02 मई 2012

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई

हिन्दू । मुस्लिम । सिख । ईसाई । आपस में सब भाई भाई । मानव की मानव के प्रति सदभावना का सन्देश देता ये नारा बेहद आकर्षक और प्रिय लगता है । पर दरअसल ये समाज में फ़ैलने वाली धार्मिक वैमनस्यता को दूर करने के लिये कभी किन्हीं परिस्थितियों वश गढा गया एक उपचार सा था । लेकिन जैसा कि हमेशा हुआ । हमारी बात पकङने की आदत ( जल्दबाजी में कोई मतलब निकालने से पहले । पहले इसके गूढ अर्थ पर विशेष ध्यान दें ) ने हमें ज्यादातर चीजों से फ़ायदे के बजाय नुकसान अधिक पहुँचाया । जैसा कि इसी या इस जैसे अन्य वाक्यों से हुआ । विश्व की जनसंख्या का बहुत बङा हिस्सा बेहद मजबूती से 4 भागों में विभाजित हो गया । लेकिन उससे भी पहले इसी नारे का और भी पोस्टमार्टम करें ।
हिन्दू । मुस्लिम । सिख । ईसाई छोङिये । क्या - हिन्दू हिन्दू । मुस्लिम मुस्लिम । सिख सिख । ईसाई ईसाई । ये आपस में ही भाई भाई हैं ? या बन पाये ? या बन जायेंगे ? तब फ़िर - हिन्दू । मुस्लिम । सिख । ईसाई के बारे में तो 
कल्पना करना ही कठिन है । दरअसल अनजाने में ही सही । ये एक तरह का धार्मिक विभाजन कर दिया गया । ये वास्तव में तो सदभावना के प्रसार हेतु किया गया । पर गौर करें । तो इसके बहुत घातक परिणाम धार्मिक अलगाव के रूप में भी हुये । जिससे दीर्घकालिक परिणामों के रूप में बहुत बङी हानि हुयी । जारी है । होती रहेगी । तब आईये । इसके मूल यानी जङों की तलाश करते हैं ।
बात शुरू करते हैं । ईसाई धर्म से । कोई 2000 वर्ष पहले ईसामसीह से ये धर्म शुरू हुआ । मैंने पहले भी कहा है कि यदि हम संसार के किसी भी धर्म का मूल तलाशें । तो उसका बीज भारत और आर्य संस्कृति के सनातन धर्म का ही निकलेगा । इसमें कतई कोई सन्देह हो ही नहीं सकता । ईसामसीह या मुहम्मद का जुङाव किसी न किसी रूप में भारतीय साधुओं से अवश्य ही हुआ होगा । या वे यहाँ आये हों । या भारतीय साधु वहाँ गये हों । जैसे अक्सर ही लोग आते भी जाते भी रहे हैं । इससे थोङा अलग हटकर प्रत्यक्ष सीधे सीधे के बजाय मुहम्मद या ईसामसीह से कोई ऐसा व्यक्ति भी जुङा हो सकता है । जो उनसे पहले भारतीय सनातन धर्म के सम्पर्क में रहा हो । इस तरह मूल फ़िर भी सनातन धर्म और आर्य संस्कृति का ही हुआ । ध्यान रहे । आर्य का अर्थ - हिन्दू नहीं । श्रेष्ठ होता है ।
अब ईसाई धर्म की शुरूआत पर गौर करें । ये शोध और बहस का विषय है कि - यीशु ने खुद को परमेश्वर का पुत्र कहा । या लोगों की भावना से प्रसारित हो गया ? जो भी हो । ईसामसीह चाहे कितना ही खुद को परमेश्वर पुत्र कहते रहते । कोई सुनने वाला नहीं था । लेकिन उनका मनुष्य का मनुष्य से प्रेम । राग द्वेष की भावना को दूर करता  सात्विक सन्देश । और इन सबसे  बढकर ईसा के अन्दर उत्पन्न हुयी दिव्यता से मिलने वाले लाभ से लोगों का ध्यान तेजी से उनकी तरफ़ आकर्षित हुआ । लेकिन फ़िर ध्यान रहे । थोङा ही गौर करने पर पता चल जाता है कि - ये व्यक्ति कुछ अलग कह रहा था ? उस समय की परिस्थितियों में एक चौंकाने वाली बात कही थी यीशु ने । कोई परमेश्वर है । इंसान को स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है । और  कैसे ? इसी का रास्ता बताया यीशु ने । इसलिये लोग सहज ही आकर्षित हुये । और ईसाई धर्म की शुरूआत होने लगी । उनके उपदेश जीवन चरित्र आदि के संग्रह से बाइबल का निर्माण हो गया । इसके बाद तब से अब तक बहुत कुछ घटा ।
