31 अगस्त 2010

क्योँकि मेरा ईश्वर प्रकृति मेँ ही छिपा है

नित उस सतगुरू, परमात्मा का धन्यवाद करें । क्योंकि तुम्हें 1 ने जीवन दिया है । तो दूसरे ने मुक्ति का मार्ग दिया है । मुक्त होने के लिये दोनों की परम आवश्कता है । सतगुरू के माध्यम से ही हम उस परमात्मा तक पहुँच कर मुक्त हो सकते हैं । और मुक्ति जीते जी ही होती है । मरने के बाद मुक्त होना संभव नही है । अर्थात कोई मुक्ति नही होती है । क्योंकि मुक्त तो स्वयं को ही होना पड़ता है । किसी के द्वारा कोई आज तक मुक्त नहीं हो सका है । और यदि कोई ऐसा कहता है । सब झूठ है । असत्य है ।  नाद ब्रह्म ध्यान योग धाम आश्रम इन्दौर
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अध्यात्म में प्रायः लोग बहुत वाद विवाद करते रहते हैं । क्योंकि वे किसी से सुनकर । कही से पढकर । पाये हुए उधार के ज्ञान के आधार पर वाद विवाद करते हैं । उन्हें वास्तविक अनुभव होता नहीं । क्योंकि जिसको भी अध्यात्म को, परमात्मा को जानने की ललक होती है । प्यास होती है । वे वाद विवाद में नहीं पड़ते । पर जिनकी प्यास कच्ची होती है । ज्ञान अधकचरा होता है । वे ही वाद विवाद में पड़ते हैं । ऐसे लोग अपने साथ साथ उन ज्ञानियों का समय भी बर्बाद करते हैं । और जो ज्ञान उनको उनसे मिल सकता था । जो जिज्ञासायें उनकी उनसे शांत हो सकती थीं । उनसे वे वंचित रह जाते हैं । अपना व उनका बहुमूल्य समय का नुकसान कर लेते हैं । नाद ब्रह्म ध्यान योग धाम आश्रम इन्दौर ।
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मन काम क्रोध मद लोभ मांहि है अटका ।
मम जीव आज लगि लाख योनि है भटका ।
अब आवागमन छुड़ाय नाथ मोहि तारो ।
अब कृपा करो श्रीराम नाथ दुख टारो । 
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आत्मा का अपने साथ बातचीत करना ही मनन है - प्लेटो ।
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फूल जब खिलते हैँ । तो मैँ जानता हूँ - ईश्वर खिला । और जब रात तारोँ से भर जाती है । तो मैँ जानता हूँ । ईश्वर ही अनंत अनंत तारोँ मेँ छितर गया है । मेरा ईश्वर 1 काव्य है । मेरा ईश्वर 1 संगीत है । तुम्हेँ अगर मेरे ईश्वर से परिचित होना है । तो प्रकृति के करीब आओ । क्योँकि मेरा ईश्वर प्रकृति मेँ ही छिपा है । प्रकृत्ति उसका घूंघट है । उठाओ घूंघट । और तुम मालिक को पाओगे । जहाँ भी घूंघट उठाओगे । उसी को पाओगे ।
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ध्यान के ये प्रयोग मस्तिष्क पर तनाव डालते हैं । क्या समाधि के लिए विश्राम उचित न होगा ? ओशो - बिलकुल उचित है । बिलकुल जरूरी है । असल में समाधि विश्राम में ही उपलब्ध होती है । लेकिन हममें से अधिक लोग विश्राम भूल ही गए हैं । हम सिर्फ तनाव ही जानते हैं । तो हमारे लिए विश्राम का 1 ही रास्ता है कि हम पूर्ण तनाव को उपलब्ध हो जाएं । जिसके आगे और तनाव संभव न हो । उस क्लाइमेक्स पर चले जाएं - टेंशन और तनाव की । जिसके आगे और तनने का उपाय न रहे । बस उसके बाद अचानक आप पाएंगे कि शिथिलता आ गई । और विश्राम उपलब्ध हुआ । अगर मैं इस मुट्ठी को बांधता चला जाऊं ।
बांधता चला जाऊं । जितनी मेरी ताकत है । तो 1 जगह मैं पाऊंगा कि मुट्ठी खुल गई । जहां मेरी ताकत पूरी हो जाएगी । वहीं मुट्ठी खुल जाएगी । समाधि तो विश्राम में ही उपलब्ध होगी । लेकिन विश्राम में जाने के लिए आपको पूरे तनाव से गुजरना पड़ेगा । तनाव हमारी आदत है । जैसे कि कोई आदमी रुक न सकता हो । तो उसे दौड़ाना पड़े । और वह दौड़ कर थक जाए । और फिर रुकने के सिवाय कोई उपाय न रहे । और वह रुक जाए । ठीक ऐसे ही । यह जो प्रयोग हैं । रिलैक्सेशन थ्रू
