30 जुलाई 2011

ध्यान शुद्धि की प्रक्रिया है

भगवान ! संन्यास लेने के बाद बहुत मिला प्रेम । जीने का ढंग । धन्यभागी हूं । परंतु कभी कभी काफी घृणा से भर जाता हूं । आपके प्रति इतना कि - गोली मार दूं । यह क्या है प्रभु ? कुछ समझ नहीं आता ।
- आनंद सत्यार्थी ! जहां प्रेम है - साधारण प्रेम । वहां छिपी हुई घृणा भी होती है । उस प्रेम का दूसरा पहलू है - घृणा । जहां आदर है -साधारण आदर । वहां एक छिपा हुआ पहलू है - अनादर का । जीवन की प्रत्येक सामान्य भावदशा अपने से विपरीत भावदशा को साथ ही लिए रहती है । तुमने अभी जो प्रेम जाना है । बड़ा साधारण प्रेम है । बड़ा सासारिक प्रेम है । इसलिए घृणा से मुक्ति नहीं हो पायेगी । अभी तुम्हें प्रेम का एक और नया आकाश देखना है । एक और नयी सुबह । एक और नये प्रेम का कमल खिलाना है । वैसा प्रेम ध्यान के बाद ही संभव होगा । मेरे साथ दो तरह के लोग प्रेम में पड़ते हैं । एक तो वे, जिन्हें मेरी बातें भली लगती हैं । मेरी बातें प्रीतिकर लगती हैं । और कौन जाने मेरी बातें प्रीतिकर गलत कारणों से लगती हों । समझो कोई शराबी यहां आ जाये । और और मैं कहता हूं - मुझे सब स्वीकार है । मेरे मन में किसी की निंदा नहीं है । अब इस शराबी की सभी ने निंदा की है । जहां गया । वही गाली खायी हैं । जो मिला । उसी ने समझाया है । जो मिला । उसी ने इसको सलाह दी है कि बंद करो यह शराब पीना । मेरी बात सुनकर । मुझे सब स्वीकार है । शराबी को बड़ा अच्छा लगता है । जैसे किसी ने उसकी पीठ थपथपा दी । उसे मेरे प्रति प्रेम पैदा होता है । यह प्रेम बड़े गलत कारण से हो रहा है । यह प्रेम इसलिए पैदा हो रहा है कि उसके अहंकार को जाने अनजाने पुष्टि का एक वातावरण मिल रहा है । यह प्रेम मेरी बात को समझकर नहीं हो रहा है । इस बात का वह आदमी अपने ही व्यक्तित्व को मजबूत कर लेने के लिए उपयोग कर रहा है । तो प्रेम हो जायेगा । लेकिन इस प्रेम में पीछे घृणा छिपी रहेगी । तुम्हारे जीवन में प्रेम की कमी है । न तुम्हें किसी ने प्रेम दिया है । न किसी ने तुमसे प्रेम लिया है । और जब मैं तुम्हें पूरे हृदय से स्वीकार करता हूं । तो तुम्हारा दमित प्रेम उभर कर ऊपर आ जाता है । लेकिन यह प्रेम अपने पीछे घृणा को छिपाए हुए है ।
और ध्यान रखना । जैसे दिन के पीछे रात है । और रात के पीछे दिन है । ऐसे ही प्रेम के पीछे घृणा है । तो कई बार प्रेम समाप्त हो जायेगा । तुम एकदम घृणा से भर जाओगे । बेबूझ घृणा से । और तुम्हें समझ में ही नहीं आयेगा कि इतना तुम प्रेम करते हो । फिर यह घृणा क्यों ? घृणा इसीलिए है कि वह जो तुम प्रेम करते हो । अभी ध्यान से पैदा होता है । ध्यान से जब प्रेम गुजरता है । तो सोने में जो कूड़ा कचरा है । वह सब जल जाता है - ध्यान की अग्नि में । और ध्यान की अग्नि से जब गुजरता है प्रेम । तो कुंदन होकर प्रगट होता है । फिर उसमें कोई घृणा नहीं होती । फिर एक समादर है । जिसमें कोई अनादर नहीं होता । नहीं तो समादर करने वालों को अनादर करने में देर नहीं लगती । वे ही लोग फूल मालायें पहनाते हैं । वे ही लोग गालियां देने लगते हैं । वे ही लोग चरण छूते हैं । वे ही लोग फूल मालायें पहनाते हैं । वे ही लोग गालियां देने लगते हैं । वे ही लोग चरण छूते हैं । वे ही लोग गर्दन काटने को तैयार हो जाते हैं । ऐसी ही तुम्हारी दशा है - आनंद सत्यार्थी ।