पर आज ईसाईयत का कुल मिलाकर क्या रूप है ? मैंने यहीं इंटरनेट पर ही बहुत से profile में लिखा देखा है - मैं जीसस में विश्वास करता हूँ । करती हूँ । ये विश्वास क्यों है ? यीशु परमेश्वर के पुत्र हैं । उनको मानने वाले को स्वर्ग ही प्राप्त होगा । बस इसलिये । इसी लालच से ? बाकी कोई खास मतलब नहीं । और यही बात हिन्दू मुसलमान सिखों की भी तो है ।
आप गौर करें । तो आपको आश्चर्य होगा । आज ईसाईयों की बहुत बङी जनसंख्या के लिये ईसाई होने का सिर्फ़ इतना ही मतलब है - येरुशलम । चर्च । GOD । बाइबल ( मतलब यीशु जीवन का इतिहास ) । यीशु का चित्र । प्रतीक चिह्न क्रास । नियुक्त उपदेशी फ़ादर । रविवार को चर्च जाना । प्रार्थना । गलती करना । और फ़िर कनफ़ेसन । बस । परिणाम - मृत्यु के बाद heaven या hell की प्राप्ति । और वहाँ के अपनी कल्पना अनुसार सुख ऐशो आराम । या स्वयं कल्पित hell के दुख ।
और बस - अब जैसे सब कुछ तय ही हो गया । इन लोगों ने बुद्धि विवेक का प्रयोग करना ही छोङ दिया । इनके दिमाग में कभी प्रश्न ही नहीं उठता कि - ईसा को ये ज्ञान या दिव्यता कैसे हासिल हुयी ? उस परमेश्वर ने 2000 सालों में अब तक कोई दूसरा पुत्र ? इनका हालचाल जानने क्यों नहीं भेजा । शिक्षा ठीक चल रही है । या नहीं । जानने कोई ( प्रकट रूप ) क्यों नहीं आया । खुद ईसा ही 2000 सालों में एक भी बार दोबारा सशरीर क्यों नहीं आये । ( क्योंकि कई लोग दावा करते हैं ना - कि ईसा से उनकी भाव मुलाकात हुयी )
तो जो बेचारे ऐसे मुलाकात नहीं कर पाते । उनको आकर तसल्ली देना चाहिये कि - देखो मुझे मानने वाले स्वर्ग में जा रहे हैं । इतने लोग पहुँच गये । बीच बीच में आकर ज्ञान में मिल गयी अशुद्धियाँ के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहिये । लेकिन ईसा तब से फ़िर कभी नहीं आये । इस सबसे कुल मिलाकर क्या ये ध्वनि नहीं निकलती कि हम इंसानों में से कोई दूसरा या बहुत से अन्य भी ईसा हो ही नहीं सकते ?
लगभग 1400 वर्ष पहले मुस्लिम धर्म इसके पैगम्बर मुहम्मद से शुरू हुआ । आप गौर करें । तो आपको आश्चर्य होगा । आज मुसलमानों की बहुत बङी जनसंख्या के लिये मुसलमान होने का सिर्फ़ इतना ही मतलब है - मक्का मदीना । खुदा अल्लाह । काबा । मस्जिद । कुरआन । प्रतीक चिह्न चाँद तारा । 786 । नियुक्त मौलवी । 5 वक्त की नमाज । परिणाम - कयामत के समय जन्नत या दोजख  की प्राप्ति । और वहाँ के अपनी कल्पना अनुसार हूरें आदि सुख ऐशो आराम । या भीषण कष्ट ।
और यीशु जैसी ही बात मुहम्मद साहब पर भी लागू होती है । दोबारा कोई मुहम्मद ( जैसा ? ही पैगम्बर ) क्यों न हुआ ? या खुद वे ही क्यों नहीं आये ? जबकि आना कोई कठिन बात नहीं है । इस सबसे कुल मिलाकर क्या ये ध्वनि नहीं निकलती कि - हम इंसानों
में से कोई दूसरा या बहुत से मुहम्मद हो ही नहीं सकते ?
