28 मई 2012

अरे मैं उड़ कैसे रहा हूँ - स्वपनिल

जय जय श्री गुरुदेव । प्रणाम राजीव भईया ! मेरे मन में स्वपन से जुड़े कुछ प्रश्न हैं । मुझे वैसे तो बहुत ही कम स्वपन आते हैं । पर जब आते हैं । तब बड़े ही अजीब स्वपन होते हैं । पर मैं इन पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता । क्योंकि अधिकतर स्वपन ऐसे होते थे । जैसे कोई एक अजीब सी घटना बार बार दोहराई जा रही हो । जिसका मेरे आस पास से कोई लेना देना नहीं है । या कभी कभी स्वपन में उड़ना । फिर जैसे ही निर्धारित स्थान पर पहुँचने वाला रहता । वैसे ही ये लगता कि - अरे मैं कैसे उड़ रहा हूँ ? और नीचे आने लगता । पर फिर अचानक से लगता । अरे नहीं । अभी तक तो मैं उड़ रहा था । फिर अब कैसे नीचे आ रहा हूँ । और फिर से उड़ने लगता । ये सब बड़ा ही मूर्खता पूर्ण लगता था । इसलिए मैं इन सब पर ध्यान नहीं देता था । पर कुछ समय से कभी कभी ऐसे सपने आ रहे थे । जैसे अगर किसी स्वपन में कोई कार्य हो रहा हो । तो उसके अगले दिन स्वपन में उसके आगे का कार्य होता रहता । जैसे किसी चलचित्र को किसी ने थोड़े समय के लिए रोक कर फिर आगे बढ़ा दिया हो । कभी कभी ऐसे 
स्वपन दिखे । जिन्हें मैं अपने अनुसार नियंत्रित कर सकता था । कभी कभी स्वपन में ही सोते समय स्वपन दिखे इत्यादि । पर इन्हें भी मैं नकारता रहा । यह सोच कर कि - सब कल्पनाये हैं । अस्थिर मन की । ये सब स्वपन मुझे कभी याद नहीं रहते । क्योंकि मैं इन पर ज्यादा ध्यान नहीं देता । पर अगर थोड़ा सोचता कि - क्या स्वपन था ? तो याद आ जाते हैं । या फिर अगर उनसे मिलती जुलती कोई घटना घटे । या कुछ लेख पढ़ने को मिले । तब याद आते हैं । पर आज मैं आपका ब्लॉग रोज की तरह ही पढ़ रहा था कि - तभी मुझे कल रात का स्वपन याद आया । मैंने आपको पिछले मेल में बताया था कि - मैं जब ध्यान करता था । तब किसी जगह आँखों के मध्य में अंदर जाने का आभास होता था । और मैं भयभीत हो जाता था । ठीक वैसा ही आज स्वपन में हुआ । पर इस बार मैं अंदर जाता गया । और एक काला बिंदु मुझे दिखाई दिया । मैं जैसे ही उसके एकदम नजदीक पहुंचा । वैसे ही पीछे से या कही से आवाज आई - यही काल पुरुष है ?? और मैं बहुत ही ज्यादा भयभीत हो गया । और मेरी नींद खुल गयी 
। फिर मैंने सोचा - लगता है । मैं इस बारे में कुछ ज्यादा ही कल्पना कर रहा हूँ । और पुनः सो गया । मैं इस बारे में आपको बताते हुए मन ही मन अपने आप पर बहुत हँस रहा हूँ  कि - मेरा नाम लगता है । स्वपनिल ठीक ही रखा गया है । राजीव भईया ! ये बताईये । क्या ये व्यर्थ के स्वपन कुछ मतलब के हैं ?
