31 अगस्त 2010

कबीर उसको ही सुरति कहते हैं

जैसे माला के मनकों में धागा अनुस्यूत होता है । मनके दिखाई पड़ते हैं । धागा दिखाई नहीं पड़ता । वह है - होश । कबीर उसको ही सुरति कहते हैं । और जिस व्यक्ति का होश सध जाए । फिर उसे कोई असहज काम नहीं करना पड़ता - उलटा सीधा । कबीर कहते हैं - न तो मैं नाक बंद करता । न आंख बंद करता । न उलटी सीधी सांस लेता । न प्राणायाम करता । न उलटा सिर पर खड़ा होता । न शीर्षासन करता । कुछ भी नहीं करता । सिर्फ होश को सम्हालकर रखता हूं । सिर्फ सुरति को बनाए रखता हूं । बस, सुरति का दीया भीतर जलता रहता है । और जीवन पवित्र हो जाता है । सुरति का दीया भीतर जलते जलते 1 ऐसी घड़ी आती है । जब निष्कंप हो जाता है । उस घड़ी का नाम है - समाधि । शुरू शुरू में सुरति का दीया कंपता है । पुरानी वासनाओं के झोंके आएंगे । पुरानी आदतों के झोंके आएंगे । पुराने संस्कार के झोंके आएंगे । बहुत बार दीया झुकेगा । कंपेगा । लौ कंपित होगी । जीवन भीतर चंचल रहेगा । भान कभी रहेगा । कभी छूटेगा । कभी होश सम्हलेगा । कभी नहीं भी सम्हलेगा । कभी गिरोगे । कभी उठोगे । शुरू में स्वाभाविक है । तो सुरति की 2 स्थितियां हैं । जब भीतर की चेतना कंपती रहती है । उस स्थिति का नाम है - ध्यान । और जब भीतर की चेतना अकंप हो जाती है । उस स्थिति का नाम है - समाधि ।  और कबीर कहते हैं - सहज ही सध जाती है । तुम व्यर्थ के उपद्रव क्यों कर रहे हो ? और यही मैं तुमसे भी कहता हूं । क्योंकि कबीर को भी सुनने वाले तुम ही थे । तुम ही हो । लेकिन तुम तरकीबें निकाल लेते हो । कबीर से बच जाते हो । बुद्ध से बच जाते हो । कृष्ण से बच जाते हो । तुम बचे चले जाते हो । बुद्ध ने जो स्त्री से बचने को कहा । वही तुम बुद्धों के साथ व्यवहार कर रहे हो । पहले तो बुद्ध दिखाई पड़े । तो बचकर निकल जाना । अगर मजबूरी आ जाए । और देखना ही पड़े । पास से निकलना पड़े । तो आंख झुकाकर निकल जाना । अगर फिर भी मजबूरी खड़ी हो जाए । और आंख भी न झुका पाओ । तो छूना मत । अगर छू भी लो । तो होश रखना कि - यह आदमी बुद्ध है । अछूत है । बीमारी है । यह तुम्हें मिटा डालेगा । इस भांति तुम चल रहे हो । इससे तुम चूकते गए हो । और जितना तुम चूकते हो । उतना ही तुम सोचते हो - कठिन होगा । कठिन होगा । तभी तो हम चूक रहे हैं । तुम चूक रहे हो - चालाकी से । सत्य कठिन नहीं है । तुम्हारी चालाकी बड़ी जटिल है - ओशो ।
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आप प्रेम के योग्य तभी होते हैं । जब आपको इसकी ज़रुरत नहीं रहती । जब आप अपने भीतर के आनंद में निमग्न हो जाते हैं । तो अस्तित्व आप पर प्रेम की तरह बरस जाता है । अस्तित्व दीनता को । भिखमंगे पन को पसंद नहीं करता । अस्तित्व सम्राट पैदा करता है । और सम्राटो को ही पसंद करता है । भीतर की संपदा हमे सम्राट बना देने को काफी से ज्यादा है ।
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जीवन तर्क नहीं है । जीवन प्रेम है ।  तर्क जटिल घटना है ।  प्रेम सरल है । प्रेम निर्दोष संवाद है ।  प्रेम जीवन के संगीत के अधिक करीब है - बजाय गणित के । क्योंकि गणित मन का है । और जीवन तुम्हारें हृदय की धड़कनों में धड़कता है -   ओशो
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स्वर्णिम बचपन - रजनीश का खडाऊं पहन कर स्कूल में आना चर्चा का विषय बन गया था । 1-2  बार टीचर ने भी टोका - रजनीश । यह आश्रम नहीं । स्कूल है । यहाँ खड़ाऊ पहनकर मत आया करो । यह स्कूल की मर्यादा के विरुद्ध है ।
रजनीश 2 टूक स्वर में बोला - मैं जानता हूँ कि आप कायदे कानून और नियमावली के बहुत पाबन्द हैं । क्या आप स्कूल नियमावली का वो क्लाज़ मुझे दिखा सकते हैं । जिसमें खडाऊं पहनकर स्कूल आने से मना किया हो । हैड मास्टर साहब मरे स्वर में बोले - जो लोग स्कूल के नियम बना रहे थे । उन्हें सपने में भी इस बात का गुमान न होगा कि कोई छात्र खडाऊं पहनकर भी स्कूल आ सकता है ।
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न तो मैं नाक बंद करता । न आंख बंद करता । न उलटी सीधी सांस लेता । न प्राणायाम करता । न उलटा सिर पर खड़ा होता । न शीर्षासन करता । कुछ भी नहीं करता । सिर्फ होश को सम्हालकर रखता हूं । सिर्फ सुरति को बनाए रखता हूं । बस, सुरति का दीया भीतर जलता रहता है । और जीवन पवित्र हो जाता है । सुरति का दीया भीतर जलते जलते 1 ऐसी घड़ी आती है । जब निष्कंप हो जाता है । उस घड़ी का नाम समाधि - कबीर ।
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आनन्द का अर्थ है - 1 परम मौन । और ऐसा मौन तभी संभव है । जब भीतर लयबद्धता हो । जब सारे बेमेल टुकड़ों का मेल हो जाये । वे 1 बन जायें । जब भीड़ न रहे । बल्कि केवल 1 ही हो । जब भीतर घर में कोई न हो । और तुम अकेले हो । तब तुम आनन्द से भर जाओगे । पर अभी तो हर एक तुम्हारे घर में है । तुम वहाँ हो नहीं । केवल मेहमान ही वहाँ है । मेजबान तो सदा ही अनुपस्थित है । और केवल मेजबान आनन्द मय हो सकता है ।
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