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22 जनवरी 2012

बुद्ध परमात्मा के सम्बन्ध में मौन नहीं हैं

आदरणीय राजीव भाई जी को स्नेहाभिवादन..आपने आत्मज्ञान के विषय में कबीर जी को सर्वोपरि गिनाया है । कबीर के बारे मेरा ज्ञान तो इतना ही है कि वो एक फक्कड किस्म के संत थे । जो जात-पांत और उंच-नीच के भेद को नहीं मानते थे । और जिन्हें आत्मा - परमात्मा की बातों से ज्यादा सामाजिक सरोकारों से अधिक मतलब था । यहाँ तक कि आजकल के साम्यवादी भी उन्हें कोट करते हैं । और कबीर उन्हें संत से ज्यादा साम्यवाद के पक्षधर लगते हैं । कबीर की तरह ही बुद्ध भी कम्युनिस्टों की पहली पसंद हैं । क्योंकि वे भी परमात्मा के सम्बन्ध में मौन हैं । कृपा करके कबीर के जन्म , जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में विस्तार से बताएं । जिससे हमारे ज्ञान में अभिवृद्धि हो । और ज्ञान के उजाले में आपने जीवन की राह को अधिक आसान बना सकें । आपका । कृष्ण मुरारी कोटा से ।
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बुद्ध परमात्मा के सम्बन्ध में मौन नहीं हैं । उन्होंने बात को अपने ढंग से कहा है । उनका मतलब है । खुद को पूरी तरह से जान लेना ही परमात्मा को जान लेना हैं । तुलसीदास ने कहा है - जेहि जानहि जाय देहु जनाई । जानत तुमहिं तुमहीं हुय जाई । यानी भेद मिट जाता है । आत्मा अपनी सभी स्थितियों उपाधियों से परे होकर अपने मूल में मिल जाता है । उसी को परमात्म स्वरूप कहते हैं ।
कबीर के बारे में अनुराग सागर के लेखों और अन्य स्थानों पर बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है । फ़िर भी एक नये अन्दाज में और भी जानकारी देने की कोशिश करूँगा ।


सबसे पहले वास्तविक कबीर क्या है ? इसका मतलब समझिये - काया में जो रमता वीर । कहते उसका नाम कबीर । यानी धुर ( सिर के मध्य ) से लेकर नाभि तक जो स्वांस में रमण कर रहा है । वही कबीर है । साधारण स्थिति में स्वांस मुँह में तलुये ( नाक द्वारा ) से नाभि तक आती जाती प्रतीत होती है । पर वास्तव में इसका आना जाना धुर से हो रहा है । हँस दीक्षा में सत्यनाम द्वारा साधक ज्यों ज्यों ऊपर की मंजिलें तय करता जाता है । वो इस चेतनधारा से जुङता जाता है ।
अवतार की तर्ज पर कबीर भी यदा यदा धर्मस्य ग्लानि..की तरह अज्ञान और तन्त्र मन्त्र के पाखण्डी ज्ञान का बोलबाला हो जाने पर हर युग में प्रकट होते हैं । त्रेता में इन्होंने ही हनुमान को वास्तविक राम का बोध कराया था । जबकि वे तब तक अवतारी राम को ही सब कुछ 