असल में मुझे गुरूजी से दीक्षा लेनी हैं । और इस विषय को लेकर मैं बहुत चिंतित हूँ । मुझे पता नहीं है कि मुझे घर से अनुमति मिलेगी । या नहीं ? क्योंकि मैंने बहुत समय पहले अपने माता पिता से पुछा था । तो उन्होंने मुझे कहा था कि - किसी व्यर्थ के बाबा के चक्कर में न फँसना । राजीव भईया ! कृपया मुझे इस विषय में मार्गदर्शन दीजिये ।
*************
स्वपनिल मेरी पूरी जिन्दगी में वो लङका है । जिससे मिलकर मुझे सबसे ज्यादा खुशी हुयी । क्या खासियत है स्वपनिल में ? अन्दर बाहर लगभग खाली । कोई कचरा नहीं । स्वपनिल की और खूबियाँ आगे उत्तर में भी विस्तार से आयेगी । रूप कौर मेरी जिन्दगी में वो लङकी है । जिससे मिलकर मुझे सबसे ज्यादा खुशी हुयी । एकदम भोली भावुक । अन्दर बाहर एक । कोई छल कपट नहीं । स्वपनिल जैसे लोग अपनी स्पष्ट सोच और तीक्ष्ण बुद्धिमता से सार को शीघ्र गृहण करते हैं । और लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त होते हैं । रूप कौर जैसे लोग अपने भोलेपन से सबके प्रिय होते हैं । और खास प्रभु खुद इनका ध्यान रखते हैं । ऐसे लोगों में ज्ञान ध्यान के अभिमान के बजाय सेवा और प्रेम भाव की प्रमुखता होती है । जो भक्ति में ज्ञान से भी बढकर माना गया है  । कैसे ? समझें । ज्ञानी और चतुर की उनसे बङे इतनी चिन्ता इसलिये नहीं करते कि - वो समझदार है । परेशानी से निबट लेगा । लेकिन कोई बहुत भोला है । समर्पण है । प्रेम भाव वाला है । उसका अतिरिक्त ख्याल रखना ही होता है । और ये सब निज
स्वभाव के आधार पर होता ही है । इसको आप बनाबटी नहीं बना सकते । आईये । अब स्वपनिल के स्वपन रहस्यों पर बात करते हैं ।
वैसे तो बहुत ही कम स्वपन आते हैं - ऐसी स्थिति मुख्यतः 3 तरह के लोगों के साथ होती है । 1 जो सामान्य कर्म युक्त दिनचर्या के बाद नियमानुसार श्रेष्ठ 8 घण्टे ( 24 घण्टे में ) ही आराम करते और सोते हैं । 2 बेहद श्रम युक्त कार्य करके सोने वालों को भी पता नहीं चलता । कब सोये । कब जागे ? उन्हें भी सपने नहीं आते । 3 ये स्वपनिल आपकी क्वालिटी है । जैसा कि मैंने कहा - आप खाली टायप के हो । कोई वासना गृहण ही नहीं करते । अगर कुछ करते भी हो ।  तो बेकार को डिलीट करते रहने की जो आपकी खासियत है । वह वासना MATTER को नये कल्पना चित्र बनाने ही नहीं देती । और जिन्दगी ( कोई भी हो । एक तुच्छ जीव से लेकर बङे देवताओं तक । स्वपन वासना ही है । स्वपन - स्व पन = अपनी अवस्था ) एक वासना स्वपन ही है । अष्टावक्र ने जनक से कहा - तेरा वो सपना 15 मिनट का था । और ये जिन्दगी 100 साल का सपना ही तो है ।
पर जब आते हैं । तब बड़े ही अजीब स्वपन होते हैं -  YES आप बिलकुल सही कह रहे हो । क्योंकि आपकी आंतरिकता लगभग वासना रहित है । शाश्वत सत्य को जानने की ललक कहीं न कहीं आपको लगातार बैचेन करती रहती है । इसी को  योग स्थिति कहते हैं । 1 अच्छी योग स्थिति । वासना को हटाना । और सत्य को गृहण करना । सार सार को गहि रहे । थोथा देय उङाय ।  इस आटोमैटिक प्राप्त ( पूर्व जन्म यात्रा के फ़लस्वरूप ) योग स्थिति के कारण आप कारण शरीर या कारण जगत में भले ही स्थूलता के तौर पर अनजाने में ही अनाङी पने से जाते हो । पर जाते हो । इसलिये कभी आपको कारण जगत या अपने ही कारण संस्कारों के चित्र ( स्वपन ) नजर आते हैं । ऐसा नहीं कि - ये सिर्फ़ आपके ही साथ होता हो । दुनियाँ के हर देश में बहुत लोगों के साथ होता है । पर वे समझ नहीं पाते । और हरेक को पता भी नहीं है । हर प्रश्न का उत्तर देने वाले राजीव बाबा आगरा में रहते हैं । और इंटरनेट पर उनका सत्यकीखोज ब्लाग भी है । इसलिये आपकी तरह ही असमंजस स्थिति में रह जाते हैं । वो स्वपन आपको अजीव इसलिये लगते हैं कि - आपकी हालिया जिन्दगी से कोई मैच नहीं करते । और कारण जगत में बहुत कुछ अनोखा चलता रहता है ।
