19 जून 2010

असली दीक्षा के बारे में और जानें..


दीक्षा के बारे में मेरे ब्लाग पाठकों की जिग्यासा अक्सर बनी ही रहती है । दीक्षा को लेकर उठने वाले सवालों के बारे में जानने के लिये मेरे पास अक्सर email और फ़ोन काल्स भी आते हैं । इस सम्बन्ध में मैंने संक्षेप में कई लेखों में जरूरत के अनुसार जिक्र भी किया है । पर अध्यात्म जिग्यासा एक ऐसी बात है..एक ऐसी उत्सुकता है ।जिसके बारे में जितना बताओ । जिग्यासा उतनी ही बङती जाती है । वास्तव में जो लोग जीवन में धर्म अर्थ और काम तीनों को भरपूर रूप से प्राप्त कर चुके हैं । वे भी उस अजीव बैचेनी को महसूस करते हैं । जो यह फ़ीलिंग देती है कि इस सब प्राप्ति के बाद भी कुछ ऐसा है । जो कहीं खो गया है । हम ने जीवन भर तमाम चीजों में आनन्द की तलाश में ही तो अपनी समस्त ऊर्जा का इस्तेमाल किया है । फ़िर भी हम आनन्द ? वास्तविक आनन्द के पास फ़टक भी नहीं सके । हमारी ये " कुछ खोया सा लगता है " वाली तलाश कब और कहाँ और किस तरह और किसके माध्यम से परवान चङेगी ? ये लगभग प्रत्येक जीव के मन में एक शाश्वत प्रश्न है । ये बात मैं किसी अनुमान के आधार पर नहीं कह रहा । बल्कि विगत 25 सालों में हजारों लोगों से मिलने । उनको निकट से जानने के बाद स्व अनुभव के
आधार पर कह रहा हूँ । स्त्रियां या लङकियों को ज्यादातर लोग काम भावना से देखते है । और पता नहीं क्यों उन्हें शास्त्रों में मुक्ति मार्ग में एक बङी बाधा के रूप में बताया गया है ।
मैं जबसाधु जीवन में शामिल हुआ । तो इस बात को लेकर बहुत सचेत था । पर बाद में अनुभव से मैंने जाना कि स्त्रियों में भी भक्ति को लेकर बेहद उत्साह और जिग्यासा होती है । और वे भी प्रभु प्राप्ति और दर्शन और मुक्ति क्या और कैसे ..जैसे विषयों में बेहद दिलचस्पी रखतीं हैं । दीक्षा एक ऐसा विषय है । जिस पर एक पूरा दिलचस्प ग्रन्थ लिखा जा सकता है । मैंने अपने साधना जीवन में पाया कि दीक्षा जैसी महत्वपूर्ण बात के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं । और जो जानते हैं वह उन्हें कोई राह दिखाने के बजाय उल्टा दिग्भ्रमित करता है । अपने ऐसे ही जिग्यासुओं की खातिर मैं दीक्षा के कुछ और रहस्य बता रहा हूँ । वैसे तो जैसा गुरु मिले और गुरु का जैसा ग्यान हो उसके आधार पर दीक्षा हजारों प्रकार की ( क्योंकि दीक्षा के ढेरों मन्त्र हैं और अनेकों प्रकार के ग्यान और सिद्धियां हैं ) होती है । पर एक दीक्षा जो सबके लिये महत्वपूर्ण है । वो आत्म ग्यान की दीक्षा होती है । वास्तविक मुक्ति देने वाली । मुक्ति मार्ग दिखाने वाली यही एकमात्र दीक्षा है । इसकी चार मन्जिलें तय करनी होती हैं । और स्पष्ट जान लें । कि दीक्षा का अर्थ ही दिखाना या तीसरा नेत्र खोलना है । यदि दीक्षा के तीन महीने बाद भी । साधना और ध्यान का अभ्यास लगभग ठीक करने के बाद भी आपको कोई अलौकिक अनुभव नही हुआ । जैसे अन्तर में
किसी देवी देवता का दर्शन । किसी सूक्ष्म लोक की यात्रा । किसी दिव्य लोक की यात्रा । तो निश्चय ही आपके गुरु में कोई खोट है । आप समय खराब कर रहें हैं । कोई दूसरा गुरु तलाशें ।
