08 जुलाई 2010

संन्यास को घर घर में पहुंचाने का मेरा खयाल है ।

इधर अभी मनाली शिविर में 20 लोगों ने 1 नये प्रकार के संन्यास में प्रवेश किया है । उस संबंध में रोज पूछा जा रहा है कि - वह संन्यास क्या है ? वह मैं आपसे कहूं । 2-3  बातें संक्षिप्त में । पहली बात तो यह कि संन्यास जैसा आज तक दुनिया में था । अब भविष्य में उसके बचने की कोई संभावना नहीं है । वह नहीं बच सकेगा । सोवियत रूस में आज संन्यासी होना संभव नहीं है । चीन में संन्यासी होना अब संभव नहीं है । और जहां जहां समाजवाद प्रभावी होगा । वहां वहां संन्यास असंभव हो जाएगा । जहां भी यह खयाल पैदा हो जाएगा कि जो आदमी कुछ भी नहीं करता है । उसे खाने का हक नहीं है । वहां संन्यास मुश्किल हो जाएगा । आने वाले 50 वर्षों में दुनिया में बहुत सी संन्यास की परंपराएं एकदम विदा हो जाएंगी । चीन में बड़ी बौद्ध परंपरा थी संन्यास की । वह एकदम विदा हो गई । तिब्बत से लामा विदा हो रहे हैं । वे बच नहीं सकते । रूस में भी बहुत पुराने ईसाई फकीरों की परंपरा थी । वह नष्ट हो गई । और दुनिया में कहीं भी बचना मुश्किल है । इसलिए मेरी अपनी दृष्टि यह है कि संन्यास जैसा कीमती फूल नष्ट नहीं होना चाहिए । संन्यास की संस्था चाहे विदा हो जाए । लेकिन संन्यास विदा नहीं होना चाहिए । तो उसे बचाने का 1 ही उपाय है । और वह उपाय यह है कि संन्यासी जिंदगी को छोड़कर न भागे । जिंदगी के बीच संन्यासी हो जाए । दुकान पर बैठे । मजदूरी करे । दफ्तर में काम करे । भागे न । उसकी आजीविका समाज के ऊपर निर्भर न हो । वह जहां है । जैसा है । वहीं संन्यासी हो जाए । तो इन 20 संन्यासियों को इस दिशा में प्रवृत्त किया है कि वे अपने दफ्तर में काम करेंगे । अपने स्कूल में नौकरी करेंगे । अपनी दुकान पर बैठेंगे । और संन्यासी का जीवन जीएंगे । इसका परिणाम दोहरा होगा । 1 तो इसका परिणाम यह होगा कि संन्यासी शोषक नहीं मालूम होगा । वह किसी के ऊपर निर्भर है । ऐसा नहीं मालूम होगा । संन्यासी को भी इससे लाभ होगा । क्योंकि जो संन्यास की परंपरा समाज पर निर्भर हो जाती है । वह गुलाम हो जाती है । हमें पता चले । या न चले । वह समाज की गुलामी में जीने लगती  है। और जिनको हम रोटी देते हैं । उनसे हम आत्मा भी खरीद लेते हैं । इसलिए संन्यासी आमतौर से विद्रोही होना चाहिए । लेकिन हो नहीं पाता । क्योंकि वह जिनसे भोजन पाता है । उनकी गुलामी में उसे समय बिताना पड़ता है । वह वही बातें कहता रहता है । जो आपको प्रीतिकर हैं । क्योंकि आप उसको रोटी देते हैं ।
संन्यास 1 क्रांतिकारी घटना है । उसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति भीतरी रूप से । आर्थिक रूप से । अपने ही ऊपर निर्भर हो । तो 1 तो संन्यास को घर घर में पहुंचाने का मेरा खयाल है । इसका दूसरा गहरा परिणाम यह होगा कि जब संन्यासी घरों को छोड़कर भाग जाता है । तो संन्यासी से जो फायदा संसार को होना चाहिए । वह नहीं हो पाता । अच्छे लोग जब संसार छोड़ देते हैं । तो संसार बुरे लोगों के हाथ में पड़ जाता है । इससे नुकसान हुआ है । मैं मानता हूं कि किसी आदमी की जिंदगी में अच्छाई का फूल खिले । तो उसे ठेठ बाजार में बैठा होना चाहिए कि उसकी सुगंध बाजार में फैलनी शुरू हो । अन्यथा वह तो भाग जाएगा । दुर्गंध फैलाने वाले जम कर बैठे रहेंगे । तो संन्यासी को घर घर में । वह वेश परिवर्तन कर ले । वह अपनी सारी वृत्तियों को परमात्मा की ओर लगा दे । लेकिन छोड़कर न भागे । बल्कि अब, जिस घर का काम कल तक वह सोचता था - मैं कर रहा हूं । अब परमात्मा का उपकरण बनकर उस घर का काम किए चला जाए । न पत्नी को छोड़े । न बच्चों को छोड़े । न घर को छोड़े । अब यह सारे काम को परमात्मा का काम समझ कर चुपचाप करता चला जाए । इसका कर्ता न रह जाए । बस इसका द्रष्टा भर रह जाए । ऐसे संन्यास की प्रक्रिया से, मैं सोचता हूं । 