जैसे कोई एक अजीब सी घटना बार बार दोहराई जा रही हो । जिसका मेरे आस पास से कोई लेना देना नहीं है - इस बात के भी 2 प्रमुख कारण होते हैं । 1 सत्ता तंत्र द्वारा बार बार आपको याद दिलाना । यानी ये घटना आपसे सम्बन्धित है । और दूसरा आपके योग जीवन में आने के संकेत के तौर पर आपको प्रायोगिक तौर पर पूर्व अभ्यास कराना । समझने की कोशिश करें । आप न चाहते हुये भी बार बार इस सबको ध्यान करेंगे । और आपकी सुरति अन्दर को जायेगी । और यही तो योग है । बस कायदे के योग में स्थितियों पर आपकी पकङ होती है । और आप वैधानिक तौर पर उसके अधिकारी होते है । अपनी मेहनत और स्थिति परिवर्तन के साथ साथ विभिन्न पदों ( पीछे वालों को छोङते हुये ) पर प्रमोट होते हुये पदाधिकारी भी ।
अरे मैं कैसे उड़ रहा हूँ - ऐसे स्वपन आने के कई उदाहरण स्वपन मनोबिज्ञान के इतिहास में मिलते हैं । मैंने देखा है । अंतर ज्ञान से कतई अपरिचित अक्सर मनो बैज्ञानिक मनमाने तरीके से इसकी व्याख्या कर देते है । जिसके पीछे वे विभिन्न मानवीय कल्पनाओं इच्छाओं का ही जिक्र करते हैं । पर वास्तव में ये सत्य नहीं है । मानवीय स्तर पर लगभग सभी की इच्छायें समान होती हैं । 1 छोटा सा बच्चा भी बङिया घटिया का फ़र्क साफ़ जानता है । तब ऐसे स्वपन सबको आने चाहिये । फ़िर क्यों नहीं आते ?
इसका कारण है । आपका इससे पूर्व जन्मों में ( चाहे लाखों साल पहले क्यों न हो ) किया गया कुण्डलिनी की किसी भी छोटी बङी शाखा का योग अभ्यास । द्वैत के कुण्डलिनी योग में जितनी भी सूक्ष्म लोकों अंतर लोकों दूरस्थ अंतिरिक्षीय लोकों की जो यात्रायें अनुभव में आती हैं । उसमें ठीक ऐसा ही लगता है कि आप किसी पक्षी की भांति परवाज करते हुये उङे चले जा रहे हैं । जाहिर है । आपका योग से पूर्व में कोई जुङाव रहा है । इसी प्रश्न का विस्तार अगले उत्तरों में भी आयेगा । 
अरे नहीं । अभी तक तो मैं उड़ रहा था - फ़िर आपका ये पूर्व जन्म का योग अभ्यास किसी ज्ञान संस्कार बीज की तरह आपके कारण शरीर में जमा रहता है । जिस प्रकार विभिन्न पाप पुण्य के संस्कार बीज जमा रहते हैं । ये बीज प्रारब्ध आदि नियम अनुसार अनुकूल जमीन और मौसम पाकर अंकुरित होने लगते हैं । और सम्बन्धित घटनायें घटने लगती हैं । लेकिन जब आप किसी हल्की समाधि की भांति स्वपन में सूक्ष्म हो उठते हैं । और स्फ़ुरण करते कारण के सम्पर्क में आते हैं । तब उङने लगते हैं । पर क्योंकि आप अभी जीव भाव में है । तब जैसे ही आपको अपनी स्वपनिल स्थिति का बोध होता है । आप नीचे आने लगते हैं । या सूक्ष्मता भंग हो जाती है । योग में ऐसी ही स्थितियों को कहा गया है - जब मैं था तब हरि नहीं । अब हरि हैं मैं नाहि । सब अंधियारा मिट गया । जब दीपक देख्या माहिं । यानी जब आपको स्व के मैं का बोध होता है । तब हरि से जुङे अनुभव होना बन्द हो जाते हैं ।
