05 जुलाई 2012

सहज योग की प्रेरणा है - प्रेरणा

यधपि हमारे यहाँ कई छोटे बच्चों की हँस दीक्षा हुयी है । और बहुत संभव है । किसी गर्भवती महिला की भी दीक्षा हुयी हो । तब ऐसे बच्चे मेरे अनुभव से बहुत भाग्यशाली होते हैं । जबकि सतनाम से उनका अधिकारिक तौर पर ( जन्म से पूर्व ही ) परिचय हुआ हो । और वो परमात्म सत्ता के नियमानुसार मोक्ष ज्ञान के अधिकारी ( पात्र ) बन गये हों । बच्चे । जिनको अभी ठीक से ये समझ भी नहीं है कि - जिस दुर्लभ ज्ञान की तलाश में जीव युगों युगों से भटक रहा है । देवता भी जिसकी अति लालसा करते हैं । वह उन्हें सहज मिल गया । इस बात को ठीक से समझने हेतु आप बच्चों को सांसारिक दृष्टिकोण से न देखें । आत्मा ( आत्मज्ञान ) में कोई बच्चा बूढा युवा आदि नहीं होता । वह अजर अमर शाश्वत सनातन और अविनाशी ( लेकिन तभी जब अपनी पहचान या सार ज्ञान से विधि पूर्वक जुङ गयी हो ) है । कहने का अर्थ एक अबोध बालक भी इस आत्मज्ञान से जुङने के बाद महा धुरंधरों को परास्त कर देता है । इसके प्रमाण हेतु सन्त ज्ञानेश्वर । अष्ट्रावक्र । तोता से ( बाद में ) रूपांतरित हुये शुकदेव मुनि । अभिमन्यु आदि बहुत से इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण हैं । अतः जैसे ही किसी भी जीव को इस सनातन ज्ञान से जोङा जाता है । फ़िर वह किसी आयु का हो । कृमशः ज्ञान को प्राप्त होता हुआ आत्म स्वरूप होने लगता है । आज दिल्ली की लगभग 11 साल 


की बच्ची प्रेरणा के माध्यम से आपको प्रेरणा देते हुये बात करते हैं कि - मनुष्य ज्ञान को लेकर कैसी कैसी गलतफ़हमियों का शिकार हो जाता है ।
- 4 july 2012 गुरु पूर्णिमा महोत्सव में शामिल होकर कुछ शिष्य मेरे यहाँ आये हैं । उन्ही में प्रेरणा भी है । हँसमुख स्वभाव । स्मायली फ़ेस । भोला । सरल सहज बालमन । प्रेरणा की हँस दीक्षा हुयी । उससे पूछा - तुम्हें क्या दिखा ? कुछ नहीं । उसने कहा । बाद में कमरे से बाहर आकर उसने कहा - खूब तेज चमकीला सफ़ेद प्रकाश । कुछ नहीं से उसका मतलब था । कोई दृश्य आदि । या कोई भी पशु पक्षी वगैरह जो चीजें अक्सर संसार में देखने को मिलती हैं । और चमकीले दिव्य प्रकाश का उसके लिये कोई मतलब न था ।
यही है - असली दीक्षा का होना । भोला । सरल सहज बालमन ।

