26 मई 2012

भव खंडना तेरी आरती

प्रिय राजीव जी ! नमस्कार । दिल में आया कि श्री गुरु नानक जी द्वारा जगन नाथ पूरी में परमात्मा की प्रकृति द्वारा आरती आपके साथ बाँटू । ताकि बाकी प्रेमी लोग भी आपके द्वारा इस अनमोल रचना के गूढ़ अर्थ को जानें - अशोक ।
रागु धनासरी महला 1 ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ।
धूपु मल आनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥1॥
कैसी आरती होइ ।
भव खंडना तेरी आरती ॥
अनहता सबद वाजंत भेरी ॥1॥ रहाउ ॥
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही ।
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥2॥
सभ महि जोति जोति है सोइ ।
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ ।
जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥3॥
हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा ।
क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नाइ वासा ॥4॥3॥
"मतिभृष्ट कुक्कुर" ( ये वाणी में नहीं है । अशोक जी ने भक्त भाव से अपने लिये लिखा है )
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धूपु मल आनलो ( मलय पर्वत से आती चंदन की सुगंध ही धूप ) पवणु चवरो करे ( वायु चंवर कर रही है ) सगल बनराइ फूलंत जोती ( वनों की सम्पूर्ण वनस्पति तुम्हारी आरती के निमित्त फूल बनी हुई है )
भव खंडना ( जनम मरन के नास करने वाले ) अनहता सबद वाजंत भेरी ( निर्वाणी नाम का उपदेश या दीक्षा
लेने के बाद झींगुर कीट जैसी आवाज का प्रकट हुआ अनहद ( लगातार । जिसकी कोई सीमा नहीं ) शब्द जो आकाश और अंतर आकाश ( मष्तिष्क के बीच ) में निरंतर गूँज रहा है ) तिस दै चानणि ( उसी का उजियाला ) सभ महि चानणु होइ ( सब में प्रकाशित है ) गुर साखी ( गुरु के द्वारा दिये निर्वाणी नाम उपदेश या गुरु दीक्षा से ) जोति परगटु होइ ( अन्दर का प्रकाश दिखता है ) जो तिसु भावै ( सिर्फ़ यही तुझे पसन्द है ) हरि चरण कवल ( भगवान के चरण कमल ) मकरंद लोभित मनो ( फ़ूलों के रस का लोभी मन रूपी भंवरा ) सारिंग ( हिरन । चातक । या प्यासा  )
विशेष - उपरोक्त आरती को सिर्फ़ प्रतीक रूप न समझें । कोई भी अच्छा साधक जब ध्यान अवस्था में अंतर आसमानों में पहुँचता है । तब ऐसे दृश्य उसे साक्षात दिखाई देते हैं । और ये कोई बहुत बङी स्थिति भी नहीं है । ध्यान की 1 बहुत छोटी सी स्थिति है । जिसको जगन्नाथ मन्दिर के पुजारियों द्वारा आरती के लिये कहने पर नानक ने बताया कि - असली आरती क्या है ? आप विवरण का सावधानी से मनन करके खुद समझ सकते हैं । नानक उदासीन पंथ के साधक थे । उन्होंने ही उदासीन पंथ चलाया था ।
आकाश रूपी थाल में सूर्य और चंद्र दीपक के समान हैं । मलय पर्वत से आती चंदन की सुगंध ही धूप है । वायु चंवर कर रही है । वनों की सम्पूर्ण वनस्पति तुम्हारी आरती के निमित्त फूल बनी हुई है । अनहद शब्द भेरी की तरह बज रहा है । हे भवखंडन ! तुम्हारी सीमित आरती किस तरह हो सकती है ?
