जितना % आपके अन्दर से खत्म होता जाता है । उतना ही आप परमात्मा के निकट । या सीधे सीधे कहिये । स्वयं परमात्मा होते जाते हैं । बाकी संक्षेप में एक अन्य कोण से पुरुषार्थ को मान कर भी चला जा सकता है । जब ये जीव आत्मा ( हँस दीक्षा मिलने के बाद ) हँस हो जाती हैं । अभी ये ( बिना दीक्षा के ) काग ( कौआ वृति ) है । क्योंकि विषय वासना रूपी ट्टटी खाती है । इस आत्मा रूपी हँस के 1 भक्ति ( या समर्पण ) । 2 ज्ञान । 3  वैराग । ये 3 पंख है । ये तीनों पंख स्वस्थ होने पर ही ऊर्ध्व ( ऊपर ) की ठीक यात्रा संभव हो पाती हैं । बाकी आप कोई पुरुषार्थ करते रहिये । कुछ काम न आयेगा । दरअसल इन 3 अंगों में ही बहुत कुछ समाया हुआ है ।
2 संत मत में श्रीमद भगवद गीता का महत्व क्या है ?
ANS - सन्त मत हो । या कोई अन्य पंथ । एक दृष्टिकोण से हर चीज का अपना महत्व है । क्योंकि कब किसको कहाँ से क्या प्राप्त हो जाय । कुछ कहा नहीं जा सकता । लेकिन गीता ज्ञान के आधार पर बात कही जाये । तो गीता धर्म शास्त्रों का निचोङ है । कहानियों के रूप में वर्णित धर्म शास्त्र सामान्य बुद्धि के लोगों की धर्म में जिज्ञासा बनाये रखने का काम करते हैं । जैसे छोटे बच्चे को रोचक चित्र या कहानी कविता के माध्यम से बात समझायी जाती है । लेकिन उस पाठ का सार 1 वाक्य के उपदेश या सूत्र के रूप में हो सकता है । इसलिये तमाम कथा वात्रा से उकता 
कर इंसान जब परिपक्व  होकर 1 स्थान पर सार को जानना चाहता  है । वह गीता है । लेकिन दरअसल गीता का जहाँ पूरा ज्ञान अपने शिखर पर खत्म होता है । सन्त मत की A B C D ही वहाँ से शुरू होती है । अपनी बात खत्म करके गीता ( उस ) समय के किसी तत्व वेत्ता या सदगुरु के पास जाने की सलाह देकर हाथ जोङ लेती है । इससे यही संकेत निकलता है । ज्ञान प्राप्ति या आत्म प्रयोग तत्व वेत्ता के बिना संभव ही नहीं ।
3 राम और कृष्ण ने काल पुरुष अवतार होने पर भी गुरु बनाये । ऐसा क्यों ? ( यहाँ कबीर का नाम मैंने अपनी तरफ़ से जोङा - जिसके द्वारा उत्तर दिये गये )
ANS - सम्पूर्ण या कहिये अखिल सृष्टि परमात्मा के नियम ( आदेश ) द्वारा संचालित है । इसका उलंघन करने की शक्ति किसी में नहीं है । विराट में राम श्रीकृष्ण या काल पुरुष की हैसियत 1 तिनका से अधिक नहीं है । ये हैसियत भी उसी परमात्मा की ही दात है । इसीलिये उसी आदेश परम्परा का निर्वहन करने के लिये राम ( के बृह्मा पुत्र - वशिष्ठ ) कृष्ण ( के 
आध्यात्मिक गुरु - दुर्वासा ) ने गुरु बनाये । राम कृष्ण से कौन बढ ( त्रिलोकी में ) तिन हू ने गुरु कीन । तीन लोक के ये धनी । गुरु आज्ञा आधीन । गुरु गृह पढन गये ( राम ) रघुराई । अल्प काल विध्या सब पायी । कबीर ने भी इसी नियम का सम्मान करते हुये रामानन्द को गुरु बनाया । अन्यथा वास्तविक कहानी कुछ अलग ही है । श्रीकृष्ण भी कहते हैं - लोग मेरा अनुसरण करते हैं । इसलिये मैं कर्म करता हूँ । वरना मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है ।
4 राम का वशिष्ठ जी को गुरु बनाना ( जिन्हें त्रेता युग में कबीर जी के द्वारा नामदान मिला था ) क्या वशिष्ठ जी ने राम को भी नाम दान दिया था ?