मानते थे । रावण पत्नी मंदोदरी को भी कबीर ने ज्ञान यानी हँसदीक्षा दी थी । आज से लगभग 500 वर्ष पहले - सिकन्दर । राजा वीर सिंह । मगहर नरेश बिजली खाँ पठान आदि राजा महाराजा कबीर के शिष्य हुये ।
अवतार और सन्त कभी जन्म नहीं लेते । बल्कि प्रकट होते हैं । इसके 2 तरीके होते हैं । 1 तो अपनी इच्छा अनुसार किसी अबोध शिशु से लेकर बालक तक का शरीर बनाकर कहीं प्रकट हुये । और नाटकीय ढंग से किसी दम्पत्ति आदि को प्राप्त हो गये । और फ़िर लीला करने लगे ।
दूसरे किसी ऐसे दम्पत्ति को । जो जन्म जन्म से इस इच्छा से पुण्य तप आदि कर रहा है कि उसकी सन्तान के रूप में कोई दिव्य । भगवत । या सन्त आत्मा उत्पन्न हो । तब उचित समय आने पर जब उस स्त्री को गर्भ धारण होता है । तो सम्बन्धित आत्मा उस गर्भ के लिये संकल्प कर देती है । और गर्भस्थ शिशु बिना आत्मा के ही समय पूरा कर जन्म लेता है । जब वह उदर से बाहर आ जाता है । तब सम्बन्धित आत्मा उसमें प्रविष्ट हो जाती है । इस तरह ये लोग गर्भवास में नहीं रहते ।
वैज्ञानिक आधार पर यह बात बङी अटपटी सी लगती हैं । पर इस विलक्षण रहस्यमय सृष्टि में बहुत कुछ अनोखा है । ठीक यही तरीका कछवी अपने अण्डों को सेने में अपनाती है । कछवी रेत में अपने अण्डे देकर फ़िर उनके पास नहीं जाती । और मात्र ध्यान से पोषित करती हैं । और ये वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बात है । दो कछवी एक साथ अण्डे दें । और उनमें से एक की मृत्यु हो जाये । तो उस कछवी के अण्डे सङ जायेंगे ।


और जिन्हें आत्मा - परमात्मा की बातों से ज्यादा सामाजिक सरोकारों से अधिक मतलब था - जैसा कि मैंने अक्सर कहा । लोगों का यह स्वभाव ही होता है कि वे अपने मतलब की बात पकङ लेते हैं । 15 वर्ष की आयु में मैं अक्सर एक बात कहता था - एक भगवान का संविधान होता है । एक देश का संविधान होता है । और एक प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुकूलता के आधार पर निजी संविधान बनाता है । जिससे वह खुद को झूठी तसल्ली दे सके । मजे की बात है । ये संविधान हम बालपन से ही शुरू कर देते हैं । देखिये । मैया मोरी मैं नही माखन खायो । मैया मोरी मैंनें ही माखन खायो । इस बात को थोङा स्टायल में लय से कहने पर समान शब्द बिलकुल  विपरीत अर्थ कर रहे हैं ।
कबीर के बारे में मैंने हमेशा कहा । सिर्फ़ 2 लाइनों में । आरपार । और बहुत ऊँची बातें उन्होंने कही है । जैसी उपलब्ध इतिहास में ( मेरा दावा । दूसरे शब्दों में चुनौती भी । आगे प्रमाण भी देखें ) कोई कह ही नहीं पाया । यही कबीर कहते हैं - रहना नहीं देश विराना है । यह संसार कागद की पुङिया बूँद पङे गल जाना है । केहि समुझावे सब जग अँधा । सबहिं भुलाने पेट के धँधा ।
अब गौर करिये । कितनी गहन बात है । अविनाशी जीव का ये अपना देश ही नहीं है । पराया देश है । काल (

पुरुष ) और उसकी पत्नी माया का देश । जीव को उसने एक समझौते के तहत अपने धन ( युगों के तप से ) से खरीदा है । और समझौते के विरुद्ध उसे काम क्रोध आदि मायाजाल में फ़ँसाकर बँधुआ मजदूर की तरह अत्याचार करने लगा । और ये संसार । जिससे तुम मोहित हो रहे हो । इसकी हैसियत एक कागज की पुङिया समान है । जिस पर ज्ञान रूप जल की बूँद पङते ही गल जायेगा । यानी इतना तुच्छ । जिसकी एक ज्ञान बूँद के बराबर भी महत्व नहीं ।
अब दूसरी बात देखिये । किसको समझाये । सब जग अँधा हो रहा है । और सिर्फ़ पेट भरने में अपने असली लक्ष्य को भूल गया । और भी देखिये ।
तू मति जाने बावरे । मेरा है यह कोय । प्रान पिण्ड सो बंधि रहा । सो नहिं अपना होय ।


