21 फ़रवरी 2014

काल को जरा भी दया नहीं है

ये परेशानी अक्सर लोगों को हो जाती है । जिसका आधुनिक ऐलोपैथी आदि चिकित्सा में कोई निदान नहीं है । और न ही आयुर्वेद आदि में कोई औषधीय निदान तुरन्त लाभ हेतु है । ये सामान्य सी परेशानी इतनी खतरनाक है कि पीङित मिनट मिनट पर शौच हेतु भागता है । और कुछ खा पी भी नहीं सकता । हालांकि खुद के व्यक्तिगत अनुभव में मैं इसे बहुत सरलता से स्वयं ( निम्न विधि से नहीं ) ही उंगलियों के मध्यम दबाव और घुमाव से सही कर लेता हूँ । पर वह, शायद सब न कर पायें । लेकिन निम्न विधि का हमारे चिन्ताहरण आश्रम में कई जानकार खूब प्रयोग करते हैं । क्योंकि ये सादा और सरल है । औषधि नहीं । जो रियेक्शन का खतरा हो । अतः जनहितार्थ इसको साझा किया है ।
नाभि का टल जाना ( धरण पड़ना ) लेटकर नाभि को दबाकर महसूस करें । तो छोटी सी गेंद जैसी कोई चीज़ धड़कती महसूस होती है । यदि ये धड़कन ठीक नाभि के नीचे हो । तो सही मानी जाती है । यदि इधर उधर हो । तो कब्ज़, दस्त की शिकायत होती है । नाभि हमारे शरीर की 72000 नाड़ियों का संगम है । इसी कारण सारा शरीर प्रभावित होता है । धरण ठीक करने के सैकड़ों तरीके सदियों से प्रभावी रूप में प्रचलित हैं । जिनमें से सबसे आसन तरीका बता रहे हैं । जो तुरंत परिणाम देता है । धरण जांचने का तरीका ये है कि - अपने दोनों हाथों की रेखाएं मिलाकर छोटी उंगली की

लम्बाई चैक करें । अंतर दिखने पर धरण की पुष्टि होती है । तब पीठ के बल लेट जाएं । दोनों पैरों को 90 डिगरी एंगल पर जोड़ें । आप देखेंगे कि 1 पैर छोटा है । 1 बड़ा है । ये टली नाभि जांचने के तरीके हैं । पुष्टि होने पर इसे ठीक करने के लिए । छोटे पैर की टांग को धीरे धीरे ऊपर उठायें । 6-7-8-9  इंच तक उठायें । फिर धीरे धीरे ही नीचे रखकर लम्बा सांस लें । यही क्रिया 2 बार और करें । ये क्रिया सुबह शाम ख़ाली पेट करनी चाहिए । पैरों को फिर मिलाकर देखें । दोनों अंगूठे बराबर दिखेंगे । यानी आपकी नाभि सही जगह पर बैठ गयी है । फिर उठकर 20 ग्राम गुङ 20 ग्राम सौंफ का बनाया चूरन फांक लें - पानी से । इससे पुरानी से पुरानी धरण आप खुद महीना 2 महीने में ठीक कर सकते है । पेट को कभी भी मसलवाना नहीं चाहिए ।
साभार - आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ।
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समस्या से समाधान की ओर - समस्याओं से दूर भागने के कारण ही हम दुखी रहते हैं । त्वरित समाधान पाने के बजाय यदि हम समस्याओं के भीतर उतरें । तो समाधान हमारे सामने होगा । हम सभी अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान चाहते हैं । हम सभी आम लोग हैं । भले ही हम सामाजिक या धार्मिक रूप से कितने ही उच्च पद पर आसीन हों । लेकिन हमारी रोजाना की आम जिंदगी में छोटी छोटी परेशानियां और शिकायतें बनी रहती हैं । जैसे - जलन, गुस्सा, हमें कोई प्यार नहीं करता । इस बात का दुख । यदि आप जीवन की इन छोटी छोटी चीजों को समझ सकें । तो आप इनमें अपने दिल दिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगे । खुशी गम, विपत्ति, आशा निराशा की इन स्थितियों को यदि बहुत ही धैर्यपूर्वक, बिना प्रशंसा या निंदा करते हुए, सचेत रहते हुए, बिना कोई फैसला किए आप देखते हैं । तो आपका मन समस्या की गहराई में उतर जाता है । लेकिन यदि आप किसी समस्या विशेष से निजात पाने के पहलू से ही सरोकार रखते हैं । तो आपका मन बहुत ही सतही स्तर पर बना रहता है । ईर्ष्या जलन की समस्या को ही लें । ईर्ष्या लोभ से उपजती है । आपके पास कुछ है । मेरे पास नहीं है । आप कुछ हैं । मैं कुछ भी नहीं हूं । आपके पास अधिक ज्ञान है । अधिक धन दौलत है । अधिक अनुभव है । मेरे पास नहीं है । आप हमेशा आगे ही बढ़ते चले जाते हैं । और मैं हमेशा नीचे की ओर गिरता चला जाता हूं । इस प्रकार यह चिर स्थायी संघर्ष बना रहता है । यदि हम देख सकें । तो इन सभी संघर्ष के, इन सभी दुख 

