05 जून 2010

बैल को सरकार ने खरीद लिया है


आप समाजवाद और साम्यवाद में क्या फर्क महसूस करते हैं ?
- वही फर्क करता हूं मैं । जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है । और कोई फर्क नहीं करता हूं । समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है । वह पहली स्टेज है - बीमारी की । और पहली स्टेज पर बीमारी साफ दिखाई नहीं पड़ती । इसलिए पकड़ने में आसानी होती है । इसलिए सारी दुनिया में कम्युनिज्म ने सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है । कम्युनिज्म शब्द बदनाम हो गया है । और कम्युनिज्म ने पिछले 50 सालों में दुनियां में जो किया है । उसके कारण उसका आदर क्षीण हुआ है । 50 वर्षों में कम्युनिज्म की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है । इसलिए अब कम्युनिज्म सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर किया है । अब वह समाजवाद की बात करता है । और यह भी कोशिश कर सकता है कि हम समाजवाद से भिन्न हैं । लेकिन समाजवाद और साम्यवाद में कोई बुनियादी भेद नहीं है । सिर्फ शब्द का भेद है । लेकिन शब्द के भेद पड़ने से बहुत फर्क मालूम पड़ने लगते हैं । शब्द को भर बदल दें । तो ऐसा लगता है । कोई बदलाहट हो गई । कोई बदलाहट नहीं हो गई है ।
समाजवाद हो । या साम्यवाद हो । सोशलिज्म हो । या कम्युनिज्म हो । एक बात पक्की है कि व्यक्ति की हैसियत को मिटा देना है । व्यक्ति को पोंछ डालना है । व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर देना है । संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार छीन लेना है । और देश की सारी जीवन व्यवस्था राज्य के हाथ में केंन्द्रित कर देनी है । लेकिन हमारे जैसे मुल्क में, जहां कि राज्य निकम्मे से निकम्मा सिद्ध हो रहा है । वहां अगर हमने देश की सारी व्यवस्था राज्य के हाथ में सौंप दी । तो सिवाय देश के और गहरी गरीबी, और गहरी बीमारी में गिरने के कोई उपाय न रह जाएगा ।
आज मेरे 1 मित्र मुझे 1 छोटी सी कहानी सुना रहे थे । वह मुझे बहुत प्रीतिकर लगी । वे मुझे 1 कहानी सुना रहे थे कि 1 आदमी ने रास्ते से गुजरते वक्त 1 खेत में 1 बहुत मस्त और तगड़े बैल को काम करते हुए देखा । वह पानी खींच रहा है । और बड़ी शान से दौड़ रहा है । उसकी शान देखने लायक है । और उसकी ताकत, उसका काम भी देखने लायक है । वह जो आदमी गुजर रहा था । बहुत प्रशंसा से भर गया । उसने किसान की बहुत तारीफ की । और कहा कि बैल बहुत अदभुत है । 6 महीने बाद वह आदमी फिर वहां से गुजर रहा था । लेकिन बैल अब बहुत धीमे धीमे चल रहा था । जो आदमी उसे चला रहा था । उससे उसने पूछा कि - क्या हुआ ? बैल बीमार हो गया ? 6 महीने पहले मैंने उसे बहुत फुर्ती और ताकत में देखा था । उस आदमी ने कहा कि - उसकी फुर्ती और ताकत की खबर सरकार तक पहुंच गयी । और बैल को सरकार ने खरीद लिया है । जबसे सरकार ने खरीदा है । तब से वह धीमा चलने लगा है । पता नहीं सरकारी हो गया है । 6 महीने और बीत जाने के बाद वह आदमी फिर उस जगह से निकला । तो देखा कि बैल आराम कर रहा है । वह चलता भी नहीं । उठता भी नहीं । खड़ा भी नहीं होता । तो उसने पूछा कि - क्या बैल बिलकुल बीमार पड़ गया । मामला क्या है ? तो जो आदमी उसके पास खड़ा था । उसने कहा - बीमार नहीं पड़ गया है । इसकी नौकरी कन्फर्म हो गई है । अब यह बिलकुल पक्का सरकारी हो गया है । अब इसे काम करने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई है । बैल अगर ऐसा करे । तब तो ठीक है । आदमी भी सरकार में प्रवेश करते ही ऐसे हो जाते हैं । उसके कारण हैं । क्योंकि व्यक्तिगत लाभ की जहां संभावना समाप्त हो जाती है । और जहां व्यक्तिगत लाभ निश्चित हो जाता है । वहां कार्य करने की इनसेंटिव, कार्य करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है । सारे सरकारी दफ्तर, सारा सरकारी कारोबार मक्खियां उड़ाने का कारोबार है । पूरे मुल्क की सरकार नीचे से ऊपर तक आराम से बैठी हुई है । और हम देश के सारे उद्योग भी इनको सौंप दें । ये जो कर रहे हैं । उसमें सिवाय हानि के कुछ भी नहीं होता ।
मेरा अपना सुझाव तो यह है कि जो चीजें इनके हाथ में हैं । वे भी वापस लौटा लेने योग्य है । अगर हिन्दुस्तान की रेलें हिन्दुस्तान की व्यक्तिगत कंपनियों के हाथ में आ जाएं । तो ज्यादा सुविधाएं देंगी । कम टिकट लेंगी । ज्यादा चलेंगी । ज्यादा आरामदायक होंगी । और हानि नहीं होगी । लाभ होगा । जिस जिस जगह सरकार ने बसें ले लीं अपने हाथ में । वहां बसों में नुकसान लगने लगा । जिस आदमी के पास 2 बसें थीं । वह लखपति हो गया । और सरकार जिसके पास लाखों बसें हो जाती हैं । वह सिवाय नुकसान के कुछ भी नहीं करती । बहुत आश्चर्यजनक मामला है ।