टेंशन हैं । यह जो प्रयोग है । यह तनाव के द्वारा विश्राम का प्रयोग है । सौ में से शायद एकाध आदमी इस स्थिति में है कि सीधा विश्राम में, सीधा रिलैक्सेशन में जा सके । 99 आदमी इस स्थिति में नहीं हैं । ये 99 आदमी इतने तनाव में हैं कि अगर ये विश्राम की भी कोशिश करेंगे । तो वह भी इनके लिए 1 तनाव ही होने वाली है ।  और कुछ नहीं होने वाला है । समझ लें कि 1 आदमी को रात में नींद  नहीं आ रही है । उसके पास 2 उपाय हैं । 1 तो वह नींद लाने की कोशिश करे । नींद लाने की कोशिश में क्या करेगा ? बिस्तर पर लेटे । आंख बंद करे । करवट बदले । लाइट बुझाए । यह करे । इस कोशिश से नींद शायद ही आए । क्योंकि नींद कोशिश से कभी नहीं आती । सब कोशिश नींद में बाधा बन जाती है । असल में नींद का मतलब यह है कि जब आप और कोई कोशिश करने में समर्थ नहीं रहे । तब नींद आती है । जब तक आप कोशिश कर सकते हैं । तब तक नींद नहीं आती । तो यह रास्ता नहीं होगा । अगर 1 आदमी को नींद नहीं आ रही । तो बेहतर है कि एक 4 मील का चक्कर लगा आए । दौड़ कर, तनाव पूरा दे दे । इतना थक जाए कि कोशिश करने के लायक भी उपाय न रहे । बिस्तर पर लेटे । तो करवट बदलने की भी इच्छा न रह जाए । तो नींद आ जाएगी । सीधे नींद लाना मुश्किल है । नींद के लाने का परोक्ष रास्ता है । इनडायरेक्ट । और वह है - थक जाना ।
तो ये जो ध्यान के पहले 3 चरण हैं । वे तनाव के हैं । और चौथा जो चरण है । वह विश्राम का है । इसलिए मैं कहता हूं कि जो 3 में पूरी तरह दौड़ेगा । और पूरी तरह थक जाएगा । वह चौथे को गहराई में
उपलब्ध होगा । जो 3 में कंजूसी कर जाएंगे । चौथे चरण में वे इतने थके नहीं होंगे कि विश्राम को उपलब्ध हो सकें । इसलिए 3 में अपने को पूरी तरह थका ही डालना है । ओशो 
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7 तलों में योग मनुष्य को बांटता है । 7 केंद्रों में । सप्त चक्रों में मनुष्य के व्यक्तित्व को बांटता है । इन सातों चक्रों पर अनंत ऊर्जा और शक्ति सोई हुई है । जैसे 1 कली में फूल बंद होता है । कली देखकर पता भी नहीं चलता कि इसके भीतर ऐसा फूल होगा । ऐसा कमल खिलेगा । इतने दलों वाला कमल प्रकट होगा । कली तो बंद होती है । अगर किसी ने सिर्फ कमल की कलियां ही देखी हों । और कभी फूल न देखा हो । तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता कि यह कली और फूल बन सकती है ? हमारे पास जितने चक्र हैं । वे कलियों की तरह बंद हैं । अगर वे खिल जाएं पूरे । तो हमें पता भी नहीं कि उनके भीतर क्या क्या छिपा हो सकता है - कितनी सुगंध । कितना सौंदर्य । कितनी शक्ति । 1-1 चक्र के पास अनंत सौंदर्य । अनंत शक्ति छिपी है । वह लेकिन कलियां खिलें । तो प्रकट हो सकती है । न खिलें । तो प्रकट नहीं हो सकती । कभी आपने कमल की कलियों को खिलते देखा है ? कब खिलती हैं ? सूरज जब निकलता है । सुबह और रोशनी छा जाती है । तब रात के अंधेरे में बंद कलियां सुबह खिल जाती हैं सूरज के साथ । ठीक ऐसे ही जिस दिन हमारी चेतना का सूर्य 1-1 केंद्र पर प्रकट होता है । तो 1-1 केंद्र की कली खिलनी शुरू हो जाती है । भीतर भी हमारी चेतना का सूर्य है । उसके पहुंचने से । उसे हम ध्यान कहें । या और कोई नाम दें । इससे फर्क नहीं पड़ता । हमारे भीतर होश का 1 सूर्य है । उसका प्रकाश जिस केंद्र पर पड़ता है । उसकी कली खिल जाती है चटक कर । और फूल बन जाती है । और उसके फूल बनते ही हम पाते हैं कि अनंत शक्तियां हममें छिपी पड़ी थीं । वे प्रकट होनी शुरू हो गईं । ये जो 7 चक्र हैं । यह प्रत्येक चक्र खोला जा सकता है । और प्रत्येक चक्र की अपनी क्षमताएं हैं । और जब सातों खुल जाते हैं । तो व्यक्ति के द्वार दरवाजे । जिनकी मैं कल बात कर रहा था । वे अनंत के लिए खुल जाते हैं । व्यक्ति तब अनंत के साथ 1 हो जाता है । ओशो