पीड़ाओं के और रोजाना की अन्य कई छोटी छोटी बातों के असंख्य निहितार्थ हैं ।
इनके समाधान के लिए आपको वेद पुराण या धार्मिक किताबें पढ़ने की कतई आवश्यकता नहीं है । आप इन सबको 1 तरफ रख दें । इनका कोई महत्व नहीं है । महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने जीवन की इन छोटी छोटी समस्याओं को उनकी वास्तविकता में देखें । उनसे सीधे साक्षात्कार करें । तो यही चीजें आपको समस्या में छुपे तथ्यों से अलग रूप में साक्षात्कार कराएंगी । यह बात ध्यान रखें कि जब आप किसी वृक्ष का सौंदर्य देखते हैं । उड़ती हुई चिड़िया देखते हैं । सूर्यास्त या लहराता हुआ जल देखते हैं । तो ये सब आपको बहुत कुछ बताते हैं । और जब आप जीवन की कुरूप चीजें देखें - धूल, गंदगी, निराशा, अत्याचार, भय को, तो ये सब भी विचार की मूलभूत प्रक्रिया से परिचित कराते हैं । जिस प्रकार आप प्रिय चीजों को गहराई से देखते हैं । उसी प्रकार अप्रिय चीजों को भी देखें । यदि मन केवल पलायन से ही सरोकार रखता है । किसी रामबाण उपाय की तलाश में रहता है । तब वह अन्वेषण से बचना चाहता है । तब हम इन सबके प्रति कदापि सचेत नहीं हो सकते । दुर्भाग्य से हमारे पास धैर्य नहीं है । हम त्वरित जवाब चाहते हैं । समाधान चाहते हैं । हमारा मन समस्या के प्रति बहुत ही बेसब्र है । अधैर्यपूर्ण है । लेकिन यदि मन समस्या से दूर भागने के बजाय उसका अवलोकन करने में सक्षम हो सके । उसके साथ जी सके । तब यही समस्या उसके सामने अपने सारे अदभुत गुण धर्मों को खोलती चली जाएगी । तब मन समस्या की गहराई तक जा सकेगा । ऐसी स्थिति में मन कोई ऐसी चीज नहीं रह जाएगा । जो परिस्थितियों, समस्याओं, विपत्तियों द्वारा परेशान हो जाए । तब मन जल से आपूरित एक शांत स्निग्ध ताल की तरह हो जाएगा । और केवल ऐसा ही मन निश्चलता और शांति में सक्षम हो सकता है ।
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सत्य असीम है - शब्दों या शास्त्रों की सीमा में सत्य नहीं है । असल में जहां सीमा है । वहीं सत्य नहीं है । सत्य तो असीम है । उसे जानने को बुद्धि और विचारों की परिधि को तोड़ना आवश्यक है । असीम होकर ही असीम को जाना जाता है । विचार के घेरे से मुक्त होते ही चेतना असीम हो जाती है । वैसे ही जैसे मिट्टी के घड़े को फोड़ दें । तो उसके भीतर का आकाश असीम आकाश से 1 हो जाता है । सूर्य आकाश के मध्य में आ गया था । 1 सुंदर हंस 1 सागर से दूसरे सागर की ओर उड़ा जा रहा था । लंबी यात्रा और धूप की थकान से वह भूमि पर उतरकर 1 कुएं की पाट पर विश्राम करने लगा । वह बैठ भी नहीं पाया था कि कुएं के भीतर से 1 मेंढक की आवाज आयी - मित्र, तुम कौन हो । और कहां से आए हो ? वह हंस बोला - मैं 1 अत्यंत दरिद्र हंस हूं । और सागर पर मेरा निवास है । मेंढक का सागर से परिचित व्यक्ति से पहला ही मिलन था । वह पूछने लगा - सागर कितना बड़ा है ? हंस ने कहा - असीम । इस पर मेंढक ने पानी में 1 छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ? वह हंस हंसने लगा । और बोला - प्यारे मेंढक, नहीं । सागर इससे अनंत गुना बड़ा है । इस पर मेंढक ने 1 और बड़ी छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ? उत्तर