12 मार्च 2010

एक सेठ पर सन्त की कृपा

कुछ समय पहले की बात है । एक बहुत धनी आदमी था । एक बार उसके मन में भी किसी संत से ज्ञान लेने की इच्छा हुई । लेकिन उसके मन में धन का बहुत अहंकार था । वो संत के पास गया । तो वे सच्चे संत तुरन्त समझ गये कि - इसके मन में धन का बेहद अहंकार है । 
लेकिन ये बात उन्होंने अपने मन में ही रहने दी । सेठ ने उन सन्त से ज्ञान मंत्र लिया । 
और बोला - महाराज जी ! मेरे पास बहुत धन है । किसी चीज की कमी हो । तो बोलना । मेरे योग्य कोई सेवा हो । तो बताना । 
संत उसकी इस बात के पीछे छिपे अहंकार को समझ गये । और उन्होंने उसी पल उसका अहंकार दूर करने की सोची । वे कुछ देर सोचते रहे ।
फ़िर उन्होंने कहा - और तो मुझे कोई परेशानी नहीं हैं । पर मेरे कपड़ों को सीने के लिए सुई की अक्सर जरूरत पड़ जाती है । अतः यदि तुम मेरा काम करना ही चाहते हो । तो मेरे शरीर त्यागने के बाद । जब कभी तुम ऊपर ( मृत्यु के बाद ) आओ । तो मेरे लिये अपने साथ एक सुई लेते आना । 
सेठ को एक सुई का इंतजाम करना बेहद मामूली बात ही लगी । इसलिये वह झोंक में एकदम बोला - ठीक है महाराज ! 
लेकिन वो जल्दी में ये बात बोल तो गया । परन्तु फिर उसको ध्यान आया कि - ये कैसे हो सकता है ? मरने के बाद मैं भला सुई कैसे ले जा सकता हूँ । इस बात के ध्यान 


में आते ही संत की बात का सही मतलब सेठ की समझ में भली भांति आ गया कि - जिस धन पर मैं अभी गर्व कर रहा हूँ । वो सब यहीं का यहीं ही पड़ा रह जायेगा । और मैं एक सुई जैसी मामूली चीज भी अपने साथ नहीं ले जा सकता । तब उसका सारा अभिमान चूर चूर हो गया । और वो क्षमा माँगता हुआ संत के चरणों में गिर पड़ा  ।
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रे दिल गाफिल गफलत मत कर । एक दिना जम आवेगा ।
सौदा करने या जग आया । पूजी लाया मूल गॅंवाया ।
प्रेमनगर का अन्त न पाया । ज्यों आया त्यों जावेगा ।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता । या जीवन में क्या क्या कीता ।
सिर पाहन का बोझा लीता । आगे कौन छुडावेगा ।
परलि पार तेरा मीता खडिया । उस मिलने का ध्यान न धरिया ।
टूटी नाव ऊपर जा बैठा । गाफिल गोता खावेगा ।
दास कबीर कहै समुझाई । अन्त समय तेरा कौन सहाई ।
चला अकेला संग न को । कीया अपना पावेगा ।
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दिवाने मन भजन बिना दुख पैहौ ।
पहिला जनम भूत का पै हौ सात जनम पछिताहौ । कॉंटा पर का पानी पैहौ प्यासन ही मरि जैहौ ।
दूजा जनम सुवा का पैहौ बाग बसेरा लैहौ । टूटे पंख मॅंडराने अधफड प्रान गॅंवैहौ ।
बाजीगर के बानर हो हौ लकडिन नाच नचैहौ । ऊच नीच से हाय पसरि हौ मॉंगे भीख न पैहौ ।
तेली के घर बैला होहौ ऑंखिन ढॉंपि ढॅंपैहौ । कोस पचास घरै मॉं चलिहौ बाहर होन न पैहौ ।
पॅंचवा जनम ऊट का पैहौ बिन तोलन बोझ लदैहौ । बैठे से तो उठन न पैहौ खुरच खुरच मरि जैहौ ।
धोबी घर गदहा होहौ कटी घास नहिं पैंहौ । लदी लादि आपु चढि बैठे लै घटे पहुचैंहौ ।
पंछिन मॉं तो कौवा होहौ करर करर गुहरैहौ। उडि के जय बैठि मैले थल गहिरे चोंच लगैहौ ।
