17 जनवरी 2012

गुरु क्या मानव देहधारी ही हो सकता है ?

आदरणीय राजीव जी ..सप्रेम एवं सादर दंडवत प्रणाम । आज मैं आपको अपने बचपन से अब तक की कहानी सुनाने का दु:साहस कर रहा हूँ । कृपया सहानुभूति पूर्वक बाँच कर मुझे उचित मार्गदर्शन दें कि आगे अब मुझे क्या करना चाहिए । आप जैसा आदेश । सन्देश करेंगे । मैं वैसा ही करने का पूरे मनोयोग से प्रयत्न करूँगा ।
बचपन में मैं एक अपने आप में मगन सा रहने वाला बालक था । जिसे दुनियादारी से अधिक मतलब नहीं होता था । पढाई में औसत से ऊपर रहता था । इसलिए घर वालों को इस बारे में अधिक चिंता नहीं थी । चिंता थी तो इस बात की कि बड़ा होकर ये कही साधू वगैरह ना हो जाए । मेरे अंतर्मुखी स्वभाव को बदलने के लिए मेरी ममतामयी माँ ने किसी थानक पर ले जाकर एक बार पूजा वगैरह करवाई । जिससे निश्चित ही मेरे स्वभाव में कुछ बदलाव भी देखा गया ।
इसके पश्चात एक दूसरी समस्या कुछ दिन बाद खड़ी हुई कि दस बारह वर्ष की उम्र में भी भरपूर शारीरिक श्रम के बाद भी देर रात तक मुझे निद्रा लाभ नहीं होता था । मन में अनेक तरह के विचार चलते रहते । और दिमाग उनमे उलझा रहता ।
इसका भी उपाय एक दिन मेरी प्रात: स्मरणीय माँ ने ही बताया । एक दिन उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा नींद ना आये । तो राम का नाम लिया करो ( उनकी भाषा में हमारे अंदर भी एक जीभ होती है । उसी से राम को स्मरण किया करो )  यह उपाय भी कारगर रहा । और नींद लेने का एक सुगम उपाय मुझे मिल गया ।
सबसे बड़ी समस्या जो किशोरवय में कदम रखने के एक दो वर्ष बाद ही शुरू हुई । और आज तक जिसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा । वह है - अप्राकृतिक यौनाचार । इस बीच शादी ,बच्चे सब हो गये । पर वासना है कि साथ नहीं छोडती । योगासन वगैरह 


का बचपन से मुझे शौक रहा । और इनकी वजह से आम स्वास्थ्य अच्छा बना रहा । पर अब 60 की उम्र के बाद धीरे धीरे शारीरिक कष्ट बढ़ने लगे है । आपने वासना से छूटने का उपाय सुरति शब्द साधना को बताया है । कृपया बताएं । ये दीक्षा मैं कब और कहाँ ले सकता हूँ ।
एक बात और । करीब दस वर्षों तक मैंने प्रात:काल में सूर्योदय के समय सूर्य के समक्ष ( सूर्य को गुरु  मान कर ) मन एकाग्र करने की साधना की । उसके तात्कालिक लाभ भी हुए । और स्वास्थ्य में सुधार और वासना पर लगाम भी लगी । लेकिन धीरे धीरे शारीरिक शिथिलता के चलते उसे बंद करना पड़ा । मेरा प्रश्न ये है कि - गुरु क्या मानव देहधारी ही हो सकता है ? या इतर भी गुरु हो सकते हैं । प्रतीक रूप से । हमारे एक नियमित पाठक ।
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मैं अपने सभी पाठकों को बता दूँ कि पावर कट व्यवधान अभी हद से ज्यादा ही चल रहा है । इसलिये उत्तर देने तथा अन्य लेख आदि के प्रकाशन में काफ़ी रुकावट आ रही है
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हर इंसान को ऐसा लगता है कि वह कुछ खास है । और उसका जीवन कुछ अलग सा है । ये मैं अपनी जिन्दगी में मिले हजारों लोगों से अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ । जबकि सच ये नहीं है । हर इंसान अपने आप में अनोखा है । बशर्ते आप उसको सही से जान पायें । आप गौर कीजिये । समस्त जीव चाहे वो मनुष्य योनि में हों । या 84 में । एक सीमित वर्ग में जीते हैं । एक खास अपना वर्ग । अनजाने में आपको लगता है कि आप दुनियाँ