तुम कहते हो - कभी घृणा से भर जाता हूं इतना कि गोली मार दूं ।  स्वभावत:, इसके पीछे एक और कारण है । वह भी समझ लेना चाहिए । वह सबके उपयोग का है । संन्यास से जो भी तुम्हें मिलेगा । वह इतना ज्यादा है कि तुम उसका मूल्य न चुका सकोगे । संन्यास से तुम्हें जो भी मिलेगा । वह इतना ज्यादा है कि तुम्हारे सब धन्यवाद छोटे पड़ जायेंगे । और तब तुम मुझे क्षमा न कर पाओगे । तुम्हें जरा बेबूझ बात मालूम पड़ेगी । जो व्यक्ति हमें कुछ दे । हम उसके सामने छोटे हो जोते हैं । अगर हम उसे कुछ लौटा सकें प्रत्युत्तर में । तो हम फिर समतुल हो जाते हैं । लेकिन अगर ऐसी कोई चीज दी जाये कि उसके उत्तर में हम कुछ भी न लौटा सकें । ऋण को चुकाने का उपाय ही न हो । तो फिर हम ऐसे व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं कर पाते । माफ नहीं कर पाते ।
मेरे एक परिचित हैं । बड़े धनपति हैं । एक बार मेरे साथ ट्रेन में सफर किया । कभी मुझे कहा नहीं था । लेकिन ट्रेन में अकेले ही थे साथ मेरे । बात होते होते बात में से बात निकल आई । उन्होंने कहा कि आज पूछने का साहस करता हूं । मेरी जिंदगी में एक दुर्घटना अमावस की तरह छाई हुई है । और दुर्घटना यह है कि मैंने अपने सारे रिश्तेदारों को, मित्रों को, सबका इतना दिया कि आज मेरे सब रिश्तेदार धनी हैं । सब मित्र धनी हैं । सब परिचित धनी है । ( धन उनके पास काफी है । और उन्होंने जरूर दिल खोल कर दिया है । ) मगर कोई भी मुझसे प्रसन्न नहीं । उल्टे वे सब मुझसे नाराज हैं । उल्टे वे मुझे बर्दाश्त ही नहीं कर सकते । यह मेरी समझ में नहीं आता कि मैंने इतना किया । सबके लिए किया । और यह सच है । मैं उनके रिश्तेदारों को जानता हूं । जो भिखमंगे थे । आज अमीर हैं । मैं उनके मित्रों को जानता हूं । जिनके पास कुछ नहीं था । आज सब कुछ है । यह बात सच है । इस बात में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं कि उन्होंने बहुत दिया है । और देने में उन्होंने जरा भी कृपणता नहीं की है । उनके हाथ बड़े मुक्त हैं । मुक्त भाव से दिया है । तो स्वभावत: उनका प्रश्न सार्थक है कि मुझसे लोग नाराज क्यों हैं ? मैंने कहा कि - आपको समझ में नहीं आता । लेकिन मैं एक बात पूछता हूं । और उससे बात स्पष्ट हो जायेगी । आपने इन मित्रों को, परिजनों को, परिवार वालों को उत्तर में कुछ आपके लिए करने दिया है कभी ? उन्होंने कहा कि - नहीं, कोई जरूरत ही नहीं । मेरे पास सब है । और अगर कभी कोई कुछ करना भी चाहा है । तो मैंने इनकार किया है कि क्या फायदा । मेरे पास बहुत है । तो मैंने किसी से कोई प्रत्युत्तर में तो लिया नहीं । बस मैंने कहा - बात साफ हो गई । क्यों वे नाराज हैं । वे आपको क्षमा नहीं कर पा रहे । वे आपको कभी क्षमा नहीं कर पायेंगे । आपने उनको नीचा दिखाया है । उनके भीतर ग्लानि है । वे जानते हैं कि आप ऊपर हैं । दानी हैं । दाता हैं । और हम भिखमंगे हैं । भिखमंगे कभी दाताओं को क्षमा नहीं कर सकते । आप एक काम करो । उनसे मैंने कहा - छोटे छोटे काम उनको भी आपके लिए करने दो । मुझे पता है । आपको कोई जरूरत नहीं । मगर छोटे छोटे काम । आप बीमार हो । कोई एक गुलाब का फूल ले आये । तो ले आने दो । और गुलाब का फूल लेकर अनुग्रह मानो । कभी किसी मित्र को कह दिया कि भाई यह काम तुमसे ही हो सकेगा । यह मुझसे नहीं हो पा रहा । तुम्हीं निपटाओ । जरा मौका दो उन्हें कुछ करने का । छोटे छोटे मौके । जरूर मुझे पता है कि आपको कुछ भी नहीं । आप सारे अपने काम खुद ही कर ले सकते हैं । लेकिन अगर उनको थोड़ा कुछ करने का आप मौका दे सको । तो वे आपको धीरे धीरे क्षमा करने में समर्थ हो पायेंगे । उनको लगेगा । हमने लिया ही नहीं । दिया भी । उनको लगेगा । हम नीचे ही नहीं हैं । समतुल हो गये । मगर यह उनके अहंकार के विपरीत है । यह वे नहीं कर पाये । दो वर्ष वाद जब मैंने उनसे पूछा । उन्होंने कहा - मुझे क्षमा करें । मैं किसी से ले नहीं सकता । गुलाब का फूल भी नहीं ले सकता । यह मेरी जीवन प्रक्रिया के विपरीत है । मैं यह बात मान ही नहीं सकता कि मैं और किसी से लूं । मैंने देना ही जाना है । लेना नहीं । फिर मैंने कहा कि - जिनको आपने दिया है । वे आपके दुश्मन रहेंगे ।
