07 जुलाई 2012

God Particle का रहस्य

राजीव जी ! कोई महाराज जी के वचनों का वीडियो upload करें plz...और आजकल tv में God Particle ( अंश ) विषय का बहुत प्रचार हो रहा है । क्या ये आध्यात्म से जुङा कोई रहस्य है ?
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मुझे सर्दियाँ इतनी खुशगवार नहीं लगती । जितना बरसात का मौसम । बरखा की रिमझिम रिमझिम का आनन्द ही अलग है । बस एक ही कमी खलती है । किसी सच्ची खूबसूरत प्रेमिका की । आपको एक साधु के मुँह से खास आत्म ज्ञान से जुङे साधु के मुँह से ये बात बहुत ही अजीब लग सकती है । पर वास्तव में ये कतई अजीव नहीं हैं । आपने साधु और बृह्मचर्यता के जो मनगढन्त मायने तय कर दिये हैं । हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं है । राम सीता के बिना अधूरे हैं । कृष्ण राधा के बिना । पुरुष स्त्री के बिना अधूरा है । और चेतन प्रकृति के बिना अपूर्ण है । ( हालांकि - चेतन प्रकृति के बिना अपूर्ण है । यह बात दूसरे भाव में कुछ गलत हो जाती है । क्योंकि चेतन अपने आप में पूर्ण है । और प्रकृति उससे ही प्रकट हुयी है । लेकिन जब ( पहली बार ) से यह सृष्टि खेल शुरू हुआ है । तभी  से यह सारा

खेल प्रकृति में ही हो रहा है । इसलिये किसी हद तक ऐसा कहा जा सकता है )
सोचिये । ऐसे ही बारिश की बूँदें पङ रही हों । आप अकेले हों । प्रकृति पूर्ण रोमानियत से मचल रही हो । तब आपको किस बात की इच्छा होगी । निसंदेह । गर्मागर्म पकौङे । चाय । एक खूबसूरत प्रेमिका या पत्नी । और पूरी बेतकल्लुफ़ी के हसीन पल । यही है - चेतन और प्रकृति का खेल । और ध्यान रहे । ये सिर्फ़ कामवासना हरगिज नहीं है । बल्कि एक उच्च धरातल पर तो ये वासना भी नहीं है । आप गहराई से सोचें । तो इससे बङी चाहत और कोई हो ही नहीं सकती । धन । शक्ति । सत्ता की चाहत के मूल में भी यही मुख्य भावना निहित होती है । हालांकि मुझे इस सबका नितांत अभाव अभी भी नहीं है । पर

अपनत्व । जो दिल से अपना लगे । जिसे सिर्फ़ निहारने से ही अच्छा लगता हो । इसका अभी तो अभाव है । लेकिन ये सब अब मुझसे सिर्फ़ 38 साल दूर और है । जब मेरी अंतिम वासना देह का अंतिम संस्कार हो जायेगा । इस अंतिम संस्कार का मतलव है । इसके बाद संस्कार शरीर से हमेशा के लिये छुटकारा । और स्व इच्छा शरीर का अधिकार मिल जाना । और तभी ये पता चलेगा कि - वो कौन होगी । जो मेरे भाग्य में होगी । या मैं जिसके भाग्य में होऊँगा ? बीच में कुछ संयोग बनते हैं । पर परमात्म सत्ता का खेल इतना विलक्षण होता है कि उसके रहस्य सहज नहीं जाने जा सकते । हाँ एक बात निश्चित है । ऐसा संयोग किसी महा तपस्विनी को ही प्राप्त होगा । क्योंकि सचखण्ड और ऊपर के 


लोकों या मेरे निजी लोक में रहने का अधिकार सामान्य युवती को किसी कीमत पर नहीं मिल सकता । ये सभी विवरण मैं अपने साधक साधिकाओं के मार्गदर्शन हेतु अधिक लिखता हूँ । ताकि उन्हें स्पष्ट हो सके । जो भक्ति वह कर रहे हैं । उसका फ़ल क्या होता है ?
महाराज जी के वचनों का वीडियो - http://www.youtube.com/watch?v=ZyDUVcl44hQ ऐसी माँग आप लोग पहले से ही करते रहे हैं । पर मैंने हर बार कहा है । श्री महाराज जी एक प्रचलित आम परम्परा की तरह प्रवचन नहीं करते । बल्कि श्र्द्धालु की पात्रता के अनुसार उसकी जिज्ञासाओं का ( उसी स्तर पर ) समाधान करके उसे क्रियात्मक रूप से आत्म प्रकाश से जोङ देते हैं । वास्तव में हमारे यहाँ बातें 


