10 मार्च 2018

सेवक को अंग



सेवक को अंग

सेवक सेवा में रहै, अन्त कहूं नहि जाय।
दुख सुख सिर ऊपर सहै, कहैं कबीर समुझाय॥

सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय।
कहैं कबिर सेवा बिना, सेवक कभी न होय॥

सेवक मुखै कहावई, सेवा में दृढ नांहि।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी मांहि॥

सेवक सेवा में रहै, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर कूसेवका, सनमुख ना ठहराव॥

सेवक फ़ल मांगै नहीं, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर ता दास पर, काल करै नहिं घात॥

सेवक स्वामी एक मत, मत में मत मिल जाय।
चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय॥

सेवक कुत्ता राम का, मुतिया वाका नांव।
डोरी लागी प्रेम की, जित खैंचे तित जांव॥

तू तू करु तो निकट ह्वै, दुर दुर करु तो जाय।
ज्यौं गुरू राखै त्यौं रहै, जो देवै सो खाय॥

फ़ल कारन सेवा करै, निसदिन जाँचे राम।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चाहै चौगुना दाम॥

सब कुछ गुरू के पास है, पाइये अपने भाग।
सेवक मन सोंप्या रहै, रहै चरन में लाग॥

सदगुरू सब्द उलंघि कर, जो सेवक कहुँ जाय।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समुझाय॥

सतगुरू बरजै सिष करै, क्यौं करि बाचै काल।
दहुँ दिसि देखत बहि गया, पानी फ़ूटी पाल॥

सतगुरू कहि जो सिष करै, सब कारज सिध होय।
अमर अभय पद पाइये, काल न झांकै कोय॥

साहिब को भावै नहीं, सों हमसों जनि होय।
सदगुरू लाजै आपना, साधु न मानै कोय॥

साहिब जासों ना रुचै, सो हमसों जनि होय।
गुरू की आज्ञा में रहूं, बल बुधि आपा खोय॥

साहिब के दरबार में, कमी काहू की नांहि।
बंदा मौज न पावहीं, चूक चाकरी मांहि॥

द्वार धनी के पङि रहै, धका धनी का खाय।
कबहुक धनी निवाजिहै, जो दर छांङि न जाय॥

आस करै बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।
सुक्र कही बलि ना करी, तातै गयो पाताल॥

गुरू आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनौं गये, आगे सिर पर काल॥

भुक्ति मुक्ति मांगौं नहीं, भक्ति दान दे मोहि।
और कोइ जांचौं नहीं, निसदिन जांचौं तोहि॥

भोग मोक्ष मांगों नहीं, भक्ति दान गुरूदेव।
और नही कुछ चाहिये, निसदिन तेरी सेव॥

यह मन ताको दीजिये, सांचा सेवक होय।
सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय॥

अनराते सुख सोवना, राते निंद न आय।
ज्यौं जल छूटी माछरी, तलफ़त रैंन बिहाय॥

राता राता सब कहै, अनराता नहि कोय।
राता सोई जानिये, जा तन रक्त न होय॥

राता रक्त न नीकसे, जो तन चीरै कोय।
जो राता गुरू नाम सों, ता तन रक्त न होय॥

सीलवंत सुर ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥

दयावंत धरमक ध्वजा, धीरजवान प्रमान।
सन्तोषी सुखदायका, सेवक परम सुजान॥

चतुर विवेकी धीर मत, छिमावान बुधिवान।
आज्ञावान परमत लिया, मुदित प्रफ़ुल्लित जान॥

ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सों हेत।
सत्यवान परमारथी, आदर भाव सहेत॥

पट दरसन को प्रेम करि, असन बसन सों पोप।
सेव करैं हरिजनन की, हरषित परम संतोष॥

यह सब लच्छन चित धरै, अप लच्छन सब त्याग।
सावधान सम ध्यान है, गुरू चरनन में लाग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग।
कहैं कबीर बिसरै नहीं, यह गुरूमुख को अंग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे साह दिवान।
और कभी नहि देखता, है वाही को ध्यान॥

गुरूमुख गुरू आज्ञा चलै, छांङि देइ सब काम।
कहैं कबीर गुरूदेव को, तुरत करै परनाम॥

उलटे सुलटे वचन के, सीष न मानैं दूख।
कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरूमुख॥

सुरति सुहागिन सोइ सहि, जो गुरू आज्ञा मांहि।
गुरू आज्ञा जो मेटहीं, तासु कुसल ह्वै नांहि॥

गुरू आज्ञा लै आवही, गुरू आज्ञा लै जाय।
कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय॥

कहैं कबीर गुरू प्रेमवश, क्या नियरै क्या दूर।
जाका चित जासों बसै, सो तिहि सदा हजूर॥

कबीर गुरू औ साधु कूं, सीस नवावै जाय।
कहैं कबीर सो सेवका, महा परम पद पाय॥
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