23 जनवरी 2012

सार शब्द जब आवे हाथा तब तब काल नवावे माथा

कई बार संसार में फ़ैले भ्रामक धर्म विचारों सिद्धांतों अनेक पूजा पाठ कर्म काण्ड से तृस्त मगर भक्ति के इच्छुक भक्त जिज्ञासुओं ने मुझसे पूछा है - काल पूजा और परमात्मा की पूजा में अन्तर कैसे किया जाये । सच क्या है । कैसे पता चले । हमारा गुरु या पंथ हमसे जो भक्ति करा रहा है । वो काल पूजा है । द्वैत है ।  या अद्वैत है आदि आदि ।
अब मुश्किल ये थी कि ये पूछने के साथ साथ उन्होंने किसी धार्मिक संस्था या गुरु आदि का नाम भी साथ में जोङ दिया । और आज मैं ये सच कहता हूँ कि - मैं तब पूर्ण स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाया । कारण आप आसानी से समझ सकते हैं । तमाम लोगों की आस्था को चोट न पहुँचाना । क्योंकि ये उत्तर मैं व्यक्तिगत न देकर ब्लाग पर सार्वजनिक रूप से दे रहा था । इसलिये थोङा घुमा के झूठ बोल दिया । अगर प्रश्नकर्ता समझदार है । तो इसमें छिपे रहस्य को पकङ लेगा । ऐसी ही मिली जुली जिज्ञासाओं के समाधान हेतु ये लेख है । जो आपको वास्तविकता से रूबरू करायेगा ।
सबसे पहली बात तो यही है कि परमात्मा की भक्ति मौन हर कर्म काण्ड से रहित और नाम जप पूर्णतया निर्वाणी (  बिना वाणी के जपा जाना । अजपा । जिसका जप स्वयं हो रहा है ) है । मतलब आपको 2 अक्षरों से बने शब्द का भी कोई भी नाम या मन्त्र गुरु देता है । तो वह सन्तमत आत्मज्ञान या अद्वैत की भक्ति नहीं है । बल्कि काल पूजा ही है । यहाँ नये लोगों को थोङी अङचन हो सकती है । क्योंकि हम या सच्चे सन्त मत के गुरु भी जो नाम देते हैं । उसको भी ढाई अक्षर का कहा जाता है । जाहिर है । ढाई अक्षर का होने से वह भी शब्द हुआ । पर अन्तर है । यह नाम वाणी के जैसा न होकर ध्वनि स्वरूप है । और चेतनधारा यानी स्वांस में स्वयं गूँज रहा 


है । और साधारण जीव स्थिति में यह नाम उल्टा हो गया है । इसी के लिये कहा गया है - उल्टा नाम जपा जग जाना । वाल्मीकि भये बृह्म समाना । इसी उल्टे नाम को प्राप्त कर जीव जब काग वृति ( कौआ स्वभाव । मल विष्ठा युक्त चीजों में आसक्ति ) से हँस हो जाता है । और बृह्माण्ड में ऊँचा उठने लगता है । तब ये हँस ज्ञान बोध से प्रकाशित हुआ इसी नाम को उलटकर " हँसो..हँसो " कहता है । जबकि काग वृति में अहम वश " सोहं..सोहं " पुकारता है । कहीं ररंकार आदि स्थिति पर ये र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र और म्म्म्म्म्म्म्म्म यानी काल पुरुष का र अक्षर और उसकी पत्नी माया का म अक्षर संयुक्त कर राम ध्वनि भी गुँजाता है । बस खास बात यही है कि अद्वैत में ये सब ध्वनि स्वरूप है । जबकि कुण्डलिनी जागरण जैसी क्रियाओं में ॐ आदि शब्द कुछ अन्य मन्त्र भी बिना बोले ठीक उसी तरह सुनाई देते हैं । जैसे हम वाणी से बोलते हैं ।
अतः कोई भी गुरु आपसे वाणी द्वारा 1 अक्षर का भी नाम या मन्त्र वाणी द्वारा जपने को कहता है । तो वह सतनाम यानी परमात्मा की भक्ति नहीं है । वाणी के सभी स्वर अक्षर ( अंतर आकाश में झींगुर जैसी निरन्तर ध्वनि ) और उसके कंपन  से उत्पन्न हो रहे हैं । और हमारे मुँह से निकलकर वापस आकाश में जाकर उसी अक्षर में लीन हो जाते हैं । और अक्षर को ही ज्योति कहते हैं । मतलब ज्योति कहते ही नहीं । इसका ठीक  दीपक की ज्योति जैसा सुघङ स्वरूप है । जबकि अपने दूसरे अक्षर स्वरूप में ये झींगुर 