लगभग 600 वर्ष पूर्व सिख धर्म पूर्व में हिन्दू नानक से कबीर से जिन्दा स्वामी के रूप में ज्ञान लेने से शुरू हुआ । देखें - गुरु नानक का जन्म आधुनिक पाकिस्तान में लाहौर के पास तलवंडी में 15 अप्रैल 1469 को एक हिन्दू परिवार में हुआ । जिसे अब ननकाना साहब कहा जाता है ? 
आप गौर करें । तो आपको आश्चर्य होगा । आज सिखों की बहुत बङी जनसंख्या के लिये सिख होने का सिर्फ़ इतना ही मतलब है - इनके खास तीर्थ स्थान । रब्ब वाहे गुरु । गुरुद्वारा । श्री गुरुग्रन्थ साहब । प्रतीक चिह्न ( को क्या कहते हैं । मुझे पता नहीं ) नियुक्त पाठी आदि । ग्रन्थ साहब का पाठ करना । परिणाम - जो्ति में जोति समाना । या मृत्यु समय गुरु आदि का लेने आना । 
और ऊपर यीशु और मुहम्मद जैसी ही बात यहाँ भी लागू  होती है । दोबारा कोई नानक क्यों नहीं आये ? क्योंकि
आपने खुद ही वो रास्ता बन्द कर दिया । आपने संयुक्त वाणी पुस्तक को ही गुरु का दर्जा दे दिया । तब दोबारा कोई नानक आपके घर में कैसे हो पाये । इस सबसे कुल मिलाकर क्या ये ध्वनि नहीं निकलती कि - इंसानों में से कोई दूसरा नानक या बहुत से अन्य हो ही नहीं सकते ?
आप गौर करें । तो आपको आश्चर्य होगा । आज हिन्दुओं की बहुत बङी जनसंख्या के लिये हिन्दू होने का सिर्फ़ इतना ही मतलब है - तमाम तीर्थ स्थल । ईश्वर भगवान । मन्दिर । रामायण गीता । प्रतीक चिह्न ॐ । नियुक्त पुजारी गुरु आदि । पूजा भक्ति के अनेकों तरीके । परिणाम - अधिकतम सोच.. मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक की प्राप्ति । और वहाँ के अपनी कल्पना अनुसार सुख ऐशो आराम । या कष्ट । गोलोक । मोक्ष या उद्धार । या पुनः मनुष्य जन्म भी । इस सबसे कुल मिलाकर ( यहाँ - मुस्लिम । सिख । ईसाई से बात थोङी अलग हो जाती है ) क्या ये ध्वनि नहीं निकलती कि इंसानों में से कोई दूसरा राम श्रीकृष्ण या बहुत से अन्य हो ही नहीं सकते ? वैसे हिन्दुओं की बात करें । तो महापुरुषों आध्यात्म पुरुषों की सूची द्वैत और अद्वैत दोनों में ही बहुत बङी है । एक विशाल समृद्ध परम्परा ही है । इसमें लगातार कोई न कोई आता ही रहता है ।
अब कुछ देर को हिन्दूओं की बात छोङ दें । मुस्लिम । सिख । ईसाई की बात करें । इनके आध्यात्मिक उत्थान होने में 2 बहुत बङी बाधायें हैं - माँस और मदिरा । हालांकि मुसलमानों में ब्याज का धन और शराब  दोनों को ही हराम बताया गया है । परन्तु बहुत बङी संख्या में शराब पीने वाले मुसलमान हैं । ये सभी को पता है । कोई छुपी हुयी बात नहीं है । सिख और ईसाईयों के तो बच्चे युवतियाँ औरतें भी विभिन्न रूप में शराब का सेवन घर में ही करती हैं । ये उनकी दिनचर्या में है । शराब 
से धार्मिकता का पतन है । इसमें कोई सन्देह नहीं । क्योंकि ये अनेक वासनाओं को भङकाती है । और धीरे धीरे कुमार्ग पर ले जाकर पतन के गहरे गढ्ढे में गिरा देती है । 
