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04 सितंबर 2013

अनुराग सागर के सम्पूर्ण लिंक्स

अक्सर सत्यकीखोज के पाठक इंटरनेट पर `अनुराग सागर' को पढ़ने या डाउनलोड करने के लिये लिंक की माँग करते रहे हैं । जबकि यह मैंने विभिन्न लेखों के माध्यम से सम्पूर्ण रूप से ब्लाग पर पोस्ट कर दी थी लेकिन व्यस्तता के चलते उस समय मैं लिंकों को सहेजना भूल गया । 
हमारे शिष्य स्वपनिल तिवारी ने इस कार्य में मेरी मदद की और उन सभी लिंक्स को खोजकर सत्यकीखोज के पाठकों हेतु एक ही जगह उपलब्ध कराया । इस पेज पर अलग अलग शीर्षकों से सभी लिंक मौजूद हैं । बस वे कृमबद्ध अवश्य नहीं हैं लेकिन उससे ग्रन्थ को समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी । क्योंकि शीर्षक के तहत लेख के प्रारूप में पूरा ही वर्णन मिल जाता है । वैसे इसी पेज में अनुराग सागर के डाउनलोड का पीडीएफ़ लिंक भी मौजूद है ।

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http://greatsaint-kabeer.blogspot.in/2010/12/blog-post.html 
अनुराग सागर की संक्षिप्त कहानी
http://greatsaint-kabeer.blogspot.in/2011/06/blog-post_21.html
धर्मदास यह कठिन कहानी..गुरुमत ते कोई बिरले जानी 
http://greatsaint-kabeer.blogspot.in/2011/06/blog-post_22.html
साधु का मार्ग बहुत ही कठिन है 
http://greatsaint-kabeer.blogspot.in/2011/06/blog-post_25.html 
(विदेह स्वरूप सार शब्द 
http://greatsaint-kabeer.blogspot.in/2012/02/blog-post.html 
काल निरंजन जग भरमावे 
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http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/03/blog-post_28.html
अपना होय तो दियो बतायी । कबीर साहब और धर्मदास
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_28.html
 राम नाम की उत्पत्ति 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_29.html 
अष्टांगी कन्या और काल निरंजन 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_30.html
अष्टांगी का बृह्मा गायत्री और पुहुपावती को शाप देना
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_31.html 
काल निरंजन का धोखा
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_404.html
त्रिदेव द्वारा प्रथम समुद्र मंथन
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_5853.html
बृह्मा और गायत्री का अष्टांगी से झूठ बोलना
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_7828.html
वेद की उत्पत्ति 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_1723.html 
कालदूत नारायण दास की कहानी
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/12.html
काल निरंजन का छलावा - 12 पंथ
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_23.html
लुटेरा कामदेव
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_2209.html
गुरु शिष्य विचार - रहनी 


http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_03.html
काल का अपने दूतों को चाल समझाना
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_12.html
(कबीर का सुदर्शन श्वपच को ज्ञान देना 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_20.html
 मन की कपट करामात 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_18.html
जब गुरु मिलें बन्दीछोर रे
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/7-5.html
सात 7 पाँच 5 के मायाजाल में फ़ँसा जीव
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_13.html
समुद्र और राम की दुश्मनी का कबीर द्वारा निबटारा
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_08.html
कबीर और रानी इन्द्रमती
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_07.html
कबीर और रावण
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post.html
काल निरंजन की चालबाजी 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_05.html
कबीर साहब की वाणी में काल निरंजन के धोखे का वर्णन 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/11/blog-post_24.html
असंख्य बृह्मा विष्णु महेश मेरे सामने उत्पन्न और नष्ट हो चुके हैं 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2011/06/7-5.html
सात 7 पाँच 5 के मायाजाल में फ़ँसा जीव 
http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/2012/07/pdf-format.html
अनुराग सागर PDF format डाउनलोड लिंक 

http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/05/1.html
आदि सृष्टि की रचना 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/05/2.html
आदि सृष्टि की रचना 2
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/05/blog-post_27.html
काल निरंजन और कबीर का समझौता 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/4.html \
काल के 4 दूत
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/4-84.html
4 खानि 84 लाख योनियों से आये मनुष्य के लक्षण 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_07.html
यहाँ तो बहुत काल कलेश दुख पीङा है
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_08.html
रानी इन्द्रमती का सत्यलोक जाना 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_13.html
काल कसाई और जीव (मनुष्य) बकरा है  
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_2618.html
तप्तशिला पर काल पीङित जीवों की सत्य पुरुष को पुकार 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_14.html
 धर्मदास के पूर्वजन्म की कहानी 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_18.html
 चूङामणि का जन्म 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_8497.html
 शरीर ज्ञान परिचय 
http://searchoftruth-rajeev.blogspot.in/2011/06/blog-post_20.html 
 कपटी काल निरंजन का चरित्र 

