31 अगस्त 2010

पूरे शरीर को ऊर्जा से स्पंदित हो जाने दो

प्रार्थना ध्यान - अच्छा हो कि यह प्रार्थना ध्यान आप रात में करो । कमरे में अंधकार कर लें । और ध्यान खत्म होने के तुरंत बाद सो जाओ । या सुबह भी इसे किया जा सकता है । परंतु उसके बाद 15 मिनट का विश्राम जरूर करना चाहिए । वह विश्राम अनिवार्य है । अन्यथा तुम्हें लगेगा कि तुम नशे में हो । तंद्रा में हो । उर्जा में यह निमज्जन ही प्रार्थना ध्यान है । यह प्रार्थना तुम्हें बदल डालती है । और जब तुम बदलते हो । तो पूरा अस्तित्व भी बदल जाता है । दोनों हाथ ऊपर की और उठा लो । हथेलियां खुली हुई हों । सिर सीधा उठा हुआ रहे । अनुभव करो कि आस्तित्व तुममें प्रवाहित हो रहा है । जैसे ही ऊर्जा तुम्हारी बाँहों से होकर नीचे बहेगी । तुम्हें हलके हलके कंपन का अनुभव होगा । तुम हवा में कंपते हुए पत्ते की भांति हो जाओ । उस कंपन को होने दो । उसका सहयोग करो । फिर पूरे शरीर को ऊर्जा से स्पंदित हो जाने दो । और जो होता हो । उसे होने दो । अब पृथ्वी के साथ प्रवाहित होने का अनुभव करो । पृथ्वी और स्वर्ग । ऊपर और नीचे । यन और याँग । पुरूष और स्त्री । तुम बहो । तुम घुलो । तुम स्वयं को पूरी तरह छोड़ दो । तुम नहीं हो । तुम 1 हो जाओ । निमज्जित हो जाओ । 2 या 3 मिनट बाद । या जब भी तुम पूरी तरह भरे हुए अनुभव करो । तब तुम धरती की और झुक जाओ । और हथेलियों और माथे से उसे स्पर्श करो । तुम तो बस वाहन बन जाओ कि दिव्य ऊर्जा का पृथ्वी की ऊर्जा से मिलन हो सके । इन दोनों चरणों को 6 बार और दोहराओ । ताकि सभी चक्र खुल सकें । इन्हें अधिक बार किया जा सकता है । लेकिन कम करोगे । तो बेचैन अनुभव करोगे । और सो नहीं पाओगे । प्रार्थना की उस भाव दशा में ही सोओ । बस सो जाओ । और ऊर्जा बनी रहेगी । नींद में उतरते उतरते भी तुम उस ऊर्जा के साथ बहते रहोगे । यह गहन रूप से सहयोगी होगी । क्योंकि फिर ऊर्जा तुम्हें सारी रात घेरे रहेगी । और भीतर कार्य करती रहेगी । सुबह होते होते तुम इतने ज्यादा ताजे । इतने ज्यादा प्राणवान अनुभव करोगे । जितना तुमने पहले कभी भी अनुभव नहीं किया था । 1 नई सजीवता । 1 नया जीवन तुममें प्रवेश करने लगेगा । और पूरे दिन तुम 1 नई ऊर्जा से भरे अनुभव करोगे । 1 नई तरंग होगी । ह्रदय में 1 नया गीत और पैरों में 1 नया नृत्य होगा । ओशो
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प्रेम मुक्ति है - अहंकार और प्रेम में क्या संबंध हो सकता है ? प्रेम तो अहंकार का विसर्जन है । जब भी किसी के प्रति प्रेम उगमता है । तो उसके प्रति हम अपना अहंकार छोड़ देते हैं । हम उसके प्रति अपने को समर्पित कर देते हैं । फिर वह प्रेम साधारण जगत का हो । या भगवान के प्रति हो । मौलिक प्रक्रिया तो 1 ही है । जिस स्त्री को तुमने प्रेम किया । या जिस पुरुष को तुमने प्रेम किया । उस प्रेम में तुम्हें परित्याग क्या