07 फ़रवरी 2012

प्रलय पर कुछ और भी बातें

बङे अजीव रंग है इस जिन्दगी के । कभी कभी सोचता हूँ । इसलिये इस लेख को लिखने का मुझे कोई फ़ायदा नजर नहीं आता । पर शायद कभी कभी ऐसा आवश्यक भी होता है । बात फ़िर से प्रलय की है । और मेरे ये दस्तावेज सिर्फ़ इंटरनेट पर ही जमा है । ऐसी हालत में प्रलय होने पर इनका कोई महत्व नहीं । शायद ये भी प्रलय के विनाश में खत्म हो जायें । और प्रलय होने पर किसी भी भविष्य कथन का क्या मतलब ? जब शायद उसे जानने वाले ही न रहें ।
अभी 2011 में मैंने प्रलय के बारे में कुछ लेख भी लिखे थे । जिसको लेकर पाठकों में तमाम जिज्ञासायें भी हुयी । उनके मैंने यथा संभव उत्तर भी दिये । मैंने एक लेख में बताया था । 11 nov 2011 को प्रथ्वी और जीव लेखा जोखा समाप्त हो चुका है । और 2012 से 2017 तक खण्डों में प्रलय का कार्यकाल रहेगा ।
2020 तक बिगङी स्थिति सामान्य होगी । और 2060 से सतयुग शुरू हो जायेगा । जो सिर्फ़ 3060 तक रहेगा । 


यानी सिर्फ़ 1000 साल । इसके बाद फ़िर से यही कलयुग अपना शेष कार्यकाल पूरा करेगा । इसीलिये मैंने कहा - इस जिन्दगी के रंग बङे अजीव है ।
इस प्रलय को लेकर त्रिलोकी सत्ता बङी सशंकित स्थिति में हैं । क्योंकि एक तरह से स्थिति उसके नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है । और उसके पास कोई सटीक उपाय भी नहीं हैं । प्रलय के अब नवीन स्थिति में तीन तरीके बन रहे हैं । प्राकृतिक विनाश । विश्व युद्ध या बङा युद्ध । परमाणु हमला । इनमें प्राकृतिक विनाश लीला तो तय है । बाकी दोनों के भी संकेत बनते हैं । क्योंकि प्रथ्वी का मौजूदा बिगङा स्वरूप संवारने हेतु और कोई विकल्प ही नहीं है । इसलिये इस तरह का खेल तो तय है ही ।

त्रिलोकी और सचखण्ड सत्ता के प्रतिनिधियों के बीच जो रस्साकशी जारी है । वो दूसरी मुख्य समस्या को लेकर है । जैसा कि मैंने कहा । 11 nov 2011 को प्रथ्वी और जीव लेखा जोखा समाप्त हो चुका है । प्रथ्वी से अधिक समस्या यहाँ धर्म के बिगङे स्वरूप और जाति पांत को लेकर घिनौनी स्थिति में पहुँच गयी है । और यही वो सबसे बङा रहस्य है । जो प्रलय की तेजी से डगमगाती नैया को डूबने से बचाये हुये है । जी हाँ । चौंकिये मत । बिलकुल उल्टा ।

आगे की बात जानने से पहले आप इसी प्रथ्वी के सत्ता तन्त्र को ध्यान में रखें । केन्द्रीय सरकार ( सचखण्ड ) राज्य सरकार ( त्रिलोकी ) मंत्री मंत्रालय आदि ( 33 करोङ देवी देवता ) अन्य अलग महाशक्तियाँ । जो तन्त्र से अलग भी  होती हैं । और उनका हिस्सा भी ( विश्व

के विभिन्न संगठन और सरकारें ) कुछ अलग तरह की योग महाशक्तियाँ ( निर्दलीय और उधोगपति जैसे लोग ) आदि । इस आधार पर आपको बात समझने में आसानी होगी । और ये मैं किसी उदाहरण के तौर पर भी नहीं बता रहा । क्योंकि परमात्मा का 1 नियम । 1 तन्त्र के आधार पर यहाँ जो कुछ भी है । ठीक ऐसा ही वहाँ भी है ।
अब आप एक दूसरे तथ्य पर गौर करिये । 2500 वर्ष से चला बौद्ध धर्म । इससे पहले था क्या ? 1500 वर्ष पहले से चला इस्लाम धर्म । इससे पहले था क्या ? 2012 वर्ष से चला ईसाई धर्म । इससे पहले था क्या ? 600 वर्ष पहले हिन्दू परिवार में 