जहान को जानते हैं । उसकी नालेज आपको है । वृद्ध लोगों का अक्सर प्रसिद्ध जुमला है - ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये ।
पर ये सच नहीं हैं । एक मजदूर से लेकर प्रधानमन्त्री और धनपति तक एक सीमित वर्ग में जीने को मजबूर है । इसका उदाहरण आप किसी खास बीमारी में आसानी से देख सकते  हैं । जब आपकी जानकारी में कोई एक विशेष रोग से गृसित होता है । और आप सोचते हैं - ऐसा तो आज तक नहीं देखा । पर जब अस्पताल जाते हैं । तो उससे भी गये गुजरे मरीज वहाँ देखने को मिलते हैं । तब आपको नया आश्चर्य होता है । और पुराना खत्म हो जाता है ।
अतः विभिन्न छोटे बङे सच्चे अलौकिक अनुभवों से जुङे मुझे बहुत लोग मिले । और सबको यही लगता था कि उनका अनुभव खास है । पर इस संसार को विलक्षण कहा गया है । विलक्षण शब्द पर गौर करिये । अनोखा और प्रतिपल चमत्कारिक ।
द्वैत जीवन का पूरा खेल कर्म संस्कार पर आधारित है । और संस्कार से विभिन्न सुख दुख का कर्मफ़ल बनता है । इसे हर हालत में भोगना ही होता है ।  दुख की बात छोङिये । कोई इंसान चाहे कि - उसे प्राप्त सुख नहीं भोगना । असंभव । भोगना ही होगा - देह धरे के दण्ड को भोगत है हर कोय । ज्ञानी भोगे ज्ञान से मूरख भोगे रोय ।
इसलिये आप साधु हो जाते । या डाकू । आपकी माताजी इसमें कुछ नहीं कर सकती थी । अतः ये पूजा वगैरह । होने वाले कार्य का माध्यम बनकर । बहाना बन जाते हैं । होनी परमात्मा के बाद दूसरी सबसे बङी शक्ति है । ये महा देवताओं

को भी नहीं बख्शती । इसलिये सच्चाई में यह सब मन को झूठी तसल्ली देना भर है । वास्तविकता यही है । जो होना था । वैसी ही स्थिति बन गयी - तुलसी जैसी भवितव्यता तैसी होत सहाय ।
हाँ नींद न आने वाली आपकी बात एकदम योग बिज्ञान के अनुसार बैज्ञानिक आधार पर है । दरअसल कभी कभी विशेष भोजन या हमारे शरीर में अनेक कारणों से बन रहे उत्तेजना पैदा करने वाले रसायन एक स्थिति में बनने लगते हैं । मनोचिकित्सिक इसे दिमाग एक्टिव होना कहते हैं । सामान्य जीवन में कभी कभी शादी । नौकरी का इंटरव्यू । कोई झगङा आदि बहुत से कारणों से भी दो तीन दिन ऐसी स्थिति बन जाती है । जब नींद नहीं आती । बहुत से लोग सोते समय एक अतिरिक्त स्ट्रोंग चाय ही पी लें । तो भी उनको नींद नहीं आयेगी । क्योंकि उसका उत्तेजक रसायन निश्चित अवधि तक सक्रिय रहता है ।
इसलिये जब आपने मौन ( केवल सोचने द्वारा बोलना ) राम राम कहा । तो ये एक योग स्थिति हो गयी । और गौर करें । उस वक्त इसमें कुछ न कुछ भक्ति भाव का भी ‍% रहा होगा । अब मजे की बात ये है कि राम राम की जगह आप अपना नाम या माताजी पिताजी भाई बहन किसी का भी इसी तरीके से मौन जपते । तो भी 100% परिणाम यही होता । इसकी जगह एकटक किसी बिन्दु को देखते रहते । तो भी 100% परिणाम यही होता । योग में अन्दर जाने का तरीका ही यही है । निशब्द ।
हमारे सम्पर्क में आने पर हम आपको आपका असली नाम बता ( जगा ) देंगे । और बहुत अच्छा है । आप बचपन में ही इसका अभ्यास कर चुके हैं । तब आप अपने सभी रहस्य स्वयं जानेंगे ।
अप्राकृतिक यौनाचार - यहाँ भी वही बात है । आपको लगता है । यह आपके अन्दर है । या कुछ लोगों के अन्दर