1-- पहली दीक्षा मन्त्र दीक्षा होती है । यह ढाई अक्षर का मन्त्र होता है । और वाणी से नहीं जपा जाता । बल्कि गुरु के द्वारा प्रकट किया जाता है । यही वास्तविक हरि का नाम है । । अगर आपने विधिवत तरीके से दीक्षा ली है । तो दीक्षा के समय ही आप दिव्य प्रकाश को देख लेते हैं । किसी किसी को पहली ही बार में देवताओं के दर्शन या किसी स्वर्ग आदि छोटे लोक की यात्रा भी जाती है । किसी किसी को तीन या चार अनुभव पहली बार में ही लगभग एक घन्टे के अन्दर हो जाते हैं । मन्त्र दीक्षा से मन की शांति प्राप्ति होती है ।
2-- दूसरी हंस दीक्षा होती है । हंस के बारे में प्राय लोगों को यह पता ही है कि हंस नीर क्षीर को अलग कर देता है । यानी यह उत्तम और सार को ही ग्रहण करता है । आपने जनमानस में अक्सर बहुप्रचलित यह कहावत सुनी ही होगी । कि " के हंसा मोती चुगे..के भूखन मर जाय " इस सम्बन्ध में उच्चकोटि के संत कबीर साहब ने भी लिखा है । " बगुली नीर बिटालिया..सागर लगया कलंक..घने पखेरू पी गये हंस न बोबे चंच " वास्तव में यह आत्मा जब " सचखन्ड " से नीचे उतरा । तो यह हंस ही था । और बहुत शक्तिशाली और उच्च स्थिति वाला था । पर नीचे के खन्डों में उतरते उतरते । उन जगहों की विषय वासनाओं में आकर्षित होकर..उलझकर यह काग वृति यानी कौए के समान विष्ठा प्रेमी हो गया । और अपनी उच्च स्थिति को भूल गया । जिस प्रकार किसी कुलीन और उच्च खानदान का धनाढय व्यक्ति शराब , जुआ , और वैश्यावृति आदि बुरी लतों का शिकार होकर दुर्गति को प्राप्त होता है । और इस तरह यह " अविनाशी आत्मा " दुर्गति को प्राप्त होकर जनम मरण धरमा " जीवात्मा " हो गया । और तबसे निरंतर भटक रहा है । और अपनी उसी स्थिति को प्राप्त करने हेतु व्याकुल है । इसको उसी स्थिति में वापस
पहुँचाने की शक्ति केवल सच्चे संतो के पास है । परमात्मा के विधान के अनुसार " सच्चे संत ? " जीवात्मा को उसका " असली नाम और वास्तविक परिचय " याद दिला देते हैं । और एक विशेष तरीके का उपयोग करते हुये उसकी " जङ चेतन " की गाँठ खोल देते है । इस तरह जङ से बन्धा हुआ यह जीवात्मा उसी क्षण मुक्ति को प्राप्त होकर वापस नीचे से ऊपर की यात्रा शुरू कर देता है । इसका अर्थ ये न निकाल लेना । कि दीक्षा प्राप्त कर लेने वाला मर जाता है । इसका अर्थ ये है । कि वो ध्यान समाधि आदि की विभिन्न मंजिलों को तय करता हुआ अपनी खोई हुयी " अमरता " को पुनः प्राप्त करता है । पर शर्त यही है । कि ये दीक्षा आपको किसी सच्चे संत द्वारा प्राप्त हुयी हो । दीक्षा सच्चे संत से प्राप्त है । या नहीं । इसकी पहचान मैंने अपने ब्लाग्स में कई जगह लिखी है । फ़िर भी इसी पोस्ट में मैंने उसका स्पष्ट खुलासा किया है । यह सूत्र हमेशा ध्यान रखे " सिंहो के लेहङ नहीं साधु न चले जमात.." यानी सच्चा साधु या संत सिंह ( शेर ) के समान होता है । और निर्भय होकर स्वछंद विचरण करता है । उसके आगे पीछे भीङ नहीं होती । और न ही किसी प्रकार के ताम झाम या ढोंग आडम्बर होते है । मैंने आज दिन तक अपनी किसी भी साधना में अगरबत्ती तक नहीं जलायी । केवल सुमरन । केवल भाव कनेक्टिविटी । परमात्मा भाव का भूखा है । उसे इन फ़ालतू चीजों की कोई आवश्यकता नहीं । इस तरह जीवात्मा " हंस " ग्यान को पाकर सार असार , सत्य असत्य , विनाशी अविनाशी , के फ़र्क को जानने लगता है ।