जन्में नानक साहब से चला सिख धर्म । इससे पहले था क्या ? हिन्दू धर्म का एकदम सही इतिहास मुझे पता नहीं ।
ऐसे ही अन्य धर्मों का आंकलन करिये । अगर आप गौर करें । तो ये सभी धर्म और उनके प्रवर्तक ऐसे समय में हुये । जब किसी स्थान विशेष पर मानवता रूढिवाद और धार्मिक पाखण्ड । अनाचार । तन्त्र मन्त्र । मनमाने शास्त्र विरुद्ध यज्ञ । संकीर्ण मानसिकता । सामूहिक कट्टरता । पशुबलि । नरबलि या अति कठिन पूजा पाठ नियमों से त्राहि त्राहि कर उठी । तब कबीलाई तर्ज पर बने ये धर्म एक ही विचारधारा के लोगों को संगठित करने और समाज में जागरूकता उत्पन्न

करने और पाखण्डी वर्ग से संघर्ष करने के लिये आकार में आये । और तत्कालीन परिस्थितियों में इनके अच्छे परिणाम भी निकले ।
लेकिन आप ध्यान से देखेंगे । तो ये सभी धर्म और इनके प्रवर्तक सनातन धर्म और मानवता का सन्देश लेकर अवतरित हुये थे । न कि यह विचारधारा । जो आज कट्टरता से इनके अनुआईयों द्वारा अपना ली गयी है । अगर आप बहुत साधारण दृष्टि से भी ( इनके शुरूआती उद्देश्य ) देखें । तो आज सभी धर्म बुरी तरह सङ चुके हैं । और उनमें अति हानिकारक 


जीवाणु बिजबिजा रहे हैं । उनका मूल उद्देश्य एकदम लुप्त ही हो गया ।
यह था पहला महत्वपूर्ण तथ्य । जी हाँ । त्रिलोकी सत्ता और केन्द्रीय सत्ता के बीच रस्साकशी का । आप सोचें । तो आज कोई फ़ार्मूला बङे से बङे दिग्गज के पास नहीं हैं । जो धर्म के वर्तमान स्वरूप में सुधार करके इसे ( मूल स्थिति में छोङें ) संतोषजनक स्थिति में पहुँचा सके ।
इसीलिये त्रिलोकी की राज्य सरकार समय से पहले बर्खास्त कर दी गयी । और राष्ट्रपति शासन ( सचखण्ड ) लागू हो गया । और इसीलिये मैंने ऊपर कहा । ये सतयुग सिर्फ़ 1000 वर्ष के लिये होगा । इसी दौरान दो महत्वपूर्ण कार्य होंगे । ये पूरी व्यवस्था नवनिर्मित होगी । जैसे बुश और सद्दाम का मामला समझ लें । सिर्फ़ 9 साल के अन्दर प्रथ्वी पर प्रचलित सभी धर्म जीर्ण शीर्ण अवशेषों के रूप में इतिहास का हिस्सा हो जायेंगे । इनका नामोनिशान मिट जायेगा । न कोई हिन्दू होगा । न मुस्लिम । न सिख । न ईसाई । न बौद्ध । न अन्य । और सतयुग ( भले ही अस्थायी सही ) के कानून के अनुसार सिर्फ़ आर्य ( श्रेष्ठ ) और अनार्य दो ही तरह के लोग होंगे । इस तरह ये राष्ट्रपति शासन 1000 वर्ष में प्रथ्वी की सम्पूर्ण व्यवस्था को दुरुस्त करेगा । यही है वो रस्साकशी । जिसे स्वार्थी नेताओं की तरह बहुत से देवता । सिद्ध । योगी आदि हस्तक्षेप रखने वाले लोग नहीं चाहते । क्योंकि अभी बहुतों का कार्यकाल शेष है । और नई व्यवस्था उनकी शक्ति को क्षीण करेगी ।