19 मार्च 2010

अनुराग सागर की संक्षित कहानी


अनुराग सागर ।.. कबीर साहिब और धरमदास जी के संवादों पर आधारित महान ग्रन्थ  है । इसकी शुरुआत में बताया गया है कि सबसे पहले जब ये सृष्टि नहीं थी । प्रथ्वी । आसमान । सूरज । तारे आदि कुछ भी नहीं था । तब केवल परमात्मा ही था ।.. सिर्फ़ परमात्मा ही शाश्वत है ।

 इसलिये संतमत में । और सच्चे जानकार संत । परमात्मा के लिये । है । शब्द का प्रयोग करते हैं । उसने ( परमात्मा ने ) कुछ सोचा ।.. ( सृष्टि की शुरूआत में । उसमें स्वतः एक विचार उत्पन्न हुआ । इससे स्फ़ुरणा ( संकुचन जैसा ) हुयी ) । तब एक शब्द ( हुं.. ) प्रकट हुआ । ( जैसे हम लोग आज भी विचारशील होने पर । हुं.. । करते हैं । तब उसने सोचा । मैं कौन हूं ?..

 इसीलिये हर इंसान आज तक इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा है कि मैं कौन हूं ? उस समय ये पूर्ण था । ) तब उसने एक सुन्दर और आनंददायक दीप की रचना की । और उसमें विराजमान हो गया । फिर उसने एक एक करके । एक ही नाल से 16 अंश यानी सुत प्रकट किये । उनमें 5 वें अंश कालपुरुष को छोड़कर सभी सुत आनंद को देने वाले थे । और वे सतपुरुष द्वारा बनाये गए हंसदीपों मैं आनंदपूर्वक रहते थे ।

 इनमें कालपुरुष सबसे भयंकर और विकराल था । वह अपने भाइयों की तरह हंसदीपों में न जाकर । मानसरोवर दीप के निकट चला आया । और सत्पुरुष के प्रति घोर तपस्या करने लगा । लगभग 64 युगों तक तपस्या हो जाने पर । उसने सतपुरुष के  प्रसन्न होने पर तीन लोक । स्वर्ग । धरती और पाताल मांग लिए । और फिर से कई युगों तक तपस्या की  ।
इस पर सतपुरुष ने अष्टांगी कन्या ( आदिशक्ति । भगवती आदि ) को स्रष्टि बीज के साथ कालपुरुष के पास भेजा । ( इससे पहले सतपुरुष ने कूरम नाम के सुत को भेजकर उसकी तपस्या करने की इच्छा की वजह पूछी । )

अष्टांगी कन्या बेहद सुन्दर और मनमोहक अंगो वाली थी । वह कालपुरुष को देखकर भयभीत हो गयी । कालपुरुष उस पर मोहित हो गया । और उससे रतिक्रिया का आग्रह किया । ( यही प्रथम स्त्री पुरुष का काम मिलन  था । ) और दोनों रतिक्रिया मैं लीन हो गए । ये रतिक्रिया बहुत लम्बे समय तक चलती रही ।
इससे ब्रह्मा । विष्णु और शंकर का जन्म हुआ । अष्टांगी कन्या उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगी । पर कालपुरुष की इच्छा कुछ और ही थी ? इनके जन्म के उपरांत कुछ समय बाद कालपुरुष अदृश्य हो गया । और भविष्य के लिए आदिशक्ति को निर्देश दे गया ।
तब आदिशक्ति ने अपने अंश से तीन कन्यायें उत्पन्न की । और उन्हें समुद्र में छिपा दिया । फ़िर उसने अपने पुत्रों को समुद्र मंथन की आग्या दी । और समुद्र से मंथन के द्वारा प्राप्त हुयी तीनों कन्यायें अपने तीन पुत्रों को दे दी ।