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ओशो और नेहरु - जीवन में पहली बार मैं हैरान रह गया । क्योंकि मैं तो 1 राजनीतिज्ञ से मिलने गया था । और जिसे मैं मिला । वह राजनीतिज्ञ नहीं । वरन कवि था । जवाहर लाल राजनीतिज्ञ नहीं थे । अफसोस है कि वह अपने सपनों को साकार नहीं कर सके । किंतु चाहे कोई खेद प्रकट करे । चाहे कोई वाह वाह कहे । कवि सदा असफल ही रहता है । यहां तक कि अपनी कविता में भी वह असफल होता है । असफल होना ही उसकी नियति है । क्योंकि वह तारों को पाने की इच्छा करता है । वह क्षुद्र चीजों से संतुष्ट नहीं हो सकता । वह समूचे आकाश को अपने हाथों में लेना चाहता है । 1 क्षण के लिए हमने एक दूसरे की आंखों में देखा । आँख से आँख मिली । और हम दोनों हंस पड़े । और उनकी हंसी किसी बूढ़े आदमी की हंसी नहीं थी । वह 1 बच्चे की हंसी थी । वे अत्यंत सुदंर थे । और मैं जो कह रहा हूं । वही इसका तात्पर्य है । मैंने हजारों सुंदर लोगो को देखा है । किंतु बिना किसी झिझक के मैं यह कह सकता हूं कि वह उनमें से सबसे अधिक सुंदर थे । केवल शरीर ही सुंदर नहीं था उनका । अभी भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि 1 प्रधानमंत्री उस तरह से बातचीत कर सकते हैं । वे सिर्फ ध्यान से सुन रहे थे । और बीच बीच में प्रश्न पूछकर उस चर्चा को और आगे बढा रहे थे । ऐसा लग रहा था । जैसे वे चर्चा को सदा के लिए जारी रखना चाहते थे । कई बार प्रधानमंत्री के सैक्रेटरी ने दरवाजा खोल कर अंदर झांका । परंतु जवाहरलाल समझदार व्यक्ति थे । उन्होंने जानबूझ कर दरवाजे की ओर पीठ की हुई थी । सैक्रेटरी को केवल उनकी पीठ ही दिखाई पड़ती थी । परंतु उस समय जवाहरलाल को किसी की भी परवाह नहीं थी । उस समय तो वे केवल विपस्सना ध्यान के बारे में जानना चाहते थे । जवाहरलाल तो इतने हंसे कि उनकी आंखों में आंसू आ गए । सच्चे कवि का यही गुण है । साधारण कवि ऐसा नहीं होता । साधारण कवियों को तो आसानी से खरीदा जा सकता है । शायद पश्चिम में इनकी कीमत अधिक हो । अन्यथा 1 डालर में 1 दर्जन मिल जाते हैं । जवाहरलाल इस प्रकार के कवि नहीं थे । 1 डालर में 1 दर्जन । वे तो सच में उन दुर्लभ आत्माओं में से 1 थे । जिनको बुद्ध ने बोधिसत्व कहा है । मैं उन्हें बोधिसत्व कहूंगा । मुझे आश्चर्य था । और आज भी है कि वे प्रधानमंत्री कैसे बन गए ? भारत का यह प्रथम प्रधानमंत्री बाद के प्रधानमंत्रियों से बिलकुल ही अलग था । वे लोगों की भीड़ द्वारा निर्वाचित नहीं किए गए थे । वे निर्वाचित उम्मीदवार नहीं थे । उन्हें महात्मा गांधी ने चुना था । वे महात्मा गांधी की पंसद थे । और इस प्रकार 1 कवि प्रधानमंत्री बन गया । नहीं तो 1 कवि का प्रधानमंत्री बनना असंभव है । परंतु 1 प्रधानमंत्री का कवि बनना भी संभव है । जब वह पागल हो जाए । किंतु यह वही बात नहीं है ।  तो मैं ने सोचा था कि जवाहरलाल तो केवल राजनीति के बारे में ही बात करेंगे । किंतु वे तो चर्चा कर रहे थे - काव्य की और काव्यात्मक अनुभूति की । ओशो

Who is your Guru  ? questioned a spiritually inclined friend. 
- I am yet to know. I replied with all honesty.
- If that be so, shall I take you to mine, was his instant response.
All I could do was smile and thank his kind gesture of trying to introduce one more to his tribe, while adding, "The disciple is never so capable of finding the true Guru. It's the other way round; the Guru shall find the true disciple. When the flower blooms, the bees will come of it's own accord.
Be true to yourself and to the path; help will come, when it's needed the most.


I'm Nobody ! Who are you ?  Are you - Nobody - too ?
Then there's a pair of us !  Don't tell! they'd advertise - you know !
How dreary - to be - Somebody !
How public - like a Frog - 
To tell one's name - the livelong June -  To an admiring Bog!
Emily Dickinson

Emptiness -  You are so addicted and you have become so habituated that you cannot allow the cup to be empty even for a single moment. The moment you see emptiness anywhere you start filling it. You are so scared of emptiness, you are so afraid : emptiness appears like death. You will fill it with anything, but you will fill it.   Osho
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