चले गये सो ना मिले । किसको पूछू जात । मात  पिता सुत बान्धवा । झूठा सब संघात ।
जागो लोगों मत सुवो । ना करो नींद से प्यार । जैसा सपना रैन का ।  ऐसा यह संसार ।
मूरख शब्द न मानई  । धर्म न सुने विचार । सत्य शब्द नहिं खोजई  । जावे जम के द्वार ।
चेत सवेरे बाचरे । फिर पाछे पछिताय । तोको जाना दूर है  । कहैं कबीर बुझाय ।
क्यों खोवे नर तन वृथा । पर विषयन के साथ । पांच कुल्हाड़ी मारता ।  मूरख अपने हाथ ।
आंखि न देखे बावरा । शब्द सुने नहिं कान । सिर के केस उज्ज्वल भये  । अबहु निपट अजान ।
कबीर से ही उदाहरण बहुत से हो सकते हैं । पर वे सभी एक ही सन्देश देते हैं । साढे 12 लाख साल की 84 भोगने के बाद । जो ये दुर्लभ मानव शरीर मिला है । इसके रहते हरसंभव मोक्ष का उपाय कर लेना चाहिये । फ़िर कोई रास्ता ही न बचेगा ।
अब जैसा कि मैंने ऊपर कहा । हमें जो बात अच्छी लगती है । उसे ही गृहण कर लेते हैं । कबीर ने जात पाँत ऊँच नीच के लिये तत्कालीन स्थितियों अनुसार बात कही । पर उनके मुख्य उपदेश परमात्म प्राप्ति के लिये ही थे । जिनमें से बहुत थोङे का उदाहरण भी मैंने दिया । इसलिये आपकी बात को मैं एकदम विपरीत ढंग से कहता हूँ - कबीर को आत्मा - परमात्मा की बातों से अधिक और सामाजिक सरोकारों से बहुत कम मतलब था । वे उनकी निगाहों में तुलनात्मक मोक्ष लक्ष्य एकदन नगण्य और महत्वहीन ही थे । सिर्फ़ उसको ठीक ढंग से समझना भर होगा ।
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कबीर के जन्म जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में विस्तार से नेट पर और मेरे ब्लाग पर भी बहुत सी सामग्री उपलब्ध है । अतः उसको लिखने से कोई लाभ नहीं । इसके लिये हिन्दी में " कबीर " शब्द द्वारा गूगल में सर्च कर सकते हैं । 

31 मई 2011

तो आज बच्चा बच्चा ग्यानी होता ।

अगर मैं आपको आत्मा की आवाज और दिल का दर्द बताऊँ । तो वो वही है कि अधिक से अधिक जीवों को काल के पंजे से छुङाना । क्योंकि किसी भी सन्त का यही खास काम और कर्तव्य होता है । और इसका तरीका भी वही होता है कि जन्म जन्म से काल के पंजे में फ़ँसा और अग्यानता में उसी को अपना हितैषी मानता और पूजता जीव सिर्फ़ आत्मा और सतनाम की बात पर चौंकता है । उसे कुछ याद सा आता है । जो असली है । और उसका अपना है । यह सत्यपुरुष का प्रताप है कि उनके बारे में बात करते ही जीव को काल और माया की सारी चालाकी समझ में आ जाती है । और वह नींद में झिंझोङा गया सा उठकर बैठ जाता है ।
जब से मैंने ब्लाग शुरू किया । तबसे यहाँ भी तमाम लोग ऐसे हैं । बल्कि हजारों लोग ! और विश्व में करोङों लोग इस अनबूझ सृष्टि और प्रकृति तथा परमात्मा के बारे में जानने की जबर्दस्त इच्छा रखते हैं ।
पर जाने कैसी इच्छा है ? और कैसी तलाश है कि वे कहते हैं । हम अभी तक खोज रहे हैं ?
अभी एक पाठक  सुभाष जी ने लिखा कि - आप ( मैं ) स्वयँ सत्यकीखोज कर रहे हैं ? आप लोग क्या ब्लाग पढते हो ? हैरानी है । ध्यान..समाधि..नाम ( सार शब्द या परमात्मा का वास्तविक नाम ) और उसके बाद नाम से पार होने पर.. परमात्मा से साक्षात्कार ! बस यही शाश्वत सत्य है । जब परमात्मा को जान लिया । या वह मार्ग मिल गया । तो अब खोजना क्या रह गया ?
संभवतः ये बात ब्लाग के नाम " सत्यकीखोज " से सुभाष जी के जेहन में आयी हो । लेकिन भाई इसी सत्यकीखोज ( के आगे ) - आत्मग्यान लिखा हो । तो उसको पूरा अर्थ ही बदल जाता है । क्या आपको ब्लाग के किसी लेख से ऐसा लगा कि मैं सत्य खोज रहा हूँ ? या मेरे सामने कोई प्रश्न शेष है ? किन्ही कारणों से - रजत जी की भाषा में - कभी कभी बात की जलेबी अवश्य बना देता हूँ । सुबह सुबह गरम गरम मीठी मीठी जलेबी देखकर किसका खाने को मन नहीं करता ?