ही होती है । पर मुझे लगता है 70% लोग इसके शिकार होते हैं । मेरी एक महिला से बात हो रही  थी । जब मैंने प्रसंगवश ये सच कहा  - गुदा मैथुन वाले  निश्चय ही नर्क जाते है । उसने मजाक किया - योनि वाले स्वर्ग जाते है क्या ?
पर वास्तव में यह मजाक की बात नहीं थी । अटल सत्य था । गुदा से प्राण निकलने पर जीवात्मा नरक ही जाता है । और गुदा मैथुन में आसक्ति होने पर अन्त समय में वश कुवश उसकी समस्त चेष्टायें उधर ही हो जाती हैं । और वह मजबूर हो जाता है । खैर..कामवासना के ऐसे ही मुद्दों पर अपने अनुभव का लेख जल्द ही लिखूँगा ।
दीक्षा कब और कहाँ - श्री महाराज जी ही आपको इच्छानुसार दीक्षा देंगे । लेकिन इससे पहले आप मेरे सभी ब्लाग्स पर लिखे मोबायल नम्बर पर उनसे बात कर लें । मेरा अनुभव कहता है । आपको होली के आसपास दीक्षा मिल पायेगी । वो भी तब । जब आप श्री महाराज जी से तब तक दो तीन बार बात कर लेंगे । और आपको अनुमति मिल जायेगी । अब श्री महाराज जी भृमण पर या आगरा आदि नहीं आते । इसलिये आपको आगरा से फ़िरोजाबाद ( 50 km ) और फ़िरोजाबाद से कौरारी आश्रम ( 25 km ) आना होगा ।
यदि आपके पास समय हो । तो कम से कम दो तीन दिन का समय लेकर आयें । एकदम 100% दीक्षा होगी । जल्दबाजी में वह बात नहीं हो पाती । होली के बाद महाराज 


जी दीक्षा देने के बाद पूरे 11 दिन आश्रम में रखने का नियम भी बनायेंगे । ताकि 11 दिन तक अपनी देखरेख में शिष्य की ध्यान में पूर्ण प्रविष्ट कराई जा सके । फ़िर पक्का काम हो जाता है । अन्यथा शिष्य अपनी कमी का दोष गुरु को लगाता है । हमारे जो पुराने शिष्य हैं । जिन्हें ठीक से प्रविष्ट नहीं हुयी । या अनुभव नहीं हो पा रहे । वे यदि चाहें । तो 11 दिन आकर ध्यान पक्का कर लें ।
गुरु मानव देहधारी - ज्यों तिल माँही तेल है । ज्यों चकमक में आग । तेरा सांई तुझमें है । जाग सके तो जाग । ये बात सामान्य और अज्ञान निद्रा में सोये मनुष्य के लिये कबीर साहब ने कही है । सोचिये । 1 सामान्य मनुष्य में सांई मौजूद है । तो गुरु सतगुरु में क्यों न होगा । शास्त्र के इन वचनों को याद करिये । उसने विभिन्न योनियाँ रची । पर सन्तुष्ट न हुआ । तव उसने मनुष्य शरीर बनाया । और सन्तुष्ट होकर इसी में प्रविष्ट हो गया । आपने सूर्य को गुरु माना । वर्ष के 12 सूर्यों के अलग अलग 12 आदित्य पुरुष हैं । देहधारी । आपकी माँ ने आपको नींद  न आने का उपाय (  ज्ञान = गुरु ) बताया । किसने बताया । माँ = गुरु । देहधारी । हाँ ये अलग बात है । राजीव बाबा वास्तव में एक भूत है । मजाक कर रहा हूँ । यहाँ भी आपको उत्तर देहधारी ही दे रहा है ।
गौर करें । तो जन्म से ( माँ गुरु ) बालपन ( बङे भाई बहन सखा आदि गुरु ) पढाई ( शिक्षक गुरु ) बीमारी आदि ( डाक्टर गुरु ) शादी आदि ( पण्डित गुरु ) यहाँ तक कि आप मामूली रास्ता भी पूछें ( बताने वाला गुरु ) आप किसी किताब से ज्ञान ले ( उसका लेखक गुरु

) गहराई से सोचें । तो जिन्दगी 1 मिनट गुरु के बिना नहीं चल सकती । ये प्रथ्वी जिस पर आप रहते हैं । टिकी और घूमती है - गुरुत्व बल पर । सूरज चाँद तारे सभी टिके हैं और घूमते हैं -  गुरुत्व बल पर । आपके अन्दर भी एक आंतरिक गुरु मौजूद है । देहधारी गुरु आपको उसी गुरु से मिलाते हैं । आपके दूसरे उत्तर में भी ऐसी बातें आयेंगी । अतः आज इतना ही ।
आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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