कम काम अधिक वाला सिद्धांत है । वास्तविक रूप में उद्धार करना । न कि सिर्फ़ उद्धार कैसे होता है ? ये किताबी शिक्षा देना ।
लेकिन ऐसा भी नहीं कि प्रवचन नहीं होता । महाराज जी के साथ अपने अब तक के सानिद्ध्य के मैं अपने अनुभव के आधार पर जानता हूँ कि महाराज जी शाम 8 बजे के बाद 11 बजे तक यदि ज्ञान गृहण करने वाले शिष्य या जिज्ञासु हों । तो न सिर्फ़ गूढ रहस्यों पर प्रवचन करते हैं । बल्कि ( दीक्षित होने पर ) उसी काल खण्ड में पहुँचा देते हैं । जब मुझे ऐसे अनुभव  हो रहे थे । उस बक्त ब्लाग नहीं बना था । और न ही ऐसी कोई बात सोची थी । अतः वो सभी अनुभव सिर्फ़ ह्रदय में संजोये गये । किसी कृतिम स्मृति माध्यम में नहीं । दूसरे एक समस्या ये भी थी

। गू्ढ रहस्यों के प्रति उच्च स्तरीय जिज्ञासायें सिर्फ़ मेरे ही अन्दर थीं ।  और मैं एक साथ उसकी ( किसी भी माध्यम से ) रिकार्डिंग और प्रश्न  ( करना  ) और उत्तर ( सुनना ) और गृहण ( भी करना ) ये 4 कार्य नहीं कर सकता था । लेकिन अब ये समस्या लगभग खत्म हो गयी है । आने वाले कुछ ही समय में आपको आडियो वीडियो और text के माध्यम से श्री महाराज जी के वाणी से गूढ से गूढ रहस्य जानने को मिलेंगे । इसमें हमारे दूरस्थ शिष्यों और जिज्ञासुओं को भी उनके प्रश्नों के उत्तर जानने को मिलेंगे । 

tv में God Particle विषय का बहुत प्रचार - क्योंकि मैं TV कतई नहीं देखता । इसलिये मैं इस प्रश्न का ठीक आशय ही नहीं समझ पाया । मैंने समझा । आजकल जो ढोंगी लोग यंत्र तंत्र गुटिका लाल किताब नीली पीली किताब शनि महाराज फ़लाने महाराज ढिकाने महाराज आदि जो ऊटपटांग बकते रहते हैं । ये प्रश्न इसी से संबन्धित है । क्योंकि यंत्र आदि शक्तियां भी यदि वैदिक तरीके से सच्चे ज्ञानी द्वारा तैयार हों । तो उन्हें भी एक भाव में God Particle कहा जा सकता है । फ़िर भी संशय होने से मैंने अशोक को फ़ोन किया । तब अशोक ने बताया कि प्रश्न का आशय महामशीन के प्रयोग परीक्षण से है ।

जहाँ बिज्ञान का अन्त होता है । वहाँ ज्ञान की शुरूआत होती है । मैंने कई बार बैज्ञानिकों को चैलेंज भी किया है । सुझाव भी दिये हैं । इस महा मशीन के विस्फ़ोट द्वारा द्वारा जो प्रकाश किरण उत्पन्न हुयी ।  वो कोई अजूबा नहीं । और उससे कभी कोई ईश्वरीय रहस्य नहीं जाना जा सकता । पहली बात तो ये है कि इस मामूली तिनके को ही वे कभी पकङ नहीं पायेंगे । ये तो बस तिनका भर है । जहाँ से अदृश्य की शुरूआत होती है । मैंने अभी पिछले दिनों में ही एक लेख में लिखा था । चिलचिलाती धूप में एक पतली छोटी सुंडी के बराबर कुछ कुछ शुक्राणु आकार के चेतन अणु निराधार क्षेत्रफ़ल के अनुसार पूरे स्पेस में  लाखों की संख्या में लगातार हिलते हुये कंपन करते रहते हैं । इन्हें ही पकङ कर दिखाओ । वहाँ जमीन के नीचे मशीन कम्प्यूटर वगैरह की कोई जरूरत ही नहीं ।