दूसरे ये मेरी या अन्य किसी की खोज नहीं है । बल्कि ये ग्यान आदिकाल से ही प्रकट है । और सुरक्षित है ।
खैर..जैसा कि पिछले दिनों आये ई मेल के विषयों के निचोङ में मैं यह बात लिख रहा हूँ । अगर आप सत्य को पूरी तरह जानना चाहते हो । बल्कि अनुभूत.. महसूस करना चाहते हो । आप समाज में । देश में । विश्व में - एक नयी क्रान्ति - नया बदलाव लाना चाहते हो । और आप खुद को पूर्ण ओजस्वी शक्तिमान होने की चाहत रखते हो । तो इसकी कीमत है सिर्फ़ 800 रुपये । 800 रुपये । 800 रुपये ( 1000 भी हो सकती है । ) अब इतना सस्ता तो अच्छा मोबायल भी नहीं आता ।
ये तीन किताबें - 1 अनुराग सागर 2 बीजक ( कबीर )  3 बाबन अक्षरी ।
अनुराग सागर - के बारे में पहले ही लिख चुका हूँ कि काल और उसकी पत्नी माया और उसके तीनों पुत्र बृह्मा विष्णु महेश किस तरह जीवों को सत्यग्यान से वंचित कर स्वर्ग नरक में उलझाये हुये हैं । दुनियाँ में फ़ैली ऊल जूलूल धार्मिक मान्यताओं के पीछे क्या रहस्य है ? लोग कैसे भक्षक काल को रक्षक समझ कर पूज रहे हैं । उस पर विश्वास कर रहे हैं । और उसका आहार बन रहे हैं आदि । और भी ढेरों प्रश्नों की चौंकाने वाली जानकारी इस पुस्तक से प्राप्त होती है । आपके बहुत से सवाल हमेशा के लिये समाप्त हो जाते हैं । दिमाग में भरा धार्मिक कचरा साफ़ हो जाता है ।
बीजक - पढ के तो आप मुझे ही फ़ोन करके कहोगे । अच्छा राजीव बाबा ! अब बहुत ग्यान बाँट लिये हो । अब आप पूछो । हम बतायी । यहाँ से नकल मार मार के ग्यान का रुतबा दिखाते थे ।
..कहने का मतलब बीजक में आपको सब कुछ मिल जाता है । ये देवी देवताओं का क्या चक्कर है ? कौन सी महाशक्ति क्या है ? उसकी स्थिति क्या है ? बृह्माण्ड आदि की स्थितियाँ । और जीव.. जीवन के आंतरिक पहलू । जीवन में भी । और मृत्यु के बाद भी । रहस्य के दायरे में आने वाली कोई भी बात शायद ही बचे । जो आपको जानना शेष रह जाय ।

