10 अगस्त 2010

वह मनुष्य निश्चय ही नारकीय जीव है

अपने हित अहित का विचार न करते हुये जो नित्य ही कुपथ पर जा रहा है । जिसका उद्देश्य लक्ष्य केवल पेट भरना ही है । वह मनुष्य निश्चय ही नारकीय जीव है । निद्रा । भय । मैथुन । आहार की इच्छा सभी प्राणियों में समान रूप से होती है । इसमें ज्ञानी को मनुष्य और अज्ञानी को पशु माना गया है । मूर्ख व्यक्ति प्रातकाल मल मूत्र । दोपहर में भूख प्यास । रात में मैथुन और नींद से ग्रस्त और पीडित रहते हैं । ये बडे दुख की बात है कि इसी अज्ञान से मोहित होकर प्राणी अपने शरीर धन और स्त्री आदि में अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं । और मर जाते हैं । अतः व्यक्ति को इस तरह की आसक्ति का निश्चय ही त्याग करना चाहिये । यदि आसक्ति छोडने में कठिनाई महसूस हो रही हो । तो महापुरुषों के साथ अपनी आसक्ति जोड देनी चाहिये । क्योंकि आसक्ति रूपी रोग का इलाज ज्ञानियों के पास ही होता है । सतसंग और विवेक ये दो मनुष्य के मल रहित । स्वस्थ नेत्र हैं । जिसके पास ये दो नेत्र नहीं हैं । वह मनुष्य निश्चय ही अन्धा है । इसलिये वो कुमार्ग रूपी गड्डे में गिरता है । तो आश्चर्य किस बात का हो । अपने अपने धर्म को । अपनी जाति को मानने वाले । दूसरे के धर्म को नहीं जानते । किन्तु वे दम्भ के वशीभूत हो जांय । तो अपना ही नाश करते हैं । वृत पूजा में लगे हुये प्रयास करने वाले कुछ लोगों से भी क्या होगा । क्योंकि वे भी अपने आत्मतत्व को जाने बिना एक प्रचारक की तरह बनकर देश विदेश का विचरण ही तो करते हैं । नाम मात्र से स्वयं में संतुष्ट कर्म कान्डों में लगे हुये मनुष्य । मन्त्रोच्चार होम आदि से युक्त याज्ञिक क्रियाओं से भ्रमित हो गये हैं । और प्रभु की माया से मोहित होकर मूर्ख लोग शरीर को सुखा देने वाले एक भक्त तथा उपवास आदि से । व्यर्थ के नियमों से अपने पुण्य रूप फ़ल और अज्ञात दुर्लभ प्राप्ति की कामना ही करते हैं । जो महज झूठ हैं । शरीर को ताडना देने से क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? इस अज्ञान से क्या मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?
क्या बांबी को पीटने से जहरीला नाग मर जायेगा ? जटायें बडा लेने वाले । मृग आदि की खाल पहनकर वेश बना लेने वाले जो दम्भी ज्ञानियों की भांति इस संसार में विचरण करते हैं । और लोगों को भ्रमित करते हैं । तमाम तरह के लौकिक सुख ( संसारी की तरह ) में स्वयं जिनकी आसक्ति है । और । मैं ब्रह्म को जानता हूं । ऐसा कहने वाले कर्म तथा ब्रह्म । इन दोनों से ही भृष्ट हो चुके दम्भी और ढोंगी का त्याग करने में क्षण भर भी नहीं सोचना चाहिये । घर और समाज को वन के समान मानकर जो साधु गधे और अन्य पशुओं की भांति निर्वस्त्र और लज्जा रहित होकर घूमते रहते हैं । क्या वे विरक्त होते हैं । हरगिज नही होते । यदि मिट्टी । भस्म तथा धूल का लेप करने से कोई मनुष्य मुक्त हो सकता है । तो क्या मिट्टी और भस्म में ही हमेशा रहने वाला कुत्ता क्यों नहीं मुक्त होगा ? वनवासी । तपसी । घास । फ़ूस पत्ता । तथा जल का ही सेवन करते हैं । तो क्या इन्हीं के समान वन में रहने वाले चूहे । हिरन । सियार आदि जीव जन्तु भी तपस्वी हो सकते हैं ? जन्म से लेकर मृत्यु तक गंगा आदि पवित्र नदियों मे ही रहने वाले मेढक । मछली आदि जलचर जीव क्या योगी हो सकते हैं ? कबूतर । शिलाहार । चातक पक्षी कभी भी प्रथ्वी का जल नही पीते । तो क्या उनका वृती होना सम्भव है ? इसलिये ये नित्य आदि कर्म लोक रंजन के कारक ही हैं । मोक्ष का कारण तो एकमात्र तत्व ज्ञान और आत्म ज्ञान ही है । वास्तविक मुक्ति उसी से सम्भव है ।
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