ANS - आप ( आम इंसान या विद्वान आदि ) जिस आध्यात्म से परिचित हैं । वह स्थूल ज्ञान है । मन आदि इन्द्रियों द्वारा जाना गया । गो गोचर जहाँ लगि मन जाई । सो सब माया जानो भाई । जबकि - आंतरिक । सूक्ष्म । अति सूक्ष्म । ज्ञान बहुत अलग है । बल्कि एकदम अलग कहो । तो ज्यादा ठीक है । अवतार आधा और अंश रूप में होता हैं । अतः राम सिर्फ़ 1 पुतला मात्र है । जिसे काल पुरुष । विष्णु । शंकर आदि अपने अपने चेतना अंश देकर सक्रिय करते हैं । दरअसल यहाँ बहुत ही जटिल और सूक्ष्म बिज्ञान आ जाता है । जिसको सिर्फ़ इसी स्तर के उच्च योगी ही ठीक समझ सकते हैं । खैर..फ़िर भी राम के इस कृतिम शरीर ? को  नाम शक्ति से हँस दीक्षा द्वारा ( गुरु दीक्षा ) जोङा गया । अतः स्थूल रूप से राम हँस योगी थे । 1 पत्नी वृत । 12 कलाओं का ज्ञान । मर्यादा पुरुष । वचन पर दृढ रहना आदि इनकी खास विशेषतायें थी । रघुकुल रीत सदा चलि आयी । प्राण जाये पर वचन न जायी । इसी प्रश्न का विस्तार
अगले उत्तर में भी...
5 क्या कृष्ण अवतार में भी काल पुरुष ने गुरु से नाम दान या कोई अन्य संत मत की दीक्षा ली थी ?
ANS - जबकि श्रीकृष्ण परमहँस ज्ञानी ( मगर गुरु अनुसार - 7 चक्रों के ) थे । इनके गुरु दुर्वासा थे । इनकी परमहँस दीक्षा हुयी थी । भले ही ये राम की ही आगे की कङी थे । पर यहाँ मामला बहुत अलग और विपरीत था । इनके लिये अपने ही वचन का कोई महत्व नहीं था । जबकि वास्तविक सत्य ये था कि - ये कभी झूठ नहीं बोलते थे । इनकी 8 प्रमुख पत्नियाँ । और 16100 अन्य थी । जबकि वास्तविक सत्य ये था कि - ये पूर्ण बृह्मचारी थे । इनका 16 कलाओं का ज्ञान था । और ये योगेश्वर हैं । किसी भी मर्यादा का इनके लिये कोई मतलब ही न था । जबकि वास्तविक सत्य ये था कि - इनकी तुलना में राम की मर्यादा मामूली ही थी । अब बताईये । उपरोक्त विवरण एकदम 100% सत्य है । पर कैसे ? ये समझाना बेहद कठिन है ।
6 आपके ही ब्लॉग पर शायद कहीं पर पढ़ा था - काल पुरुष बुरा भी है । और अच्छा भी है । यह बात क्या आत्माओं के वापस सतलोक जाने के सन्दर्भ में भी सत्य है ?
ANS - हँस दीक्षा मिलने के बाद मन की मलिन वासनायें धीरे धीरे नाम जप अभ्यास अनुसार शुद्ध होने लगती हैं । एक अच्छी स्थिति या उच्चता आ जाने पर इसके सभी अवगुण ठीक विपरीत शुभ गुणों में परिवर्तित हो जाते हैं । ये पिंडी मन से बृह्माण्डी मन होता हुआ कृमशः शुद्धता पवित्रता को प्राप्त होता जाता है । और फ़िर सहायक भी हो जाता है । लेकिन ध्यान रहे । इसकी सभी चाल 
साधक के विवेक पर निर्भर है । क्योंकि वास्तव में ये जङ है । और चेतन ( यहाँ जीव ) के बिना इसकी कोई औकात नहीं । अतः सतलोक जाने में सहायता भी  करता है ।  और आपका रुख थोङा भी बदलने पर बहुत ऊँचाई से गिरा भी सकता है ।
7 जब सत पुरुष ने आद्यशक्ति के द्वारा काल पुरुष की सृष्टि में जीव भेजे । तो असल में उन्होंने क्या भेजा ? क्या तब जीव हंस थे ? या मात्र उनकी सुरती को ही काल पुरुष की सृष्टि से जोड़ा ?