आनंद सत्यार्थी ! यही कठिनाई यहां है । इसलिए नहीं कि मैं तुमसे कुछ लेने में संकोच करूं । इसलिए नहीं कि मेरा कोई अहंकार है । मगर यह जो देना है । यह ऐसा है कि इसका लौटाना हो ही नहीं सकता । मैं तो सब उपाय करता हूं । छोटे छोटे करता हूं । जो भी मुझसे बन सकता है । वह उपाय करता हूं । छोटे छोटे काम लोगों को दे देता हूं । कोई जा रहा है अमेरिका । उसको कह देता हूं - एक कलम मेरे लिए खरीद लाना कि एक पौधा मेरे बगीचे के लिए ले आना । ऐसे मेरे बगीचे में जगह नहीं है । और कलमें इतनी इकट्ठी हो गई हैं कि विवेक मुझसे बार बार पूछती है । इनका करियेगा क्या ? उसको सम्हालना पड़ता है । साफ सुथरा रखना पड़ता है । और जब फिर कोई जाने लगता है । और मैं कहता हूं कि मेरे लिए एक कलम ले आना । तो उसकी समझ के बाहर है कि यह जरूरत क्या है ? जरूरत केवल इतनी है कि मैं तुम्हें एक मौका देना चाहता हूं कि कुछ तुमने मेरे लिए किया । अभी मैं जल्दी नहीं चाहता कि कोई मुझे गोली मार दे । बाद में मार देगा । जरा ठहरो । थोड़ा काम हो जाने दो । वह तो आखिरी पुरस्कार है । लेकिन अभी तो काम शुरू ही शुरू हुआ । अभी जरा सम्हालना ।
आनंद सत्यार्थी ! गोली वगैरह रखना तैयार । मगर सम्हालना । थोड़ा काम व्यवस्थित हो जाने दो । थोड़े संन्यास का यह रंग छितर जाने दो पृथ्वी पर । हां कोई न कोई गोली मारेगा । और संभावना यही है कि कोई संन्यासी ही गोली मारेगा । जिसके बिलकुल बर्दाश्त के बाहर हो जायेगा । जो सह न सकेगा । जिसको इतना मिलेगा कि उत्तर देने का उसके पास कोई उपाय न रह जायेगा । आखिर जीसस को जुदास ने बेचा - तीस रुपये में । और जुदास जीसस का सबसे बड़ा शिष्य था । सबसे प्रमुख था । उसने ही जीसस को मरवाया । उसने ही सूली लगवायी । और देवदत्त ने बुद्ध को मारने बहुत चेष्टाएं कीं । और देवदत्त बुद्ध का भाई था । अग्रणी शिष्य था ।
यह सब स्वाभाविक है । इसके पीछे एक जीवन का गणित है । गणित यह है कि तुम इतने दब जाते हो ऋण से कि तुम करो क्या । गोली न मारो तो करो क्या ? मगर अभी नहीं । पर । रुको । ठीक समय पर मैं खुद ही तुमसे कह दूंगा - सत्यार्थी, कहां है गोली ? साधारण प्रेम का यही रूपांतरण होने वाला है । हर साधारण प्रेम घृणा में बदल जायेगा । इसलिए अगर सच मैं ही तुम चाहते हो कि मेरे प्रति तुम्हारे मन में कोई घृणा न रह जाये । तो तुम्हें ध्यान से गुजरना होगा । ध्यान शुद्धि की प्रक्रिया है - प्रेम को शुद्ध करने का आयोजन है । रसायन है । यहां कुछ लोग हैं । जो मुझे प्रेम करते हैं । मगर ध्यान नहीं करते । वे कहते हैं - हमें तो आपसे प्रेम है । अब ध्यान की क्या जरूरत ? उनका प्रेम खतरनाक है । उनका प्रेम कभी भी मंहगा पड़ सकता है । क्योंकि घृणा इकट्ठी होती जायेगी । ध्यान से घृणा को धोते चलो । ताकि प्रेम निखरता चले । तो एक दिन जरूर ऐसे प्रेम का जन्म होता है । जिसके विपरीत तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं होता । उस प्रेम को अनुभव कर लेना अमृत को अनुभव करना है ।
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जिस आदमी को इसमें कम रस है कि - मैं क्या हूँ ? और इसमें ज्यादा रस हैं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं ? वह अधर्म के रास्ते पर चला जाता है ।
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