मैंने ये भी कहा । कूछ देर एकान्त में विचार शून्यता की स्थिति में हमें आँख के ठीक सीध में एक छोटे छोटे वृतों का बना कंकाल टायप ( हर बार अलग आकृति ) खुली आँखों से दिखता है । इसी का चित्र खींच कर दिखा दो ।
इससे काफ़ी समय पहले बैज्ञानिको ने आत्मा के रहस्य जानने को मरणासन्न व्यक्ति जानवरों को शीशे के एयर प्रूफ़ बाक्स में बन्द कर दिया । जीव के मरते ही शीशा चटक गया । पर क्या निकला । कहाँ से निकला । आज तक पता नहीं लगा ।
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यहाँ तक लिखने के बाद 8 july 2012 को sunday था । मैंने सोचा । TV देखना चाहिये । क्या चर्चा चल रही है । लेकिन तभी ( केबल की ) बिजली चली गयी । मैंने ( दैनिक 


जागरण ) अखबार उठाया । तो 8 july 2012 के इसी अखबार में मुद्दा शीर्षक से पूरे पृष्ठ ( 13 ) पर ही इसी विषय पर विभिन्न विद्वानों के विचार प्रकाशित हुये थे । 
सनातन मान्यता को मिला बैज्ञानिक आधार ( प्रो यशपाल ) कण बनाम बृह्म । अभी  भी उस 1 की खोज बाकी है । समानता के बाद  भी अलग अस्तित्व । बृह्माण्ड सृजन का धार्मिक फ़लसफ़ा । अब और आसान  होगी जिन्दगी जैसे शीर्षकों से विचार छपे थे । लेकिन मुझे हैरानी हुयी । खुद को योग ऋषि घोषित करने वाले बाबा रामदेव । शान्तिकुंज के प्रणव पंडया । भारत माता मन्दिर के स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि के  विचार इतने उथले और थोथे टायप के थे कि सिर्फ़ हँसी ही आ सकती है । जैसे ये लोग इस प्रकाश कण को बैज्ञानिक मान्यता मिलने से फ़ूले न समा रहे हो । धिक्कार है - मेरे मुँह से निकला । क्या है बैज्ञानिक मान्यता ? और क्या है इसकी औकात ? एक मामूली नीम हल्दी जैसी चीजों को ( मनुष्य ) 


बैज्ञानिक मान्यता मिले । तभी आप विश्वास करोगे । आयुर्वेद बिज्ञान नहीं है क्या ? कोई कहानियों की किताब है । वेद उपनिषद बिज्ञान नहीं है ? ये सब कितने प्राचीन हैं । और निर्विवाद सिद्ध हैं । मैं कहता हूँ । सिर्फ़  हांडी के 1 पके चावल के सिद्धांत के आधार पर आप ( किसी 1 सूत्र सिद्ध होने पर ) फ़िर सबको सत्य मानकर उसी आधार पर खोज करते । तो बहुत कुछ हासिल कर लेते । क्योंकि सिद्ध थ्योरी मौजूद है । सबसे पहले यह लोग धर्म योग आध्यात्म को बिज्ञान नहीं समझते । इसी से इनका स्तर पता चल जाता है । कहना ये चाहिये । इस सूक्ष्म बिज्ञान से ही ये स्थूल बिज्ञान कुछ बच्चों जैसी चीजें सिद्ध कर लेता है । उस पर ये लोग प्रफ़ुल्लित हो उठते हैं । सामान्य मनुष्य की ऐसी सोच होने पर अङचन नहीं होती । पर खुद को महान और बङी विभूतियों से घोषित करने वाले  ऐसा कहें । तव चिन्ता का विषय है । क्योंकि आम आदमी में ( आध्यात्म स्तर पर ) गलत सन्देश जाता है । ऐसे समर्थन से उसका बहुत बङे स्तर पर नुकसान होता है । इनसे अच्छी जानकारी तो हमारे लगभग अशिक्षित बुजुर्गों को थी ।
खैर..फ़िर मैंने अमित को फ़ोन किया । तो उन्होंने नेट से God Particle विषय पर प्रकाशित 8 अलग अलग pdf पेज भेजे । पर उनमें कहीं कोई खास बात नहीं थी । बस बङे प्रयोग का बङा हल्ला था ।
इस तुच्छ चेतन कण या प्रकाश अंश को बैज्ञानिक मशीनों से उत्पन्न ( प्रकट ) करने से कोई बहुत अजूबा नहीं हो गया । पत्थर लोहे लकङी नायलोन आदि की चोट घर्षण से ऐसे ऊर्जा कण बच्चे खेलते खेलते पैदा 