सत्तनाम की हेर न करिहौ मन ही मन पछितैहौ। कहै कबीर सुनो भै साधो नरक नसेनी पैहौ ।
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तूने रात गँवायी सोय के । दिवस गँवाया खाय के ।
हीरा जनम अमोल था । कौड़ी बदले जाय ।
सुमिरन लगन लगाय के । मुख से कछु ना बोल रे ।
बाहर का पट बंद कर ले । अंतर का पट खोल रे ।
माला फेरत जुग हुआ । गया ना मन का फेर रे ।
गया ना मन का फेर रे ।
हाथ का मनका छाँड़ि दे । मन का मनका फेर ।
दुख में सुमिरन सब करें । सुख में करे न कोय रे ।
जो सुख में सुमिरन करे । तो दुख काहे को होय रे ।
सुख में सुमिरन ना किया । दुख में करता याद  रे ।
दुख में करता याद रे ।
कहे कबीर उस दास की । कौन सुने फ़रियाद ।
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ईशावास्य उपनिषद - 1 झेन फकीर के पास सुबह सुबह 1 आदमी आया । और कहने लगा कि - आप इतने शांत क्यों हैं ? और मैं इतना अशांत क्यों हूं ? उस फकीर ने कहा कि - बस मैं शांत हूं । और तुम अशांत हो । तुम अशांत हो । बात खत्म हो गई । अब इसमें कुछ और आगे कहने को नहीं है । उस आदमी ने कहा कि - नहीं । लेकिन आप शांत कैसे हुए ? उस फकीर ने पूछा कि - मैं तुमसे पूछना चाहूंगा कि तुम अशांत कैसे होते हो ? वह आदमी कहने लगा - अशांति आ जाती है । उस फकीर ने कहा - बस ऐसा ही हुआ है । शांति आ गई । और मेरा कोई गौरव नहीं है । जब तक अशांति आती थी । आती थी । मैं कुछ भी कर न सका । और जब शांति आ गई । तो अब मैं अगर अशांति लाना चाहूं । तो उतना ही बंध गया हूं । अब भी कुछ नहीं कर पाता हूं । उस आदमी ने कहा - नहीं । लेकिन मुझे भी रास्ता बताएं शांत होने का । उस फकीर ने कहा - मैं तो 1 ही रास्ता जानता हूं कि तुम यह भ्रम छोड़ दो कि तुम कुछ कर सकते हो । अशांत हो । तो अशांत हो जाओ । जानो कि अशांत हूं । मेरे हाथ में नहीं । और तब तुम पाओगे कि पीछे से शांति आने लगी । वह भी तुम्हारे हाथ में नहीं है । शांत होने की कृपा करके कोशिश मत करो । जो लोग भी शांत होने की कोशिश करते हैं । और अशांत हो जाते हैं । अशांत तो होते ही हैं । अब यह शांत होने की कोशिश और नई अशांति को जन्म दे जाती है । पर उस आदमी ने कहा कि - नहीं । मुझे बात कुछ जमती नहीं । मुझे शांत होना है । उस फकीर ने कहा - तुम अशांत रहोगे । क्योंकि तुम्हें कुछ होना है । तुम छोड़ नहीं सकते - परमात्मा पर । जबकि सब उस पर है । तुम्हारे हाथ में कुछ है नहीं । जिस दिन से हम राजी हो गए । जो था उसी के लिए । उसी दिन से हम शांत हुए । जब तक हम कुछ होना चाहते थे । तब तक हम कुछ हो न सके । पर नहीं । वह आदमी नहीं माना । उसने कहा कि - तुम्हारी शांति से ईर्ष्या पैदा होती है । और हम ऐसे मानकर चले न जाएंगे । तब उस फकीर ने कहा - रुको । जब कोई न रहे यहां । तब पूछ लेना । फिर दिन में कई मौके आए । कोई न था । उस आदमी ने फिर कहा कि - अब कुछ बता दें । अब कोई भी नहीं है । उस फकीर ने ओंठ पर उंगली रखी । और कहा कि - चुप । वह आदमी बड़ा परेशान हुआ । उसने कहा कि - जब लोग आ जाते हैं । तब मैं पूछता