ये कन्यायें सावित्री । लक्ष्मी और पार्वती थी । तीनों पुत्रों ने मां के कहने पर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार लिया । तब आध्याशक्ति ने ( कालपुरुष के कहेनुसार..यह बात कालपुरुष दोबारा कहने आया  था । क्योंकि पहले अष्टांगी ने जब पुत्रों को इससे पहले सृष्टि रचना के लिये कहा । तो उन्होंने अनसुना कर दिया । )  अपने तीनो पुत्रों के साथ सृष्टि की रचना की ।
आद्धाशक्ति ने खुद अंडज । यानी अंडे से पैदा होने वाले जीवों को रचा । ब्रह्मा ने पिंडज । यानी पिंड से शरीर से पैदा होने वाले जीवों की रचना की । विष्णु ने ऊश्मज । यानी पानी । गर्मी से पैदा होने  वाले जीव कीट पतंगे जूं आदि की रचना की । शंकर जी ने स्थावर यानी पेड । पौधे । पहाड़ । पर्वत आदि जीवों की रचना की । और फिर इन सब जीवों को 4 खानों वाली 84 लाख योनियों में डाल दिया ।
इनमें मनुष्य शरीर की रचना सर्वोत्तम थी । इधर ब्रह्मा । विष्णु । शंकर ने अपने पिता कालपुरुष के वारे मैं जानने की बहुत कोशिश की । पर वे सफल न हो सके । क्योंकि वो अदृश्य था और उसने आध्याशक्ति से कह रखा था कि वो किसी को उसका पता न बताये । फिर वो सब जीवों के अन्दर ॥ मन ।। ??? के रूप मैं बैठ गया । और जीवों को तरह तरह की वासनाओं में फ़साने लगा । और समस्त जीव बेहद दुख भोगने लगे ।
 क्योंकि सतपुरुष ने उसकी  क्रूरता देखकर शाप दिया था कि वह एक लाख जीवों को नित्य खायेगा । और सवा लाख को उत्पन्न करेगा । समस्त जीव उसके क्रूर  व्यवहार से हाहाकार करने लगे और अपने बनाने  वाले को पुकारने  लगे ।  सतपुरुष को ये जानकर बहुत गुस्सा आया कि काल समस्त जीवों पर बेहद अत्याचार कर रहा है । ( दरअसल काल  जीवों को तप्तशिला पर रखकर पटकता और खाता था । )
तब सतपुरुष ने ग्यानी जी ( कबीर साहब ...जो सतपुरुष के 16 अंश में से एक है । ) को उसके पास भेजा । कालपुरुष और ग्यानी जी के बीच काफ़ी झडप हुयी । और कालपुरुष हार  गया । तप्तशिला पर तडपते जीवों ने ग्यानी जी से प्रार्थना की । कि वो उसे इसके अत्याचार से बचायें । ग्यानी जी ने उन जीवों को  सतपुरुष का नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र । ) ध्यान करने को कहा । इस नाम के ध्यान करते ही जीव मुक्त होकर ऊपर ( सतलोक ) जाने लगे । यह देखकर काल घबरा गया ।
तब उसने ग्यानी जी से एक समझौता किया । कि जो जीव इस परम नाम ( वाणी से परे ) को सतगुरु से प्राप्त कर लेगा । वह यहां से मुक्त  हो जायेगा । ग्यानी जी ने कहा । मैं स्वयं आकर सभी जीवों  को यह नाम दूंगा । नाम के  प्रभाव से वे यहां से मुक्त होकर आनन्दधाम को  चले जायेंगे ।
तब काल  ने  कहा । मैं और माया ( उसकी पत्नी ) जीवों को तरह तरह की भोगवासना में फ़ंसा देंगे । जिससे जीव भक्ति भूल जायेगा । और यहीं फ़ंसा रहेगा ।
तब ग्यानी जी ने कहा । लेकिन उस सतनाम  के अंदर जाते ही जीव में ग्यान का प्रकाश हो जायेगा और जीव तुम्हारे सभी चाल समझ जायेगा । अब काल को चिंता हुयी ।
तब उसने बेहद चालाकी से कहा । ..मैं जीवों को मुक्ति  और उद्धार के  नाम पर तरह तरह के जाति धर्म पूजा पाठ तीर्थ वृत आदि में ऐसा उलझाऊंगा कि वह कभी अपनी असलियत नहीं जान पायेगा ।..साथ ही मैं तुम्हारे चलाये गये.. पंथ में भी..? अपना जाल फ़ैला दूंगा ? इस तरह अल्पबुद्धि जीव यही नहीं सोच पायेगा.. कि सच्चाई आखिर है  क्या ? मैं तुम्हारे असली नाम में भी अपने नाम  मिला दूंगा ?..आदि । अब क्योंकि समझौता हो  गया था ।
ग्यानी जी वापस लौट गये । वास्तव में मन रूप मैं यह काल ही है । जो हमें तरह तरह के कर्मजाल मैं फंसाता है । और फिर नरक आदि भोगवाता है ।
लेकिन वास्तव मैं यह आत्मा सतपुरुष का अंश होने से बहुत शक्तिशाली है । पर भोग वासनाओं में पड़कर इसकी ये दुर्गति हो गई है ।
 इससे छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय सतगुरु की शरण और महामंत्र का ध्यान करना ही है ।

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326