एक महत्वपूर्ण बात " हंस दीक्षा " स्त्री पुरुष बालक वृद्ध ग्रहस्थ..वैरागी..किसी को भी दी जा सकती है । हमारे मंडल में छह साल के बच्चे इस दीक्षा से दीक्षित है । अगर हंस दीक्षा आपको सच्चे गुरु से प्राप्त हुयी है । तो आपका अगला जन्म मनुष्य का निश्चित हो जाता है । और यदि आपने लगभग " बीस साल " हंस का " सच्चा ध्यान " लगन से कर लिया । तो आप देवताओं से ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं ।
3-- हंस से ऊपर उठने के बाद । यानी हंस जब ऊर्ध्व में उठता है । और कुछ मंजिले तय कर लेता है । तब " अणु दीक्षा " होती है । इसके अनुभव..अपलक समाधि..सूक्ष्म शरीर से यात्रा करना..यानी स्थूल शरीर से निकलने की कला..सूक्ष्म लोकों की यात्रा..उच्च मंडलो के देव पुरुषों से भेंट..महाशक्तियों से भेंट होना..विभिन्न प्रकार की महा शक्तियों का साधक में लय होना । इसीलिये इसे लय योग भी कहा जाता है । इस स्थिति में प्रकृति कैसे कार्य कर रही है ..यह आपको खुली आँखो और बन्द आँखो से भी दिखाई देता है । साधक ध्यान में हो । या साधारण बैठा चाय आदि पी रहा हो । प्रकृति के रहस्य उसके सामने खुली किताब की तरह होते हैं । इसमें मुख्य बात ये होती है । कि अद्रश्य अणु परमाणु आसानी से दिखायी देते है । यहाँ तक पहुँचने बाला साधक अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है । और जनसामान्य की निगाह में साधारण जीवन जीते हुये वह वास्तव में परमात्मा का प्रतिनिधि हो जाता है । और बङे से बङे कार्य करने में सक्षम होता है । जो आमतौर पर देवताओं की भी शक्ति से बाहर होते हैं । इससे अधिक इस दीक्षा के रहस्य नहीं बताये जा सकते ।
4-- यह परीक्षा संयम और सदाचार से उत्तीर्ण कर लेने के बाद " परमहंस दीक्षा " होती है । यहाँ पहुँचकर साधक " संत " स्थिति से ऊपर उठ जाता है । और फ़क्कङ स्थिति में पहुँच जाता है । बङी बङी शक्तियां हाथ जोङे उसके पीछे पीछे चलती है ( अद्रश्य रूप में ) " हद टपे से औलिया..बेहद टपे सो पीर..हद बेहद दोनों टपे उसका नाम फ़कीर " वास्तव में फ़क्कङ स्थिति के बारे में लिखना आसान बात नहीं हैं । केवल इतना समझ लें कि इसका आदेश टाल सके । ऐसी शक्ति किसी के पास नहीं होती । यह " मौजी फ़कीर " सारा ग्यान ध्यान छोङकर निरंतर परमात्मा के टच में होता है । और अपनी मर्जी का मालिक होता है । इसका आदेश हर हालत में महाशक्तियों तक को मानना होता है । इस पर किसी का कोई नियम कानून नहीं चलता । पर यह गुप्त होता है । आपके सामने या आपके पङोस में रह रहा हो । पर आप इसकी मर्जी के बिना इसको नहीं जान सकते ।..परमहंस ग्यान अंत में परमात्मा से " एकीकरण " कर देता है । इसके बीच में " सार शब्द " आदि बहुत सी बातें हैं । जो गुप्त है । जो स्थिति प्राप्त साधक को ही बतायी जातीं हैं । अंत में " जब हंसा " परमहंस हुय जावे..तब पारब्रह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे । "
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