जैसी निरन्तर ध्वनि है । इसी को अखण्ड रामायण । राम कथा । या शंकर द्वारा पार्वती को सुनाई - अमरकथा भी कहते हैं । लगभग यही स्थिति शून्य 0 ज्ञान की कही जाती है । और यही काल भी है । देखिये - अक्षर को ही सत्य बतावे । वे है मुक्त वियोगी ।
जहाँ तक मुख वाणी कही सो सब काल का ग्रास । वाणी परे जो शब्द है सो सतगुरु के पास । और वह सार शब्द है । कबीर साहब ने कहा है - धर्मदास  तोहे लाख दुहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ।
अब इसके सबूत भी देखिये - सार शब्द जब आवे हाथा । तब तब काल नवावे माथा ।
यानी बिलकुल अंतिम स्थिति । जितनी भी आपने पढी या सुनी । उनसे एकदम अलग । इसी निर्वाणी नाम की भक्ति करते करते जब जीव अक्षर से भी पार । कई और स्थितियों से गुजरकर । एक तिनका वासना से भी रहित हो जाता है । तब ये सार शब्द ऊर्ध्व से उतरता है । और उसे खींचकर पार ले जाता है । लेकिन इससे पहले की स्थिति तक काल भी है । और माया भी । हालांकि राहत की बात ये हो जाती है कि कई VIP सहूलियतें साधक को पहले से ही मिलनी

शुरू हो जाती हैं । जैसे - जबसे रघुनायक  मोहि अपनाया । तबसे मोहि न व्यापे माया । यानी माया के क्षेत्र में रहते हुये भी उससे प्रभावित नहीं होते । उसका जादू बेअसर ही रहता है । काल हानि नहीं पहुँचाता - जबसे शब्द सुनो असमानी । तब से काल करे नहिं हानि ।
यही सार शब्द खींचकर परमात्मा से मिलाता है । उसी स्थिति को साक्षात्कार । आनन्द । परमानन्द । अवर्णनीय आदि कहा गया है । देखिये - अक्षर तीत शब्द एक बांका । अजपा हू से है जो नाका । ऊर्ध्व में रहे अधर में आवे । जो जब जाहिर होई । जाहि लखे जो जोगी फ़ेरि जन्म नहिं होई ।
यानी इससे पहले आवागमन है । जन्म मरण है ।
और भी प्रमाण देखिये - सार शब्द निर्णय का नामा । जासे होत मुक्त को कामा । यानी असली आत्मा का लक्ष्य । और यही गूढ है । अति गुप्त - सार शब्द निज गुप्त है कहऊँ वेद तोय सार । पाईये सो पाईये बाकी काल पसार । इसका जानने वाला शरीर बदलता हुआ सदैव अपने आप में स्थित रहता है । यानी माया से परे - शब्द न बिनसे बिनसे देही । हम साधु हैं शब्द सनेही ।
और देखिये । अद्वैत सन्तमत की एक मामूली लाइन । जो पूरे द्वैत ज्ञान की धज्जियाँ ही उङा देती है ।
धर्म कर्म दोऊ बटे जेवरी । मुक्ति भरे जहाँ पानी । यह गति बिरले जानी ।


और अन्त में - क्या आप जानते हैं । शंकर । महादेव । महाकाल । रुद्र । ( कालपुरुष और अष्टांगी माया के सबसे छोटे पुत्र । ) आदि कई रूपों वाले इस देवता की पूजा करने वाले अन्ततः सिर्फ़ भूत प्रेत योनि को प्राप्त होकर दीर्घकाल के लिये प्रेत गण बनते हैं । उनका अन्य कोई परिणाम नहीं होता । क्योंकि शंकर ही तम गुण का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये इन्हीं की कुर्सी है । प्रमाण - बृह्मा - रज । विष्णु - सत । शंकर - तम । और ये बताने की आवश्यकता नहीं कि तम गुण आसुरी प्रवृति को पोषण देता है ।
तो अब क्या ठीक है - भोले शंकर भूल न जाना । गाङी छोङ के दूर न जाना । ये या - भोले शंकर भूल ही जाना । मेरी गाङी के कभी पास न आना । ये ?
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