1 तो लाखों लोग उत्सुक हो सकेंगे । जो कभी घर छोड़ने का विचार नहीं कर पाते हैं । उनकी जिंदगी में भी संन्यास का आनंद आ सकेगा । और यह जिंदगी भी प्रफुल्लित होगी । अगर हमें सड़कों पर । बाजारों में । मकानों में । दफ्तरों में संन्यासी उपलब्ध होने लगे । उसके कपड़े । उसकी स्मृति । उसकी हवा । उसका व्यवहार । वह सारी जिंदगी को प्रभावित करेगा । इस दृष्टि से जो लोग भी बारबार पूछ रहे हैं । वे अगर उत्सुक हों । तो आज 3 से 4 वे मुझसे अलग से बात कर लें । जिन्हें संन्यास का खयाल हो कि उनकी जिंदगी में यह संभावना बने । इस संन्यास में मैंने 2-3  बातें और संयुक्त की हैं । 1 तो इस संन्यास को पीरियाडिकल रिनंसिएशन कहा है । सावधि संन्यास कहा है । मेरा मानना है । किसी आदमी को भी जिंदगी भर के निर्णय नहीं लेने चाहिए । आज आप निर्णय लेते हैं । हो सकता है । 6 महीने बाद आपको लगे कि गलती हो गई । तो आपके वापस लौटने का उपाय होना चाहिए । अन्यथा संन्यास भी बोझ हो सकता है । जब हम 1 दफे 1 आदमी को संन्यास दे देते हैं । तो आग्रह रखते हैं कि वह जिंदगी भर संन्यासी रहे । हो सकता है । साल भर बाद उसे लगे कि यह गलती हो गई है । तो उसे वापस लौटने का अधिकार होना चाहिए । बिना निंदा के । इसलिए यह जो मेरा । जिसे मैंने संन्यास कहा है । पीरियाडिकल है । आप जिस दिन भी चाहें । वापस चुपचाप लौट जा सकते हैं । कोई आपके ऊपर इसका बंधन नहीं होगा । थाईलैंड और बर्मा में इस तरह के संन्यास का प्रयोग प्रचलित है । और उससे थाईलैंड और बर्मा की जिंदगी में फर्क पड़ा है । हर आदमी थोड़े बहुत दिन के लिए संन्यास तो 1 दफे ले ही लेता है । किसी आदमी को वर्ष में 2 महीने की फुरसत होती है । तो 2 महीने संन्यास ले लेता है । और 2 महीने संन्यासी की तरह जीकर वापस अपने घर की दुनिया में लौट आता है । आदमी बदल जाता है । 2 महीने संन्यासी रहने के बाद आदमी वही नहीं हो सकता । जो था । उसके भीतर का सब बदल जाता है । फिर वर्ष, 2 वर्ष के बाद उसे सुविधा होती है । 2 महीने के लिए संन्यास ले लेता है । इसलिए दूसरी भी दिशा मैंने इसमें जोड़ी है कि जो लोग कुछ सीमित समय के लिए संन्यास लेना चाहें । वे सीमित समय के लिए संन्यास लेकर प्रयोग करें । अगर उनका आनंद बढ़ता जाए । तो समय को बढ़ा लें । अगर उन्हें ऐसा लगे कि नहीं । वह उनकी बात नहीं है । तो चुपचाप वापस लौट आएं । इससे दोहरे फायदे होंगे । संन्यास बंधन नहीं बनेगा । संन्यास स्वतंत्रता है । इसलिए बंधन बनना नहीं चाहिए । अभी हमारा संन्यासी बिलकुल बंधा हुआ कैदी हो जाता है । और दूसरी बात - संन्यास बंधन नहीं बनेगा । 1 - और दूसरी बात कि संन्यास प्रत्येक के लिए । चाहे थोड़े समय के लिए ही सही । उपलब्ध हो जाएगा । और अगर 1 आदमी अपने 70 साल की जिंदगी में 5 दफा 2-2  महीने के लिए भी संन्यासी हो गया हो । तो मरते वक्त दूसरा आदमी होगा । वह वही आदमी नहीं हो सकता । अधिकतम लोगों को संन्यासी होने का मौका मिल जाएगा । अधिकतम लोग संन्यास का रस और आनंद अनुभव कर सकेंगे । और मेरा मानना है कि जो 1 दफे संन्यास में जाएगा । वह वापस लौटेगा नहीं । यह न लौटना नियम से नहीं होना चाहिए । यह न लौटना संन्यास के आनंद से होना चाहिए । लेकिन लौटने की स्वतंत्रता कायम रहनी चाहिए । इस संबंध में अभी ज्यादा बात करनी उचित नहीं होगी । जिन मित्रों को संन्यास की दिशा में उत्सुकता हो । वे दोपहर 3 से 4 मुझे मिल ले सकते हैं । ओशो