फिर भी नकारात्मक पाकर मेंढक ने कुएं की पूर्ण परिधि में कूदकर चक्कर लगाया । और पूछा - अब तो ठीक है । सागर इससे बड़ा और क्या होगा ? उसकी आंखों में विश्वास की झलक थी । और इस बार उत्तर के नकारात्मक होने की उसे कोई आशा न थी । लेकिन उस हंस ने पुन: कहा - नहीं मित्र ! नहीं । तुम्हारे कुएं से सागर को मापने का कोई उपाय नहीं है । इस पर मेंढक तिरस्कार से हंसने लगा । और बोला - महानुभाव, असत्य की भी सीमा होती है ? मेरे संसार से बड़ा सागर कभी भी नहीं हो सकता । मैं सत्य के खोजियों से क्या कहता हूं । कहता हूं । सत्य के सागर को जानना है । तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ । बुद्धि से सत्य को पाने का कोई उपाय नहीं । वह अमाप है । उसे तो वही पाता है । जो स्वयं के सब बांध तोड़ देता है । उनके कारण ही बाधा है । उनके मिटते ही सत्य जाना ही नहीं जाता । वरन उससे एक्य हो जाता है । उससे 1 हो जाना ही उसे जानना है ।
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काल निर्दयी है - इसका अर्थ यह है कि समय आपकी चिंता नहीं करता । इसलिए इस भरोसे मत बैठे रहना कि आज नहीं कल कर लेंगे । कल नहीं परसों कर लेंगे । पोस्टपोन मत करना । स्थगित मत करना । क्योंकि जिसके भरोसे स्थगित कर रहे हो । उसको जरा भी दया नहीं है । एक विचार ।
स्पष्टीकरण - निर्दयता काल के लिये कहा गया है । काल नियम में बंधा है । सिर्फ़ एक जीव पर ( काल ) दया करने से पूरा तंत्र बिखर जाता है । हालांकि यहाँ यदि ( काल क्षेत्र में ) दया के बजाय उपचार शब्द प्रयोग किया जाये । तो बात समझना आसान हो जाती है । और " सुबह " का भाव अकाल ( से जुङाव ) के लिये है । यानी अकाल काल को मार देगा । और नयी सुबह होगी ही होगी । आप जानते ही हैं । काल की तो औकात क्या अकाल के सामने महाकाल को भी मरना होता है । दोनों थर थर कांपते हैं । राजीव कुलश्रेष्ठ ।
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महाशंख माला क्या है ? जब भी आपके सामने ऐसा कोई असांसारिक अव्यवहारिक सा शब्द आये । तो पहले उसका स्रोत और उत्पादक स्थल या व्यक्ति के बारे में प्रश्न करें । क्योंकि ऐसी बहुत सी चीजें प्रचलन में हैं । वास्तव में जिनका हकीकी स्तर पर कोई अस्तित्व ही नहीं है । फ़िर भी ध्यान रखें । जहाँ भी किसी भी चीज में महा शब्द जुङ जाये । वह मानवीय स्तर का नहीं है । जाहिर है । वह सूक्ष्म या अलौकिकता से जुङा है । और तब स्थूल धरा पर उसका प्रतीक तो माना जा सकता है । पर वास्तविकता नहीं । ध्यान की क्रियाओं में घंटा शंख बांसुरी ज्योति आदि देखने सुनने के अनुभव होते हैं । ऐसे ही किसी विषय में ये शंख माला की बात भाव अनुसार कही होगी । जिस प्रकार गणेश - महा गणेश । विष्णु - महा - विष्णु । इन्द्र - महा इन्द्र आदि आदि ये सादा और महा दोनों अलग अलग हैं । पर आम लोग इनके बारे में जानकारी नहीं रखते ।

When heart Cry, tears wipe out like waves of unforgettable memories of beloved, for beloved and to beloved, It craves for irreversible past . and ends in silent occean ( Sufiyana )
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