अब बात को ठीक से समझने की कोशिश करें । दीक्षा क्या है ? क्यों है ? उसे कुछ मालूम नहीं । क्या दिखेगा ? कब दिखेगा ? उसने न सोचा । और न सोचेगी । और न सोचने की जरूरत भी है । दिमाग बिलकुल एक कोरे कागज की तरह । और उस पर सतनाम ज्ञान लिख गया ।
- अब ये कितना भी धीरे धीरे भजन अभ्यास करेगी । मैंने सब लोगों से कहा - तो भी एक समझदार आयु तक पहुँचते पहुँचते एक परिपक्व साधक और अच्छी भक्त बन जायेगी । परिवार के धार्मिक संस्कार । माहौल । और सबसे बढकर किसी अभेद कवच की भांति रक्षक ये सर्वशक्तिमान नाम ( नाम परम लघु जासु बस विधि हर हरि सुर सर्व । मदमत्त गजराज को अंकुश कर ले खर्ब ) ये सब मिलकर इसे ( अभी से ) ये जीवन और आगे ( जन्म में ) भी वो श्रेष्ठ आनन्दमय जीवन देंगे । जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । बस जो कुछ थोङी परेशानियाँ कहीं जा सकती हैं । वो इस जीवन के लिये लिखे कर्म फ़ल और संस्कारों की ही होंगी । सरल भाषा में कहें । तो बहुत थोङा कर्जा । जिसको निबटाना है । और भरपूर धन ।
इसने कोई सतसंग भी ( उस तरह गम्भीरता से ) नहीं सुना । जो इसे पता हो कि - ये कुण्डलिनी ज्ञान है । ये चक्र हैं । ये सहज योग है । ये सब धार्मिक कचरा इसके दिमाग में नही है । एकदम खाली शुद्ध पवित्र दिमाग । विभिन्न वासनाओं कामवासना की विचार तरंगों से लगभग रहित तन मन । जो कि बङी आयु के साधकों के लिये अधिकांश ही बहुत बाधक होता है ।


प्रेरणा गोलू के साथ हमारे नये डोगी जूली के साथ खेल रही है । खिलखिला कर हँस रही है । एक निश्छल पवित्र मासूम बाल मुस्कान मैं बार बार उसके चेहरे पर देखता हूँ । मुझे सन्त मत के कुछ दृष्टांत याद आते हैं । ओशो कहते हैं - सही अर्थों में सबसे अधिक धार्मिक आदि मानव था । क्योंकि तब उसके दिमाग में जाति पांत देश धर्म मेरा तेरा ज्ञान अज्ञान गोरा काला आदि बदबूदार विचारों का सङांध मारता हुआ कचरा बिलकुल नहीं था । वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई भारतीय अमेरिकन चीनी आदि कुछ नहीं था । वह एक मानव था । सिर्फ़ एक मनुष्य । और आज यही ( मनुष्य ) फ़िर से होने के लिये बहुत कोशिश करनी होती है ।
एक दूसरे उदाहरण में ज्ञान हेतु आये 2 शिष्यों से गुरु वेद शास्त्र आदि पढे हुये शिष्य से अनपढ शिष्य की तुलना में दोगुनी फ़ीस मांगता है । विद्वान शिष्य के आश्चर्य प्रकट करने पर कहता है - तेरे ऊपर दुगनी मेहनत करनी होगी । तेरा लिखा पढा कचरा साफ़ करना होगा ।
एक और उदाहरण में एक आदमी के उपदेश लेने की बार बार जिद करने पर सन्त लोटे में गोबर डालकर  उसी में 


दूध भर देने को कहते हैं । आदमी आश्चर्य करता है । गोबर भरे लोटे में दूध डालने से दूध बेकार हो जायेगा । तब सन्त कहते हैं - उसी तरह तेरे दिमाग में जो गोबर भरा है । जब तक वह खाली नहीं होता । ये अनमोल ज्ञान भी बेकार हो जायेगा ।
इसीलिये मुझे प्रेरणा को देखकर एक सुखद अनुभूति सी होती है । कोई कचरा नहीं । कोई जिज्ञासा भी नहीं । और जान युक्त ( प्रवेश स्थिति ) हो जाना । ऐसी स्थिति में क्या होता है ? ये पिता द्वारा प्रेरित किये जाने पर थोङा थोङा भजन अभ्यास करेगी । और अति सरलता से योग अभ्यास में निपुण हो जायेगी । ध्यान के लिये बैठते समय ये कुछ नहीं सोचेगी । मुझे ये दिखेगा । या वो दिखेगा । बस एक खेल समझ कर बैठेगी । जैसे बुद्ध ने कहा है - हंसिवा खेलिबा धरिवा ध्यानम । जो अनुभव होगा । उसे भी कोई जादू कोई खेल समझकर बाल सुलभ उत्सुकता से ही देखेगी । आगे वैसे ही बाल मन युक्त लालच से योग करेगी । और बाल बुद्धि होने से बङी आयु के लालच की तरह कुटिलता चालाकी इसके भाव में नहीं होगी । यही सहज योग की खास जरूरत है । गहरायी से समझें । तो एक बच्चा उस क्रिया को बङों की अपेक्षा तेजी से सीखता है । जिसमें उसकी रुचि हो । आनन्द आता हो । अब क्योंकि ये शाश्वत ज्ञान ( बङे बङों की ) तमाम गैर जरूरी वासना कामवासना बाधाओं को नष्ट कर देता है । और पूर्णता की ओर ले जाता है । तब सहज सोचा जा 