हूं । तो आप कहते हैं । जब कोई न रहे । और जब कोई नहीं रहता है । और मैं पूछता हूं । तो आप कहते हैं - चुप । यह हल कैसे होगा ? फिर सांझ हो गई । सूरज ढल गया । सब लोग चले गए । झोपड़ा खाली हो गया । उसने कहा कि - अब तो बताएं । तो फकीर ने कहा - बाहर आ । बाहर गए । पूर्णिमा का चांद निकला था । फकीर ने कहा - देखता है ये पौधे ? सामने ही छोटे छोटे पौधे लगे थे । उसने कहा - देखता हूं । फकीर ने कहा - देखता है वे दूर खड़े वृक्ष आकाश को छूते ? उसने कहा - देखता हूं । उस फकीर ने कहा - वे बड़े हैं । और ये छोटे हैं । और झगड़ा कुछ भी नहीं । इनमें मैंने कभी विवाद नहीं सुना । इस छोटे पौधे ने कभी बड़े पौधे से नहीं पूछा कि तू बड़ा क्यों है ? छोटा अपने छोटे होने में शांत है । बड़े ने कभी छोटे से नहीं पूछा कि तू छोटा क्यों है ? बड़े की अपनी मुसीबतें हैं । जब तूफान आते हैं । तब पता चलता है । छोटे की अपनी तकलीफें हैं । पर छोटा छोटा होने को राजी है । बड़ा बड़ा होने को राजी है । और उन दोनों के बीच मैंने कभी संवाद नहीं सुना । और मैंने दोनों को शांत पाया है । तू भी कृपा कर । और मुझे छोड़ । मैं जैसा हूं । वैसा हूं । तू जैसा है । वैसा है । ओशो.
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जीवन का संगीत पैदा होता है - प्रेम और ध्यान से । दोनों को सम्हालो । जब अकेले तब - ध्यान में । जब कोई मौजूद हो । तब - प्रेम में ।
जब प्रेम में । तो अपने को बिल्कुल भूल जाओ । और जब ध्यान में । तो दूसरे को बिलकुल भूल जाओ । और यह रूपांतरण इतना सहज होना चाहिए । इतना तरल होना चाहिए कि इसमें जरा भी अड़चन न हो । यह सहज रूप से हो जाए । जैसे तुम घर के बाहर आते । भीतर जाते । जैसे श्वास लेते । श्वास छोड़ते । इतना ही सहज होना चाहिए । ओशो
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प्रिय आत्मन ! जब भी कोई बुद्ध पुरुष हुआ हैं । तो उसकी कोई नहीं मानते हैं । जैसे कोई राजनीति में ईमानदार आते ही भष्टाचार खत्म हो जाता है । वैसे ही धर्म के ठेकेदार का नकली धर्म की पोल खुल जाती है । तो वो विरोध सबसे पहले वही ही करते हैं । मेरे 1 नाम ( महाप्रभु ) रखने से कई पंडितों की चोटी खिंची जाती है । जब कोई जागा हुआ इंसान अंधेरी नगरी में जाते ही रोशनी हो जाती है । तो यह तो होता आया है । और बुद्ध पुरुष को या तो औरत में । या धन दौलत में  बदनाम करेंगे । और हम भी ऐसे ही हैं । बुराई करने में और सुन लेने में बड़ा आनंद आता हैं । चाहे कोई लेना देना ना हो । ओशो
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मन हमें अपने साथ लिए घूमता है । जब तक सही जगह नहीं मिल जाती । तब तक वह हमें बैठने नहीं देता है । हम कहीं बैठते हैं । तो वह बारबार हमें उठा देता है । जब उसे लगता है कि हाँ अब सही जगह मिल गयी । तब वह पूरी तसल्ली करता है । और जब संतुष्ट हो जाता है । तभी वह हमसे विदाई लेता है । उससे पहले वो विदा नहीं हो सकता । इसलिए मन को बहुत बहुत धन्यवाद । सीमा 
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