करते रहते हैं । और बैज्ञानिक इसका सिद्धांत भी जान गये कि घर्षण से ऊर्जा उत्पन्न होती है । उसके कुछ कारण भी जान गये कि इनमे मौजूद ये घटक ? क्रियाशील ( होते हैं ) या रासायनिक क्रिया करते हैं । और तब ऐसा होता है । पर ऐसा क्यों होता है ? उसकी कुछ और बारीकियाँ जान गये । तो अब ऐसा क्यों होता है । लेकिन उसके ऊपर भी एक क्यों है । फ़िर उस क्यों के ऊपर भी क्यों है । फ़िर सबसे ऊपर भी क्यों बचता है । वो कैसे पता चले । क्योंकि सबसे ऊपर जो क्यों है । वो क्यों नहीं है । वो - है । है है है ।
मेरे कहने का मतलब । ये ( चेतन ) इंसानी मन बुद्धि से परे की चीज है । इसको सिर्फ़ योग द्वारा जाना जा सकता है । पर ( मनुष्य या बैज्ञानिक स्तर पर ) पकङा कभी नहीं जा सकता । क्योंकि चेतन पूर्णतया निर्लेप है । निर्विकारी तत्व है । जैसे कमल पर लाख कोशिश कर लो । वह कभी कीचङ से मिलाप नहीं करेगा । इसलिये चेतन से मिलाप या योग और उसका उपयोग सिर्फ़ आध्यात्म बिज्ञान द्वारा योग से ही संभव है । इसके लिये जिस प्रयोग यंत्र की मुख्य आवश्यकता है । वह है सिर्फ़ - मनुष्य शरीर । बाकी अन्य यंत्रों द्वारा इसमें कोई भी कैसी भी प्रविष्ट असंभव है । मैं एकदम सच कह रहा हूँ । 


इससे लाखों गुना अधिक चेतन प्रकाश पहली बार में ही और वो भी देर तक वो भी बिना किसी बाह्य यंत्र के बिना किसी कोशिश के 3 july 2012 को 10 साल की बच्ची प्रेरणा ने हँस दीक्षा के समय आराम से देखा । और कहा - मुझे कुछ नहीं दिखा । तब सोचिये । हमारे समझदार और कुछ ही पुराने छात्र क्या क्या कैसे कैसे अनुभव करते होंगे ?
ऐसे योग रहस्य मनुष्य शरीर के रोम रोम में हैं । अभी मैंने हिन्दी वर्णमाला के ठोस और दीर्घ स्वर में गम्भीर भाव से उच्चारण करने का बेहद सरल मामूली योग तरीका बताया । सिर्फ़ ये ही बाबा रामदेव के पूरे योग को फ़ेल कर देगा । और आपको हरिद्वार लंदन कहीं जाने की जरूरत नहीं । कोई खतरा भी नहीं ।
सिर्फ़ इसी से आपके - सौन्दर्य । शारीरिक सौष्ठव । बल । चरित्र निर्माण । ऊर्जा । रोग नाश होना । ग्रह नक्षत्र बाधायें दूर होना आदि सर्वागीण विकास होगा । इतने लाभ कि बहुत विस्तार से वर्णन करना होगा । 
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