ANS - ये प्रश्न एक अत्यन्त जटिल अलौकिक सूक्ष्म बिज्ञान के क्षेत्र में चला जाता है । जो समझाने के बाबजूद ठीक समझ में आ जाये । मुझे बहुत मुश्किल लगता है । सत पुरुष ने "  सोहंग " जीव वीज भेजा । तब ये बीज था । जीव नहीं । ये " हुँ " से चेतना लेकर र्र्र्र्र्र्र्र रंकार से रमता ( गति या एक्टिव । चेतना का रूपान्तरण ) हुआ सो-हं द्वारा अंकुरित होने लगता है । ज्ञान प्राप्त हो जाने पर ये  उलटकर हं-सो हो जाता है । दरअसल द्वैत के अनुसार उत्तर देना । और अद्वैत के अनुसार उत्तर देना । दोनों में बहुत फ़र्क और विरोधाभास सा लगेगा । जबकि प्रश्न 1 ही होगा । और उत्तर भी 1 ही होगा । द्वैत में इन सब काल पुरुष अष्टांगी आदि की सत्ता है । अद्वैत में कोई है ही नहीं । वही एक परमात्मा लगातार सृष्टि खेल खेल रहा है । और एकदम
शान्त खेल से निर्लिप्त अलग भी है । अपनी मढी में आप में खेलूँ । खेलूँ खेल स्वेच्छा ।
8 परम पुरुष ने कितने जीव भेजे ? सभी ( अर्थात कोई सीमित संख्या ) ? अनन्त ? या ऐसा लगातार हो रहा है ?
ANS - ये प्रश्न और भी अधिक जटिलता लिये है । जैसे किसी 1 पेङ का बीज हो । कुछ ही समय में वो हजारों लाखों बीजों को पैदा कर देता है । फ़िर वे हजारों लाखों पेङ होने पर कितने बीज उत्पन्न करेंगे । कल्पना भी मुश्किल है । और वे सभी स्थूल रूप से नष्ट होते भी नजर आते हैं । लेकिन सूक्ष्म स्तर पर नष्ट नहीं होते । जैसे 1 सही सलामत बीज है । अभी कारगर है । लेकिन इसको पीस दो । अब ये उग नहीं सकता । जबकि पदार्थ तो वही है । सरंचना बदल गयी । लेकिन क्या ये नष्ट हो गया ? नहीं । बिखर गया । कभी फ़िर घनीभूत हो जाने पर ये उगने की स्थिति में आ जायेगा । इसी प्रकार समुद्र के पानी का गर्मी द्वारा भाप आदि में रूपांतरित होकर बूंद । बादल । बर्फ़ । और बूँदों के कई स्तर पर संयुक्त होने से गढ्ढों में भरा जल । तालाब । झील । नदी ।
नहरें आदि का रूप ले लेता है । ये सब समुद्र के ही रूपांतरित रूप हैं । जो समय स्थिति अनुसार बार बार बनते बिगङते रहते हैं । यही " मैं " के अज्ञान रूप में जीव है । और " तू " के ज्ञान रूप में आत्मा होने लगता है । बूँद से सागर तक । अब इसी पर निर्भर है । क्या होने तक जा सके ।
9 सतपुरुष के द्वारा प्रकट किये गये प्रत्येक तत्व चेतन हैं ? अगर ऐसा है । तो जड़ क्या है ? क्या जड़ तत्व भृम मात्र है ?