लेकिन फ़िर भी इसका असर इतना घातक नहीं है । जितना माँस खाने का । क्योंकि ये मामला सीधा सीधा जीव हत्या से जुङा है । और इसकी सजा किसी हालत में माफ़ नहीं होती - काया से जो पातक होई । बिनु भुगते छूटे नहीं कोई ।
और आज हिन्दू भी शराब और माँस से अछूते नहीं है । नयी वैश्विक संस्कृति के प्रभाव में ब्राह्मण घरों के युवक युवतियाँ आदमी तक माँस खाने लगे । आपको आराम से अण्डा मछली चिकन खाने वाले मिल आयेंगे । इसके पीछे आज एक नयी वजह भी पैदा हो गयी है - बाडी बनाना । जिम का संचालक और डाक्टर सलाह देते हैं । स्वस्थ तन्दुरस्त रहने के लिये माँस खाओ । इसलिये ब्राह्मण भी माँस और शराब से जुङ गये । फ़िर अन्य हिन्दुओं की तो बात ही क्या ।
पर । पर सिख । मुस्लिम । ईसाई के तुलनात्मक ये % बहुत ही कम है । आज भी हिन्दुओं के संस्कार बेहद मजबूत हैं । अगर मोटा अनुमान लगाया जाये । तो सिख । मुस्लिम । ईसाई में 90% लोग माँस का सेवन करने वाले होंगे । जबकि हिन्दुओं में अभी भी मुश्किल से ये 30% के आसपास ही होगा । मैंने देखा है । बहुत बार प्रभावित होकर माँस खाने वाले हिन्दुओं को खुद ही संस्कार प्रेरित इतनी ग्लानि हुयी कि उन्होंने माँस खाना 
बिलकुल छोङ दिया । जबकि सिख । मुस्लिम । ईसाई धर्मों के लोगों में ऐसी बाह्य प्रेरणा बहुत मुश्किल 10% ही होती होगी । माँस खाना उनका जन्मजात संस्कार हैं । इसलिये आध्यात्मिक उत्थान होना संभव ही नहीं ।
अब कुछ विशेष तथ्यों पर गौर करें । ईसाई धर्म का भारत से क्या लेना देना ? और क्या है ईसाई धर्म ? GOD AND HEAVEN ही ना ? हिन्दू धर्म पुस्तकों में ये 2 लाइनें अनगिनत जगहों पर मिलेंगी ।
मुस्लिम धर्म का भारत से क्या लेना देना ? और क्या है मुस्लिम धर्म ? अल्लाह और जन्नत । भाषांतर । बदले हुये पर्यायवाची शब्दों में हिन्दू धर्म पुस्तकों में ये 2 लाइनें अनगिनत जगहों पर मिलेंगी ।
सिख धर्म का भी भारत से क्या लेना देना ? नानक खुद ही हिन्दू थे । बाबर आदि मुगलों के अत्याचार से बचाव के लिये उन्होंने स्थान विशेष के लोगों को कबीले के अंदाज में संगठित कर एक संगठन बनाया । जो तत्कालीन मुस्लिम शासकों द्वारा कराये जा रहे बलात धर्म परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष करे । और क्या है सिख धर्म ? रब्ब 
और जोति में जोति समाना । सिर्फ़ गीता और रामायण ही देख लो । बस यही गीत गा रहीं हैं ।
हिन्दू धर्म का भी भारत से क्या लेना देना ? और क्या है हिन्दू धर्म ? ईश्वर और स्वर्ग । आर्य सभ्यता । जी हाँ ! आर्य सभ्यता संस्कृति का समृद्ध इतिहास सदियों से यही बात बता रहा है । उसने सिर्फ़ भारत को ही नहीं । दुनियाँ को ही ये ज्ञान दिया है । और हम सब आर्य ही हैं । यदि हम किसी भी धर्म को मानेंगे तो । मैं दोहराता हूँ । किसी भी धर्म को मानेंगे । तो फ़िर - हम सब आर्य ही हैं ।  वरना हम आदिवासी जंगली कबीलों से अधिक नहीं हैं ।
