15 जुलाई 2012

उस स्त्री के अनेकों लिंग योनियाँ हैं


सदगुरु महाराज की जय ! सर्वप्रथम तो क्षमा चाहूँगा कि कबीर बीजक की रमैनियों को लिखित रूप देने का दिया गया कार्य बहुत विलम्ब से शुरू कर पा रहा हूँ । दूसरी ओर आपके पावन प्रवचनों के अनुसार शायद यही नियति थी । परन्तु अपनी ओर से नियति को दोष देना भी अनुचित ही होगा । आपकी आप ही जानो । महाराज मुझे बस यही समझ आता है कि - देरी के लिए क्षमा कीजियेगा । कारण जो भी रहा हो ।
रमैनी - 1
अंतर जोति सब्द इक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ।
ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेऊ न जाने आदिऊ अन्ता ।
वाखरी एक विधाते कीन्हा । चोदह ठहर पाठ सो लीन्हा ।
हरी हर ब्रह्मा महंतो नाऊँ । तिन पुनि तीन बसावल गाऊं ।
निन्ह पुनि रचल खंड ब्रह्मंडा । छव दरसन छानबे पाखंडा ।
पेटहि काहू न वेद पढाया । सुनति करे तुरक नहीं आया ।
नारी मोचित गर्भ प्रसूति । स्वांग धरे बहूते करतूती ।
तहिया हम तुम एके लोहूँ । एके प्रान वियापे मोहूँ ।
एके जनी जना संसारा । कौन ज्ञान ते भयऊ निनारा ।
भव बालक भग द्वारे आया । भग भोगी के पुरख कहाया ।
अविगति की गति काहू न जानी । एक जीभ कित कहों बखानी ।
जो मुख होय जीभ दस लाखा । तो कोई आय महन्तों भाखा ।
कहे कबीर पुकारि के ।  इ लेऊ व्यवहार । राम नाम जाने बिना । बूडी मुवा संसार ।
--ooo--
अंतर ( अन्दर ) जोति ( प्रकाश ) सब्द ( शब्द ध्वनि ) इक नारी ( सुरति ) । हरि ( विष्णु या सत गुण ) ब्रह्मा ( बृह्मा या रज गुण ) ताके त्रिपुरारी ( शंकर या तम गुण ) । ते ( उस ) तिरिये ( स्त्री ) भग ( योनि या औरत ) लिंग ( शिश्न या पुरुष ) अनंता ( अनगिनत ) । तेऊ ( वो भी ) न जाने आदिऊ ( शुरूआत ) अन्ता ( अन्त ) । वाखरी ( सृष्टि ) एक विधाते ( सृष्टि कर्ता ) कीन्हा । चोदह ( 14 भुवन - तल । अतल । तलातल  आदि ) ठहर पाठ सो लीन्हा । तिन पुनि तीन बसावल गाऊं ( इन तीनों से 3 गुण ) । छव दरसन ( 6 दर्शन ) छानबे पाखंडा ( 96 शास्त्र आदि ) नारी ( प्रकृति ) मोचित गर्भ ( इच्छा ) प्रसूति ( जीव ) । एके जनी जना संसारा ( उसी प्रकृति में सुरति द्वारा सारा सृष्टि खेल )  भव बालक ( जीवात्मा और सृष्टि की अनगिनत उपाधियाँ ) भग द्वारे ( सृष्टि साकार ) आया । भग भोगी के पुरख कहाया ।
अर्थ  - चेतना की अति सूक्ष्म आंतरिकता से इस दृश्य जगत की स्थूलता तक आते आते एक ही चीज के अनेक रूप स्थितियाँ और भाव हो जाते हैं । इसलिये अल्पज्ञ श्रेणी में आने वाले मनुष्य और परमात्म ज्ञान की गूढता नियम अनुसार इस अति गहन सूक्ष्म और गोपनीय ज्ञान को सरलता से समझाने हेतु प्रतीकों के माध्यम से अधिक कहा गया है । जैसे - काल पुरुष । अष्टांगी या आदि शक्ति । बृह्मा । विष्णु । महेश आदि । पर वास्तविक स्थिति में ये आत्मा > मन ( या विचार  ) > इच्छा ( वासना रूप ) रूप स्वपन वत सृष्टि ही है । जो वास्तव में ज्ञान स्थिति में है ही नहीं । सिर्फ़ भृम मात्र है । इसलिये हमारे मुख्य उद्देश्य सुरति शब्द ज्ञान की मूल स्थित के अनुसार ही अर्थ जानते हैं ।  
- मैं कौन हूँ ? who am i या खुद को जानने हेतु आपको किसी सच्चे आत्मज्ञानी सन्त की शरण में जाकर सुरति शब्द योग विधि द्वारा - अन्दर जाना होगा । अन्दर प्रकाश है । शब्द ध्वनि है । और सुरति है । 3 गुणों का खेल है । इसी प्रकाश । शब्द ध्वनि । और 3 गुणों से अनन्त नर ( लिंग ) मादा ( भग ) रूपी जीव सृष्टि का निर्माण हुआ है । लेकिन वे भी इसकी शुरूआत और अन्त नहीं जानते । सृष्टि कर्ता ने सृष्टि बनायी । और 14 भुवन का ठहराव या आधार दिया । बृह्मा विष्णु महेश नाम ( पद या उपाधि ) के 3 अधिकारी नियुक्त किये गये । जिन्होंने 3 गुण सत रज तम का निर्माण किया । फ़िर उन्होंने अनेक खण्ड बृह्माण्डों की रचना की । सृष्टि का कानून ( या बिज्ञान ) तय करते हुये 6 दर्शन और 96 शास्त्र आदि का सृजन किया । इन्हीं से सभी जाति धर्म आदि का चलन हुआ । जन्म से ही ब्राह्मण ( जाति ) कोई नहीं हुआ । और कोई मुसलमान पैदायशी सुन्नत ( खतना ) हुआ नहीं होता । ये सभी पाखण्ड बनाये हुये हैं । जीव या मनुष्य के रूप में सभी समान हैं । और उसी प्रकाश और अक्षर ( ज्योति ) और सुरति ( अंतःकरण ) से बने हैं । जीव की इसी इच्छा से सुरति के द्वारा अनेकों प्रकार के खेल सृष्टि में हो रहे हैं । पर वही तत्व । खून । प्राण आदि की समानता सभी में समान रूप से है । उसी 1 से ये समस्त संसार हुआ है । और इस ज्ञान ( या बिज्ञान ) से कोई अलग नहीं है । वही एक आत्म चेतना अनगिनत उपाधियों में रमण करती हुयी भोग ( खेल ) रही है । पर ये विलक्षण खेल कोई नहीं जान पाता । इसका 1 जीभ ( मुख ) से कितना वर्णन किया जाये । अगर मुँह के अन्दर 10-20 लाख जीभ होती । तब कोई ज्ञानी पुरुष भले ही  इसका वर्णन कर पाता । कबीर कहते हैं । यही लोक व्यवहार ( गति स्थिति ) है । इसमें राम नाम ( अंतर शब्द ) जाने बिना संसार ( जीवात्मायें ) डूब मरता है ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email