05 फ़रवरी 2012

इस चुङैल की असली कहानी ?

बहुत दिनों से इस लेख को लिखना चाह रहा था लेकिन कुछ न कुछ ऐसा व्यवधान आ ही जाता कि बात टल ही जाती । आपको याद होगा कि इसी सत्यकीखोज ब्लाग पर एक सचित्र विवरण छपा था - सत्यकीखोज को प्राप्त हुये 2 असली चुङैल फ़ोटो ।
मजे की बात ये थी कि ये दोनों फ़ोटो देखकर मुझे बहुत हँसी आयी । दरअसल हुआ ये कि किसी राजू द्वारा कुशीनगर, गोरखपुर की भेजी गयी फ़ोटो सविवरण मुझे प्राप्त हुयी और जब तक मैं इस चुङैल की असली कहानी ? आपको बता पाता । तभी चण्डीगढ के कुलदीप सिंह ने फ़ोन पर बताया कि - जब वो अपने कार्य से ऊना हिमाचल प्रदेश गये तो वहाँ भी पूर्व में एक घटना ऐसी घटी थी । जिसका फ़ोटो उनके पास है जिसे वो जल्द भेज देंगे ।
तब मैंने राजू द्वारा पूछे गये उस सवाल को कुछ समय के लिये स्थगित कर दिया । फ़िर वो भी फ़ोटो सविवरण मेरे पास आ गयी और मैंने उस विवरण को सचित्र ज्यों का त्यों छाप दिया । 
आपको ध्यान होगा । इसमें मेरा एक भी शब्द नहीं था सिवाय उन दोनों चुङैलों के प्रकार के । ये प्रकार उन स्थानों और घटनाओं के आधार पर था न कि फ़ोटो को देखकर । अब मजे की बात ये थी कि कुशीनगर वाली फ़ोटो जब मेरे पास आयी । उससे पहले ही उस चुङैल की mother फ़ोटो मेरे कम्प्यूटर में मौजूद थी । (फ़ोटो देखें)
जाहिर है मैंने इस विवरण को एक समाचार की तरह छापा । इसके पीछे एक और भी सोच थी कि - आम इंसान की क्या प्रतिक्रिया होती है ?
अब प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया तो मुझे पता नहीं पर शायद ज्यादातर लोगों को बात सच लगी ।
मगर प्रकाश गोविन्द जी ने कहा - फ़ोटो नकली है और इफ़ेक्ट से बनी है । 
किसी दूसरे बेनामी ने कहा - बकवास भूत चुङैल जैसा कुछ नहीं होता ।
जी हाँ ! ये एकदम सच है दोनों फ़ोटो एकदम नकली और मनगढन्त कहानी पर आधारित हैं । उनमें सत्यता कतई नहीं हैं । दरअसल इस ब्लाग पर भी मैं अपने जीवन की तरह समय समय पर प्रयोग करता रहता हूँ । तब एक अजीब सी बात लगी कि लोगों की सोच कितने सीमित दायरे में रहती है । अगर जरा सा भी जोर देकर सोचते तो फ़ोटो का कच्चा चिठ्ठा सामने आ जाता । दोनों फ़ोटो सामान्य कैमरे और मोबायल आदि डिवाइस से खींची गयी हैं ।
अब गौर करिये आजकल डिजिटल कैमरे और मोबायल आम बात है । गरीब से गरीब के पास हैं और अक्सर बहुत से लोग रात बिरात बहुत जगह फ़ोटोग्राफ़ी करते ही रहते हैं और प्रेत योनियों के लोग तमाम स्थान पर होते हैं । 
मेरे घर से ठीक पीछे 100 मीटर दूरी पर पीपल आदि वृक्ष समूह पर ही दो तीन प्रेत रहते हैं और कभी अलग से भी आ जाते हैं । कहने का मतलब ये आपके आसपास ही तमाम स्थान ऐसे हो सकते हैं जहाँ प्रेतवासा हो । तब वे कभी न कभी इन कैमरों की नजर में आ जाने चाहिये ।
इसको भी छोङिये । आपने देखा होगा डिस्कवरी जैसे तमाम खोजी चैनलों के फ़ोटोग्राफ़र आदि अत्याधुनिक और महंगे कैमरों के साथ दिन रात वीरान स्थानों पर भटकते ही रहते हैं । उनके कैमरों में आज तक कोई भूत प्रेत क्यों नहीं आया ?