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अहंकार हार को स्वीकार नहीं करने देता । और उसी कारण हम बुरी तरह हार जाते हैं । जो हार को स्वीकार कर लेता है । उसकी तो जीत शुरू हो गयी । कहते हैं न - हारे को हरिनाम । जिसने हार को अंगीकार कर लिया । उसके जीवन में तो हरि उतरना शुरू हो जाता है । संसार में जीत तो होती ही नहीं । हार ही होती है । जीत हो ही नहीं सकती । जीत संसार का स्वभाव नहीं है । वह छोटी मोटी जीत । जो तुम्हें दिखायी पड़ती है । बड़ी हारों की तैयारी है । और कुछ भी नहीं । वह वैसे ही है । जैसे जुआरी जुआ खेलने जाता है । कभी कभी जीत भी जाता है । वह जीत सिर्फ बड़ी हार के लिए आकर्षण है ।
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भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता धन्य है । इस मित्रता ने मानव जाति को 1 खूबसूरत सन्देश दिया है । सुदामा ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा - प्रभु मित्रता का मतलब क्या होता है ? तो भगवान ने हंसकर कहा - अरे सुदामा जहाँ मतलब होता है । वहाँ मित्रता कहाँ होती है ।
- देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करके करूणानिधि रोये । पानी परात को हाथ छुओ ना नैनन के जल सों पग धोये । जय श्रीकृष्ण
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भगवान बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं । वह धर्म/मजहब या रिलीजिन से सर्वथा अलग है । जहाँ मजहब या रिलीजन व्यक्तिगत चीज है । वही दूसरी ओर धम्म 1 सामाजिक वस्तु है । वह प्रधान रुप से और आवश्यक रुप से सामाजिक है । धम्म का मतलब है - सदाचरण । जिसका अर्थ है । जीवन के सभी क्षेत्रों में 1 आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार । इससे स्पष्ट है कि यदि कही परस्पर 2 आदमी भी साथ रहते हों । तो चाहे न चाहे उन्हें धम्म के लिये जगह बनानी
पडेगी । दोनों में से 1 भी बचकर नही जा सकता । जबकि यदि कही 1 आदमी अकेला हो । तो उसे किसी धर्म की आवश्यकता नहीं । धम्म की नहीं । ये तो जनसंख्या नियंत्रण और व्यस्था के नियम होते
हैं । धम्म क्या है ? धम्म की आवश्यकता क्यों है ? भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म के 2 प्रधान तत्व हैं - प्रज्ञा और करुणा । प्रज्ञा का अर्थ है - बुद्धि ( निर्मल बुद्धि या विवेक ) भगवान बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धर्म के 2 स्तम्भों में से 1 माना है । क्योंकि वह नही चाहते थे कि मिथ्या विश्वासों के लिये कोई जगह बचे । करुणा क्या है ? और किसके लिये ? करुंणा का अर्थ है - दया, प्रेम और मैत्री । इसके बगैर न तो समाज जीवित रह सकता है । और न तो समाज की उन्नति हो
सकती है । प्रज्ञा और करुणा का अलौकिक मिश्रण ही तथागत का धम्म है । समय बुद्धा ने कहा है - धम्म क्या है ? अगर इसका 1 वाक्य में उत्तर देना हो । तो मैं यही कहूँगा कि ये ऐसा मार्ग या तरीका है । जिससे मनुष्य में ऐसी मानसिक योग्यता उत्पन्न हो जाती है । जिसके बाद वो अपनी बुद्धि को समय और परिस्थिति के हिसाब से सही इस्तेमाल करके दुखों से मुक्त जीवन जी सकता है । इतना ही नहीं । वो संसार का सर्वज्ञ न्याय कर्ता बन सकता है । बुद्ध का " धम्म " को अन्य धर्मो के समान न समझना । ये काफी अलग है । इसे श्रद्धा और भक्ति से नहीं । बुद्धि और समझ से पाओगे । ये किसी सम्प्रदाए विशेष के लिए ही नहीं है । सम्पूर्ण मानवता के लिए है । 
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