एक और रहस्य की बात है । इसी प्रथ्वी पर कुछ अज्ञात और रहस्यमय कारणों से इस समय कई छोटी  बङी शक्तियाँ ( त्रिलोकी की  ) कार्यरत हैं । और आत्म ज्ञान के कुछ अच्छे गुप्त सन्त । जिन्हें कोई भी नहीं जानता । यहाँ सशरीर मौजूद हैं । वे पूरी हलचल पर न सिर्फ़ ध्यान रखे हुये हैं । बल्कि जरूरत पङने पर हस्तक्षेप भी करते हैं । यही बात समर्थ योगियों की भी है । अगर व्यवस्था सुधार हेतु कोई सहमति बनती भी है । तो कोई न कोई टांग अङा देता है । एक बार को तो ऐसा लगा कि प्रलय टल ही गयी ।
क्योंकि कलियुग के 28000 वर्ष ( आयु ) में से अभी सिर्फ़ प्रारम्भिक 5000 वर्ष हुये हैं । और कलियुग भन्ना उठा । जबकि ये स्थिति अन्तिम 5000 वर्ष यानी 23000 वर्ष बाद होनी चाहिये थी ।
अब चलिये । मान लीजिये । मौजूद धर्मों में सुधार का कोई तरीका निकल आये । और इस बिन्दु पर स्थिति सामान्य हो भी जाये । तो प्रथ्वी का सौन्दर्य जो कतई नष्ट हो चुका है । उसका क्या सुधार हो सकता है । क्षमता से 3 गुना अधिक आवादी पर नियन्त्रण कैसे होगा ? पर्यावरण सन्तुलन के लिये अति आवश्यक वृक्ष । जंगल । शुद्ध नदियाँ । तमाम लुप्त प्रायः जीव जन्तु । वातावरण में फ़ैली विषैली गैसें आदि इनका उचित समायोजन कैसे होगा ? ये अपने आवश्यक स्वरूप को कैसे प्राप्त होंगे ।
चलिये ये भी किसी जादू से ठीक हो जायें । तो सबसे बङा प्रश्न इतनी विशाल आवादी ( जो निरन्तर तेजी से बढती

ही चली जा रही है ) के लिये आवास । खेती । रोजगार हेतु जमीन । उनको पानी । बिजली । स्वास्थय । शिक्षा । लैंगिक अनुपात में समानता । नई और असाध्य बीमारियों से मुकाबला आदि ये सब कैसे होगा ? इसका कोई उपाय किसी को नजर नहीं आता । जाहिर है । उपाय एक ही है । सबका नये सिरे से नवनिर्माण । और इसके लिये पहले विध्वंस । मेरे निजी विचार से यह एकदम आपातकाल जैसी स्थिति है । जिसको लेकर प्रकृति भी परेशान है । क्या करे ? और कैसे करे ? क्योंकि उसे मनमानी नहीं करनी । बल्कि बङी कुशलता से सभी स्थितियों को सही करना है । अब बात समझिये । जिसके लिये मैंने जमीनी सत्ता तन्त्र का उदाहरण दिया था । इराक जैसी परिस्थितियाँ इस समय प्रथ्वी की मान लीजिये । बुश आदि को केन्द्रीय सत्ता मान लीजिये । और विश्व की विभिन्न सरकारों को टांग अङाने वाले । और दूसरे पक्ष में सहयोग वाले मान लीजिये । जाहिर है । ऐसी बङी घटनाओं में समर्थक और विरोधी  दोनों ही मुखर हो उठते हैं । ठीक ऐसी ही खींचातानी की स्थिति इस समय इस प्रथ्वी को लेकर बनी हुयी है । फ़िर देखिये आगे आगे होता है क्या ?
- इस विषय पर लिखने को अभी बहुत कुछ है । जो राजीव बाबा प्रलय में बच गये । तो लिखते ही रहेंगे । आज इतना ही ।
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