इसको भी छोङिये NASA जैसे अंतरिक्ष केन्द्रों की दूरबीनें और उपकरण दिन रात आसमान को ही खंगालते रहते हैं । तब इनके कैमरों में भी कोई सूक्ष्म शरीरी कोई भूत प्रेत चुङैल आदि आ जाना चाहिये । क्योंकि आसमानी क्षेत्र में ऐसी आत्माओं का विचरण आम बात है बल्कि चहल पहल बनी ही रहती है ।
जाहिर है सूक्ष्म शरीर कभी कैमरों से दिखाई ही नहीं दे सकते । ये सिर्फ़ दिव्य दृष्टि या 3rd eye से नजर आते हैं । बस एक अपवाद होता है जब कभी किसी कारणवश ये अपने आपको किसी के सामने जाहिर करना चाहते हैं तो उसको प्रेत की इच्छानुसार प्लस उस आदमी की प्रेतक भावना के अनुसार भासित शरीर में दिखाई देते हैं । 
अब तक प्राप्त विवरणों के अनुसार ये कपङों में ही नजर आते हैं । अक्सर सफ़ेद कपङे या काले कपङे । जबकि वास्तविकता ये हैं प्रेत कपङे के नाम पर एक चिथङा भी नहीं पहनते । पहनेंगे कैसे ? कपङे आयेंगे कहाँ से ?
-----------
प्रेतों से जुङे बहुत से अनुभव हैं मेरे पास । अभी ताजा घटना की बात बताता हूँ । बात लङकियों के हास्टल की है । हास्टल से अक्सर बहुत सी प्रेत कहानियाँ जुङी होती हैं पर मैं सच्ची और झूठी तुरन्त समझ जाता हूँ । ये लङकी करीब 17 साल की थी और आगरा के पास ही कंस नगरी की बात है । ये अपने हास्टल की खिङकी से खङी थी । ये तीसरा फ़्लोर था उस दिन वह कुछ हल्का ज्वर सा महसूस कर रही थी । खिङकी से पार कुछ दूर एक बगीचा सा था । वह वहीं गौर से देख रही थी ।
अचानक लङकी खुद ब खुद केन्द्रित होने लगी । उसकी समस्त सोच बिन्दुवत हो उठी । वह अपना अस्तित्व ही भूल गयी और उसे लगा कि वह इतनी ऊँचाई के बाबजूद भी खिङकी से आराम से छलांग लगा सकती है और दौङकर बगीचे में जा सकती है और वह ऐसा करने ही वाली थी ।
लेकिन बस एक बात अलग थी लङकी ने सतनाम का उपदेश लिया हुआ था । जैसे ही आवेश सक्रिय होने वाला था । नाम प्रभाव दिखाने लगा । लङकी के शरीर ने जोरों की झुरझुरी सी ली और वह वापिस चैतन्य होने लगी । अपनी स्थिति में आ गयी । उसने गुरुदेव को याद किया और बिना किसी दुर्घटना के सब सामान्य हो गया । ये 100% सत्य घटना थी ।
----------------
अक्सर आवेश ऐसे ही होते हैं । बिना किसी आडम्बर के जैसे प्रायः समाज में प्रचलित हैं ।
ऐसे ही एक आवेश की दूसरी घटना मुझे एक महिला ने बतायी । वह एक गाँव के लगभग रास्ते से लगे परिचित बगीचे में दोपहर के समय खङी थी और लिफ़्ट हेतु किसी वाहन की प्रतीक्षा कर रही थी । जो वहाँ से 5 किमी दूर सङक तक लिफ़्ट दे दे । लेकिन काफ़ी देर तक कोई नहीं आया । अचानक वह सुन्न सी होने लगीं और एक आयत की शक्ल में लगे चार बङे वृक्षों के बीच अजीब सी ध्वनि युक्त हवा का चक्रवात सा घूमने लगा । प्रत्येक वृक्ष की आपस में दूरी लगभग 17 फ़ुट थी और वह वहीं खङी थी ।