यदि आप सभी पूर्वाग्रहों को छोङ कर इस लेख को समझेंगे । तो फ़िर कोई वजह नहीं कि आपके अन्दर कोई - हिन्दू । कोई मुसलमान । कोई सिख । कोई ईसाई । कोई अन्य बचा रह जाये । जो बचेगा । वह सनातन इंसान होगा । सच्चा इंसान ।
अब इस लेख की सबसे मुख्य बात । जो शायद आपको बहुत बङी और दुर्लभ असंभव लगती हो । पर मेरे लिये बहुत छोटी है । कहने जा रहा हूँ । आप मुझे 15 आयु वाले 4 किशोर - 1 हिन्दू । 1 मुसलमान । 1 सिख । 1 ईसाई । सिर्फ़ 1 साल के लिये दीजिये । मेरी गारंटी हैं कि मैं आपको सिर्फ़ 1 साल बाद - 1 राम या कृष्ण या ऐसे अन्य । 1 मुहम्मद । 1 ईसा । 1 नानक के रूप में लौटाऊँगा । समझने की कोशिश करें । 4 सिर्फ़ उदाहरण के लिये कहे हैं । 400 या 4000 या 4 00 000 भी हों । तो भी बनेंगे ।
15 आयु वाले इसलिये कहे । क्योंकि आपकी धार्मिकता के जटिल संस्कारों की किन्तु परन्तु की जङें अभी उनमें 
गहरी नहीं होंगी । वे अपरिपक्व मष्तिष्क के तेजी से दिव्य ज्ञान ग्रहण करने वाले होंगे । वरना अलौकिक ज्ञान ग्रहण करने की मानसिकता होने पर उमर से कोई मतलब नहीं ।
आईये चलते चलते आपको सन्त मत का एक व्यंग्यात्मक दृष्टांत सुनाते हैं । एक शिकारी ( काल ) था । दाने ( वासनायें ) डालता । जाल ( कर्मकाण्ड ) बिछाता । परिन्दों ( जीव ) को पकङता । और पका कर ( बारबार जन्म मरण ) खा जाता । आखिर एक बुजुर्ग पक्षी ( सन्त ) को उसके जाल और दाने की असलियत मालूम हो गयी । उसने सभी पक्षियों को बचने की सीख उपदेश दिया - शिकारी आयेगा ।  जाल बिछायेगा । फ़ँस मत जाना ।
सभी पक्षी बार बार यही दोहराने ( परम्परा गत पूजा पाठ ) लगे - शिकारी आयेगा ।  जाल बिछायेगा । फ़ँस मत जाना । शिकारी आया । बङा हैरान हुआ । अब तो सब उसकी चालाकी जान गये । उस दिन वह जाल लगाये बिना ही लौट गया । पत्नी ( माया ) ने पूछा । तो बोला - पक्षी सब समझ गये । अब फ़ँसने वाले नहीं । कहते हैं - शिकारी आयेगा ।  जाल बिछायेगा । फ़ँस मत जाना ।
पत्नी हँस कर बोली - दाने के लालची वे मूर्ख तोते ( रटन्तू ज्ञान ) असलियत को जरा भी नहीं समझें । वे सिर्फ़ इसको रटना भर सीख गये । आप आराम से काम 
करो । शिकारी फ़िर गया । उसने दाना जाल लगा दिया । पक्षी - शिकारी आयेगा ।  जाल बिछायेगा । फ़ँस मत जाना । कहते हुये जाल के अन्दर फ़ैला दाना चुगने लगे । और फ़ँसते गये ।
विशेष - इस लेख में आपको कोई तथ्यात्मक अन्य त्रुटि नजर आयी हो । कहीं गलत लगा हो । तो कृपया अवश्य बतायें । उसमें सुधार कर दिया जायेगा । इस लेख का उद्देश्य किसी धर्म के लोगों को ठेस पहुँचाना नहीं । बल्कि धार्मिकता की हकीकत तलाश करना मात्र हैं । अगर आप कोई सुझाव देते हैं । तो उसका हार्दिक स्वागत है ।
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