सकता है । बाल मन में ये अतिरिक्त गैर जरूरी भावनाओं को पहले से ही पनपने नहीं देगा । और जीवन को सहज ही सुख समृद्ध करेगा । अभी ( इसी जन्म के )  एक श्रेष्ठ जीवन का निर्माण करेगा । और आगे ( जन्मों में ) सनातन । मुक्त । दिव्यता युक्त । श्रेष्ठ मनुष्य जीवन देगा ।
- इसलिये । मैंने फ़िर कहा - यदि आप सनातन ज्ञान से परिचित हो चुके हैं । तो आपके बच्चों के लिये हँस दीक्षा के लिये 10-11 वर्ष की आयु बहुत श्रेष्ठ है । बस बच्चे को समय समय पर थोङा प्रोत्साहित करते रहें । और यदि आश्रम के पास ही रहते हैं । तो समय समय पर गुरु दर्शन के लिये बालक को भी साथ लायें । इतना सब पर्याप्त होगा । और ये बच्चे के प्रति आपका वो कर्तव्य होगा । जिसकी संसार की बङी से बङी चीज से तुलना नहीं की जा  सकती ।
लेकिन मेरे मन में एक सहज भाव आता है । ये दुर्लभ ज्ञान इसे सहज ही कैसे मिला ? निश्चय ही इस जीव के पुण्य संस्कार तो इसमें काम आये ही होंगे । इसके अलावा और भी बाह्य कारकों का संयोजन हुआ होगा ।
- दरअसल । प्रेरणा के पिता ने कूछ झिझकते हुये बताया - मैं बचपन से ही धार्मिक स्वभाव का हूँ । और हमारे घर का माहौल भी धार्मिक है । जब मेरे मन में बच्चों का विचार आया । तो मैंने प्रभु से प्रार्थना की कि मुझे भक्त


बच्चे ही देने की कृपा करना । हमारे ( पति पत्नी ) संयोग के समय भी मेरे मन में कामवासना के बजाय श्रेष्ठ संतान की उत्पत्ति का ही विचार अधिक होता था । तब लगता ही नहीं था कि हम वासना क्रीङा करते हैं ।
मेरे सामने जैसे सभी स्थिति साफ़ हो गयी । उपनिषद में ऐसे ही गर्भाधान संस्कार का विस्त्रत विवरण आता है । जिसमें पति पत्नी पूरे आध्यात्म बिज्ञान के साथ परस्पर वैचारिक सहमति से ज्ञान युक्त होकर दिव्य भावना के साथ शरीर संयोग करते हैं । और तब निश्चय ही ऐसा संतान रूपी फ़ल प्राप्त होता है ।
बताईये है कुछ कठिनाई ? बस थोङा सा वैचारिक बदलाव धार्मिकता का समावेश हमारे जीवन को स्थायी सुख शान्ति से हमेशा के लिये भर देता है । तो फ़िर सभी को ऐसा ही क्यों नहीं करना चाहिये । साहेब ।
- आप सभी के ऊपर साहेब ऐसी ही कृपा करें ।  ऐसी ही निर्मल प्रार्थना के साथ । आज इतना ही ।
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