उन्होंने बताया - उन्हें यकायक कुछ नहीं सूझा न कोई डर लगा । बल्कि वे मन्त्रमुग्ध सी उसे देखती सुनती रही । उन्हें अपना कुछ होश ही नहीं था । 
हालांकि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था पर जाने क्यों ऐसा लग रहा था । जैसे उन चारों वृक्षों के बीच कोई उस ध्वनि और हवा के बहाव के साथ तेजी से घूम सा रहा है । वायु और उसकी तीवृता से जो ध्वनि पैदा हो रही थी । वैसी ध्वनि बताना तो कठिन हैं पर जैसे किसी ने बाइक का एक्सीलेटर मरोङ कर रख दिया हो - हूँ ऊँऽऽऽऽ । बस ऐसी ही ध्वनि उत्पन्न होकर वायु एक चक्र पूरा करती और फ़िर दोबारा ध्वनि । दोबारा चक्र ।
महिला के समस्त रोंगटें खङे हो गये । अब उन्हें कुछ कुछ डर सा भी लगा और वो लहराकर गिरने ही वाली थी । तभी सतनाम सक्रिय हो उठा । ये भी उपदेश लिये थीं । महिला के शरीर में हल्का हल्का कम्पन हुआ और वह अपनी जगह पर ही हिलने लगी ।
ये संयोग ही था अभी तक वहाँ से कोई गुजरा न था और समय भी अभी दस मिनट ही लगभग हुआ था । फ़िर वह चैतन्य हो उठी । उन्होंने गुरुदेव को प्रणाम किया और वहाँ से काफ़ी दूर हट गयीं ।
तब उनको ध्यान आया कि वे तो क्या उस स्थान पर गाँव वाले भी नहीं जाते । दरअसल कुछ साल पहले उन्हीं चार वृक्षों से किसी आदमी ने फ़ाँसी लगाकर स्व शरीर हत्या कर ली थी और प्रेत योनि होकर वहीं भटक रहा था । मजे की बात ये थी कि महिला को अच्छी तरह से ये बात पहले ही मालूम थी । वह प्रेत प्रमाणित स्थान था पर उस दिन उस समय न जाने कैसे बुद्धि पलट गयी और वह उसी  स्थान पर खङी  हो गयीं । अब खास बात ये थी कि उस अनुभव से पहले भी हवा एकदम शान्त थी । हवा चल ही नहीं रही थी और अनुभव से धीरे धीरे निकलने तक भी हवा नहीं चल रही थी । उन चार वृक्षों के मध्य या बाहर भी ।
बस उन्हीं चार वृक्षों के मध्य जैसे कोई वायुयान सा उङा रहा था । ये 100% सत्य घटना थी ।
--------------
- इस तरह की सच्ची प्रेतक घटनाओं से आपको परिचित कराने का उद्देश्य ऐसी स्थिति आने पर बचाव करना और समझ जाना कि ये प्रेतक घटना है ही मेरा उद्देश्य है । ऐसा होने पर कभी डरिये मत, अपने को नियन्त्रण करने की कोशिश करें । ध्यान वहाँ से हटायें, इष्ट को भाव से ध्यान करें । 
सात्विक भाव बनते ही भय हट जायेगा और वहाँ से निकल जाना भी हो जायेगा ।

विशेष - उपरोक्त फ़ोटो को देखकर कोई पागल भी समझ जायेगा कि किसी ग्रामीण टायप विधवा और दुबली सी स्त्री के हाथ पैर मुँह मिटा दिया गया है और फ़िर इस कट को कहीं भी दूसरे फ़्रेम में प्लांट किया जा सकता है । ये कोई विशेष इफ़ेक्ट भी नहीं हैं । शायद PAINT में ही ऐसा करना संभव है ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email