बाबन अक्षरी - बहुत कम लोग जानते हैं कि विश्व विजेता सिकन्दर कबीर का शिष्य था । अपने पहले मुस्लिम धार्मिक गुरु द्वारा मुस्लिम समुदाय के कानून की धमकी देने पर सिकन्दर ने 52 बार कबीर को मौत की सजा दी । सजा तो बेचारा क्या देता ? 52 बार मौत के मुँह में धकेलने के समान परीक्षणों से गुजारा ।
पर कबीर का एक बाल भी नहीं टेङा हुआ । इस किताब की सबसे बङी खासियत यह है कि आज से 500 साल पहले कबीर ने पूरे विश्व में किस तरह न सिर्फ़ सतनाम का डंका बजा दिया । बल्कि हिन्दू मुस्लिम ( को तो छोङिये ) सिख ईसाई आदि तमाम जातिगत भेदभाव.. धार्मिक भेदभाव ही मिटा दिया । सारी दुनियाँ ही कबीर के पीछे पीछे चलने लगी । मेरा मुसलमान भाईयों से अनुरोध है । ये पुस्तक अवश्य पढें ।
*** मेरे अनुभव में आया है । टीकाकारों को आंतरिक ग्यान न होने के कारण वे कबीर की कही असल बात को उतना तो नहीं समझा पाये । पर किताब में कबीर के मूल दोहों और मेरे ब्लागों को पढने के बाद आप असल बात को काफ़ी हद तक समझ सकते हैं । अब रही बात । प्रयोगात्मक अनुभवों के लिये । जब कोई ना मिले । फ़िर मैं तो हूँ ही ।
*** मुझे बङा अफ़सोस है कि तमाम प्रकाशक । धार्मिक संस्थायें । किताब पढने के शौकीन । शिक्षक । हमारे बुजुर्गों आदि ने यदि इन तीन किताबों के बारे में ही जागरूकता बनाये रखी होती । इनका सही प्रचार किया होता । तो दुनियाँ का दृश्य ही बदला होता । तो आज बच्चा बच्चा ग्यानी होता ।
अब ज्यादा क्या लिखूँ । इस लेख को पढकर यदि हजार लोग भी इन किताबों को खरीदकर पढ लेते हैं । और लोगों को वह ग्यान बताते हैं । तो पूरा भारत ही बदल जायेगा । धर्मगुरु बन जायेगा । केवल एक लाख लोग पूरे विश्व को सिर्फ़ 5 साल में बदल देंगे । और अनुमानित कीमत वही 800 रुपये ।
विशेष - इन किताबों को पढने से सिर्फ़ मौखिक जानकारी या बौद्धिक विकास ही नहीं होता । बल्कि प्रयोगात्मक स्तर पर कुछ कुछ आत्मिक अनुभूतियाँ भी स्वतः शुरू हो जाती हैं ।
अन्त में - हाँ तो भाईयो ! आपकी बस अब जाने ही वाली है । जिस भाई को भी चाहिये । अपनी सीट से आवाज दें । एक के साथ.. एक नहीं.. बल्कि दो फ़्री हैं । सिर्फ़ 800 रुपये में तीन ।
- वैसे ये मत सोच लेना कि मैं अपने प्रकाशन की सेल बङा रहा हूँ । बाबा रामदेव की तरह मेरा कोई प्रकाशन नहीं हैं । न मैंने इनमें से किसी किताब की टीका लिखी है । जो मुझे आर्थिक फ़ायदा होगा ।
*** कल एक गुमनाम भाई जो मेरे सहयोगी हैं - का 10 तस्वीर अटैच्ड ई मेल आया । जो मेरे लेखों के विषय अनुसार तस्वीरें भेजा करेंगे । वाकई उन्होंने कमाल की तस्वीरें भेजी । जो मैंने अनुराग सागर के लेखों में जोङ भी दीं । उनको बेहद धन्यवाद ।
- अभी कई ई मेल के जबाब भी देने हैं । पर लाइट और गर्मी का व्यवधान है । प्रेत कहानी की भी यही दिक्कत है ।
- आप सभी लोग हिन्दी टायप में उस्ताद हो गये हो । यदि कोई सहयोग करना चाहे । तो ऊपर लिखी तीन किताबों तथा ऐसी ही अन्य किताबों का मैटर दो दो तीन पेज का एक बार में भेजो । उसे संशोधित करके लेख रूप में प्रकाशित मैं कर दूँगा । नव जागरण में आप सभी का सहयोग भी आवश्यक है ।

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326