गुरू नानक देव जगंनाथ गये । तहाँ आरती का समान हूआ । तब पंडतों ने कहा - हे साधू ! आपने भगवान की
आरती ना करी । अरु बैठा क्यों रहा ? तब गुरू नानक ने कहा कि - हम तो परमेसर के आगे ऐसी आरती करते हैं । जो सदैव काल ही हो रही है ।
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती । 
धूपु मल आनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलत जोती ।
अब आरती का रूपु कहते हैं - हे भवखंडन ! अकास रूपु आपकी आरती का थालु है । चंद्रमा सूरजु 2 दीपक उसमें धरे हैं । औरु यावत तारा मंडल है । सो ( जनक ) जानो मोती धरे हैं । व हे जगत के पिता मोती ( जनक ) जड़े हूये हैं । मलागर चंदन औरु तिनमे जो अगनि देही धूप है । पवन देवता चौरु करता है । हे जोती प्रकास रूप ! जितनी बनस्पति फूल रही है । सो सभ ( सब ) फूल हैं ।
कैसी आरती होइ । भव खंडना तेरी आरती । 
हे ( भव खंडना ) जनम मरन के नास करनेहार औरु तेरी आरती कैसी होवै ? कैसे हो रही है । सो कहते हैं । भेरी आदि सबद कुछ काल तक वजते हैं । जिस तेरी आरती का जीवों की बांणी रूप ( अनहता ) एकु रस सबदु भेरी आदिक वाजे वज रहे हैं । औरु इस प्रकार हम तेरी स्तुति करते हैं ।
अनहता सबद वाजंत भेरी ।
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही । 
विराट रूपु करके संहस्र 1000 तेरे नेत्र हैं । निरगुण रूपु में एक 1 भी ( नन ) नहीं है । विराट रूपु करके सहंस्र 1000 तेरी मूरति हैं । निरगुण करके एक 1 मूरति भी तेरी नहीं है । विराट रूपु करके - हे निरमल सुध सरूप तेरे हजारों चरन हैं । निरगुण सरूप में एक 1 भी चरण नहीं है ।
( बाबा कहते ) हे पिता परमेसर ! जगत के करते जिस घर अर्थात सतसंग में तेरा जसु हो रहा है । उस घर में अर्थात स्थान में मेल रखु ( प्राप्त कर ) मैं भी तेरी वडिआई करांगा । व इसमें तेरी वडिआई होवेगी । अर्थात गरीब निवाजी सिद्ध होवेगी ।
श्री अशोक जी का परिचय - चण्डीगढ के पास मोहाली के मूल निवासी अशोक कुमार पंजाबी है । लेकिन सिख नहीं है । अशोक अपने बचपन में ही माता पिता के साथ दिल्ली रहने आ गये थे । और तबसे लगातार दिल्ली ही रह रहे हैं । लगभग 15 साल से राधास्वामी पंथ से जुङे रहे अशोक जी को जब वहाँ से अथक कोशिशों के बाद ( यह सभी
विवरण इसी ब्लाग पर प्रकाशित है ) कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ । तब एक दिन नेट सर्चिंग सर्फ़िंग के दौरान अशोक जी का मेरे ब्लाग से परिचय हुआ । फ़ोन पर बात हुयी । और अशोक अब हमारे मण्डल के शिष्य है । मैं खुद नहीं कहता - ये किस स्तर पर सन्तुष्ट हुये ।  ये आपको अशोक जी के ही लेखों में समय समय पर उनकी भावना में खुद दिखाई देगा ।
अशोक जी ने सन्त मत का बचपन से ही अच्छा अध्ययन किया है । और आम - बाबा पुजारियों पाठियों साधुओं के तुलनात्मक इनका ज्ञान स्तर काफ़ी ऊँचा है । ध्यान रहे । अशोक कोई साधु सन्त नहीं है । इनके पत्नी बच्चे तथा अन्य परिवार है । उसकी जिम्मेदारियाँ भी हैं । दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में जीवन के सभी कर्तव्य निभाते हुये यह बेहद आसानी से सहज योग या सुरति शब्द योग करते हुये स्थायी सुख और अमरत्व की ओर निरंतर बढते हुये साधना रत हैं । साहेव ।
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