ANS - अखिल सृष्टि में सिर्फ़ आत्मा में ही चेतन गुण है । ध्यान रहे । आत्मा अचल है । चेतनता या गति सिर्फ़ आत्मा से है । मगर स्वयं आत्मा में नहीं । इसके अलावा सभी तत्व । प्रकृति । सृष्टि आदि सब कुछ । जो भी है । जहाँ भी है । जङ है । जैसे अग्नि वायु जल आदि ये सभी तत्व जङ हैं ।  इनकी सक्रियता या 
गुण । जैसे आग में दाहकता । चेतन गुण से ही है । द्वैत में हर चीज सत्य है । अद्वैत ( की पूर्ण स्थिति ) में हर चीज भृम है । सिर्फ़ उसी 1 के अतिरिक्त । और वो स्वयं सत्य - है । है ॥ है ॥
शेष उत्तर अगले लेखों में । साहेब ।
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क्या आप जानते हैं - प्रापर्टी डीलिंग या किसी भी प्रकार की जमीन की खरीद फ़रोख्त व्यवसाय के रूप में करना महा पाप है । और इसके परिणाम सुनकर आप थर थर कांप जाओगे । इस पर विस्तार से बात फ़िर कभी ।
क्या आप जानते हैं - बृह्म ज्ञान बेचना महा पाप है । वशिष्ठ ने राम से कहा - प्रभो ! पुरोहिती अत्यन्त नीच कर्म है । लेकिन मेरे पिता बृह्मा ने कहा । त्रेता में सूर्य कुल में स्वयं बृह्म का अवतार होगा । इसलिये तुम्हारे लिये सूर्य वंश की पुरोहिती लाभदायक होगी । पर वह वशिष्ठ और अन्य स्थिति की बात थी । ध्यान रहे । वशिष्ठ इसका उपयोग व्यवसाय की तरह नहीं करते थे । फ़िर भी उन्होंने इसको नीच कहा । सभी शास्त्र इस बात पर एकमत है कि - वेद ज्ञान आदि बेचना महा पाप है । इसका अर्थ है । व्यवसायिक रूप से इस बृह्म ज्ञान का किसी भी रूप में उपयोग करना । जबकि आज सभी मर्यादायें लांघ कर तमाम - पुरोहित । कथा वाचक । भागवताचार्य आदि लगभग बेशर्मी से यही कर रहे हैं । बङिया मेकअप । महंगे वस्त्र । महंगी साज सज्जा का सैट । उसके टेलीकास्ट आदि बङिया तामझाम और अति महंगी फ़ीस में अलग अलग बहुरूप धरे ये ऐसा लगता है । साक्षात अभी अभी भगवान से सीधा मिलकर आ रहे हों - मेरा कन्हैया । मेरा बांके बिहारी ।
 मेरे राम । मेरे भोले आदि आदि ये इस प्रकार भाव विभोर होकर कहते हैं । जैसे भक्ति में बेहद उच्चता को प्राप्त हो चुके हों । और मात्र इनकी कथा सुनने से आपका मोक्ष हो जायेगा । पर जिस शास्त्र से ये बात कह रहे हैं । वही शास्त्र स्पष्ट कह रहा है । मरने के बाद - कन्हैया और स्वर्ग छोङों । खुद ये दीर्घकाल के लिये महा नरक रूपी दण्ड के भागी होंगे । और अपराध बस इतना ही कि - इन्होने अलौकिक दिव्य ज्ञान को व्यवसाय बनाया । उसमें सादगी के बजाय बहुरूपिया पन दिखाया । और जीवों को सफ़ेद झूठ बोलकर भरमाया ।  सोचिये  जब इन्हीं की ये हालत होगी । तो इनके पीछे चलने वालों की क्या होगी ?
हाँ ! यही व्यवसाय के बजाय । ये परमार्थ भावना से हरि गुण गान करते । तो ये अच्छा पुण्य । और अच्छे पुण्य फ़ल देता । इनको धन तब भी लोग देते । पर वह जरूरत के अनुसार लिया जाता । और इनका जीवन और शिक्षा और व्यवहार आचरण आडम्बर रहित होता ।
Guru ji pranam ! mein jaldi se jaldi apni kundlini jaagran karna chahta hun. Aap mujhe batayen anulom vilom karne ki sahi vidhi kya hai ? Or kundlini jaagran ke liye kya karna chahiye ? एक जिज्ञासु । मेल से ।
आप अपने स्तर पर कुण्डलिनी कभी जागृत नहीं कर सकते
। ये समर्थ गुरु के सानिंध्य में ही संभव है । हठ योग करने पर मृत्यु या गम्भीर पागलपन की स्थिति भी बन सकती है । इसके कई तरीके हैं । कई मंत्र हैं । कई स्तर के गुरु हो सकते हैं ।
आप फ़िरोजाबाद ( उ. प्र. ) के पास कौरारी स्थित हमारे आश्रम पर आ जाईये । 2 दिन में कुण्डलिनी सहजता से जागृत हो जायेगी । फ़िर बस आपको साधना ही करनी शेष होगी । लेकिन आने से पहले श्री महाराज जी से 0 96398 92934 नम्बर पर बात अवश्य कर लें । अन्य शंका समाधान भी फ़ोन पर जानें । व्यक्तिगत रूप से उत्तर देना संभव नहीं ।
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