जैसे अगर किसी स्वपन में कोई कार्य हो रहा हो । तो उसके अगले दिन स्वपन में उसके आगे का कार्य होता रहता । जैसे किसी चलचित्र को किसी ने थोड़े समय के लिए रोक कर फिर आगे बढ़ा दिया हो - अगर आप किसी योगी के सानिंध्य में योग के सिद्धांत जानते होते । तो ये पूर्ण जिज्ञासा योग की 1 छोटी क्रिया मात्र है । यही विभिन्न प्रकार के साधक योग में करते हैं । आज जितना योग कर लिया । अगले समय उससे आगे का योग करते हैं । क्योंकि आपका योग अभी बिना गुरु के सिर्फ़ प्रायोगिक स्थिति में है । इसलिये आप बहुत धीरे धीरे विभिन्न स्थितियों का अनुभव करते हैं । दरअसल आप समझ नहीं पाते । नीचे के लोकों और विभिन्न काल खण्डों की यात्रा भी आप अंधेरे अन्दाज और अज्ञानता स्थिति में करते हैं । जिनसे कभी आपका जुङाव था । इसको ठीक से जानने समझने के लिये योग आध्यात्म बिज्ञान को जानना होगा । और इसके लिये 1 समर्थ गुरु की आवश्यकता होगी ।
कभी कभी ऐसे स्वपन दिखे । जिन्हें मैं अपने अनुसार नियंत्रित कर सकता था - नाक सीधे सीधे पकङो । या घुमा के पकङो । पकङी नाक ही जाती है ना । इसलिये बात वही है । आपका पूर्व संस्कार वश स्वचालित बेहद धीमा योग है । इसलिये आप उसमें जिस समय जैसी भूमिका में आ जाते है । दृश्य और आपका प्रभाव वैसा ही फ़लित होता है ।
पर अगर थोड़ा सोचता कि - क्या स्वपन था ? तो याद आ जाते हैं । या फिर अगर उनसे मिलती जुलती कोई घटना घटे - हाँ ! 1 आम इंसान भी अभी शून्य 0 टायप स्थिति में था । और यकायक उसे ऐसी बात याद हो आयी । जिसको अभी अभी तो क्या 6 महीना या 1 साल या दूर दूर तक उसने ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था । फ़िर अचानक कैसे याद आ गयी ? उत्तर वही है । स्वतः बनी शून्य 0 स्थिति में यकायक हुआ स्वतः योग । और इसके लिये किसी ध्यान किसी ज्ञान किसी गुरु की कोई आवश्यकता नहीं । तो सोना या स्वपन की परिभाषा सिर्फ़ आपने तय कर रखी है । जरा सोचिये । उस वक्त आप सो रहे हैं । तो स्वपन कौन देख रहा है ? किसी भी चीज का अनुभव जागृत अवस्था में ही हो सकता है ना ? इसलिये आप इसे कोई रहस्य न मान कर सोना या स्वपन शब्द हटा दें । तो यही चीज जिन्दगी में भी घटती है । और लगभग सभी के साथ घटती है ।
मैं जब ध्यान करता था । तब किसी जगह आँखों के मध्य में अंदर जाने का आभास होता था । और मैं भयभीत हो जाता था । ठीक वैसा ही आज स्वपन में हुआ । पर इस बार मैं अंदर जाता गया । और एक काला बिंदु मुझे दिखाई दिया । मैं जैसे ही उसके एकदम नजदीक पहुंचा । वैसे ही पीछे से या कही से आवाज आई - यही काल पुरुष है - बस ! यही मेरे लिये आपके प्रति भयभीत करने वाली बात है । काल पुरुष से नहीं । उसकी साले की तो ऐसी की तैसी । आपकी योग क्रिया लगभग निरंतर हो रही है ।  और इसका अनोखा रोमांचक आकर्षण बार बार आपको उस तरफ़ ले जायेगा । लेकिन बिना कायदे के सच्ची दीक्षा और सच्चे गुरु के यदि आपकी सुरति ( यहाँ चेतना समझ लें ) अन्दर कहीं फ़ँस गयी । तो ठीक वही बात होगी । जो अभिमन्यु के साथ हुयी । उसे चक्र व्यूह में घुसना तो आता था । निकलना नहीं । मैं कई बार कह चुका हूँ । कोई भी कुण्डलिनी जागरण या अन्य योग गुरु की शरण और दीक्षा के बिना पूरी तरह अवैधानिक और गैर कानूनी ही है । अक्सर मैंने इसके 2 ही परिणाम होते देखें हैं । गम्भीर किस्म का पागल पन या फ़िर अकाल मौत । ध्यान रहे । आप परीक्षण करके देख लेना । अब ये रुकने वाला नहीं है । इसलिये आपको तुरन्त किसी समर्थ गुरु की शरण में जाना चाहिये । और कायदे में ( दीक्षा लेने पर ) आते ही आप इस धरती पर कीङे मकोङों की तरह व्यर्थ रेंगने वाले इन तुच्छ मनुष्यों से बहुत बहुत ऊपर हो जाओगे । क्योंकि बहुत कुछ आप पहले ही हो । अपनी पूर्व पढाई के चलते ।
राजीव भईया ! ये बताईये । क्या ये व्यर्थ के स्वपन कुछ मतलब के हैं - इस सृष्टि में कोई भी चीज व्यर्थ और बे मतलब नहीं है । अब आपको ये समझ में आ ही गया होगा ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email