मैं अभी मध्यप्रदेश में था । तो वहां मध्यप्रदेश ट्रांसपोर्टेशन बसों की व्यवस्था के जो प्रधान हैं । अब तो वे सब सरकारी हो गई हैं । उन्होंने मुझे कहा कि पिछले वर्ष हमें 23 लाख रुपये का नुकसान लगा है । उन्हीं बसों से दूसरे लोगों को लाखों रुपये का फायदा होता था । उन्हीं बसों से सरकार को लाखों का नुकसान होता है । लेकिन होगा ही । क्योंकि सरकार को कोई प्रयोजन नहीं है । कोई काम्पिटीशन नहीं है ।
दूसरा सुझाव मैं यह भी देना चाहता हूं कि अगर सरकार बहुत ही उत्सुक है धंधे हाथ में लेने को । तो काम्पिटीशन में सीधा मैदान में उतरे । और बाजार में उतरे । जो दुकान 1 आदमी चला रहा है । ठीक उसके सामने सरकार भी अपनी दुकान चलाए । और फिर बाजार में मुकाबला करे । एक कारखाना आदमी चला रहे है । ठीक दूसरा कारखाना खोले । और दोनों के साथ समान व्यवहार करे । और अपना कारखाना चलाकर बताए । तब हमको पता चलेगा कि सरकार क्या कर सकती है ।
सरकार कुछ भी नहीं कर सकती है । असल में सरकारी होते ही सारे काम से प्रेरणा विदा हो जाती है । और जहां सरकार प्रवेश करती है । वहां नुकसान लगने शुरू हो जाते हैं ।
समाजवाद और साम्यवाद दोनों ही, जीवन की व्यवस्था को राज्य के हाथों में दे देने का उपाय हैं । जिसे हम आज पूंजीवाद कहते हैं । वह पीपुल्स कैपिटलिज्म है । वह जन पूंजीवाद है । और जिसे समाजवाद और साम्यवाद कहा जाता है । वह स्टेट कैपिटलिज्म, राज्य पूंजीवाद है । और कोई फर्क नहीं है । जो चुनाव करना है । वह चुनाव यह है कि हम पूंजीवाद व्यक्तियों के हाथ में चाहते हैं कि राज्य के हाथ में चाहते हैं । यह सवाल है । व्यक्तियों के हाथ में पूंजीवाद बंटा हुआ है । डिसेंट्रलाइज्ड है । ओशो
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मैं अखबार नहीं । जो दूसरे दिन पुराना हो जाऊँ । जिंदगी का वो पन्ना हूँ । जहां लम्हे ठहर जाते हैं - ओशो ।
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भीतर की यात्रा - सत्य स्वयं के भीतर है । उसे पहचान लेना भी कठिन नहीं । लेकिन उसके लिए अपने भीतर यात्रा करनी होगी । जब कोई अपने भीतर जाता है । तो अपने ही प्राणों के प्राण में । वह सत्य को भी पा जाता है । और स्वयं को भी । पहले महायुद्ध की बात है । एक फ्रांसीसी सैनिक को किसी रेलवे स्टेशन के पास क्षत विक्षत स्थिति में पाया गया था । उसका चेहरा इतने घावों से भरा था कि उसे पहचानना कठिन था कि वह कौन है । उसे पहचानना और भी कठिन इसलिए हो गया कि उसके मस्तिष्क पर चोट आ जाने से वह स्वयं भी स्वयं को भूल गया था । उसकी स्मृति चली गई थी । पूछे जाने पर वह कहता था - मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं । और कहां से हूं ? और यह बताते ही उसकी आंखों से आंसुओं की धार लग जाती थी । अंतत: 3 परिवारों ने उसे अपने परिवार से संबंधित होने का दावा किया । वह तीनों परिवारों से हो । यह तो संभव नहीं था । इसलिए उसे क्रमश: तीनों गांवों में ले जाकर छोड़ा गया । 2 गांवों में तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ की भांति जाकर खड़ा हो गया । किंतु तीसरे गांव में प्रविष्ट होते ही उसकी फीकी आंखें 1 नई चमक से भर गई । और उसके भाव शून्य चेहरे पर किन्हीं भावों के दर्शन होने लगे । वह स्वयं ही 1 छोटी गली में गया । और फिर 1 घर को देखकर दौड़ने लगा । उसके सोये से प्राणों में कोई शक्ति जैसे जग गई हो । वह पहचान गया था । उसका घर उसकी स्मृति में आ गया था । उसने आनंद से विभोर होकर कहा था - यही मेरा घर है । और मुझे स्मरण आ गया है कि मैं कौन हूं ।
ऐसे ही हममें से प्रत्येक साथ हुआ है । हम भूल गये हैं कि कौन हैं ? क्योंकि हम भूल गये हैं कि हमारा घर कहां है ? अपना घर दीख जावे । तो स्वयं को पहचान लेना सहज ही हो जाता है । जो व्यक्ति बाहर ही यात्रा करता रहता है । वह कभी उस गांव में नहीं पहुंचता । जहां कि उसका वास्तविक घर है । और वह न पहुंचने से वह स्वयं तक ही नहीं पहुंच पाता है । बाहर ही नहीं । भीतर भी 1 यात्रा होती है । जो स्वयं तक । और सत्य तक ले जाती है ।
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