करना पड़ता है ? प्रेम मांगता क्या है ? प्रेम 1 ही चीज मांगता है कि मैं को समर्पित करो । और जब भी कोई पुरुष या स्त्री एक दूसरे के प्रति अपने को समर्पित कर देते हैं । तो उनके जीवन में बड़ी हरियाली के फूल खिलते हैं । बड़ी सुवास उठती है । मगर यह बहुत मुश्किल से होता है । क्योंकि आखिर पुरुष, पुरुष है । और स्त्री, स्त्री है । दोनों के लिए अपने मैं को । अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को समर्पित करना कठिन कार्य है । और कभी यह समर्पण जीवंत हो भी जाए । तो वह क्षणभंगुर ही होता है । उस क्षण में थोड़ी सी झलक मिलती है - रस की । मन थोड़ा सा मुग्ध हो जाता है । थोड़े प्राण आनंदित भी हो जाते हैं । मगर कुछ क्षणों के लिए । और फिर वही अंधेरी रात । इसलिए प्रेम में थोड़ा सुख भी । और बहुत ज्यादा दुख है । जिन्होंने प्रेम को जाना । उन्होंने सुख जाना ही नहीं । उन्होंने प्रेम में सुख से भी ज्यादा गहन दु:ख जाना । इसीलिए तो बहुत से लोग प्रेम में पड़ते ही नहीं । छोटे सुख से तो वे वंचित रह रहते हैं । मगर बड़े गहन दु:ख से भी बच जाते हैं । इसीलिए तो कई लोग सदियों सदियों तक जंगल में भाग गये हैं । संसार का क्या अर्थ होता है ? जहाँ प्रेम होने की संभावना हो । जहाँ प्रेम का अवसर हो । जहाँ दूसरा मौजूद हो । जहाँ न जाने कब किसी से मन मिल जाये । और न जाने कब किसी से राग जुड़ जाये । भाग जाओ । सदियों सदियों से साधु संत जंगलों में भागते रहे हैं । पहाड़ों में भागते रहे हैं । किससे भाग रहे हैं ? वे कहते हैं - संसार से भाग रहे हैं । मगर ऐसा होता नहीं । उनके मनोविज्ञान को समझो । वे संसार से नहीं । प्रेम से भाग रहे होते हैं । संसार प्रेम का ही दूसरा नाम हैं । लेकिन भागे हुए ये लोग बहुत अधिक अहंकारी होते हैं । इसीलिए तुम साधु संतों में जितना अहंकार देखोगे । वैसा अहंकार और कहीं नहीं दिखेगा । क्योंकि प्रेम जो मिटा सकता था उनके अहंकार को । उस प्रेम को तो वे छोड़कर चले गये । अब तो बीमारी ही रही । औषधि रही नहीं । मैं ऐसे सन्यास का समर्थक हूँ । जो प्रेम से भागता नहीं । वरन प्रेम के सत्य में जागता है । ऐसा सन्यास । जो प्रेम को शाश्वत सच्चाई की तरह स्वीकार करता है । जो संसार से । प्रेम से नहीं । बल्कि अहंकार से भागता है । अहंकार को त्यागता है । क्योंकि दु:ख प्रेम से नहीं आता । प्रेम से ही सुख आता है । भले ही क्षणभंगुर ही सही । मगर प्रेम चला जाता है । तो फिर अहंकार सिर उठाता है । इसीलिए मेरा सन्यास भिन्न है । जो तोड़ता नहीं । बल्कि सबसे जोड़ता है - ओशो ।
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निर्जरा - कर्म मल का झड़ जाना - आपके और आपके बच्चे के बीच तो भौतिक जगत फैला हुआ है । यह विचार किसी गहरे अर्थों में भौतिक ही होना चाहिए । अन्यथा इस भौतिक माध्यम को पार न कर पाएगा ।
यह जानकर आपको हैरानी होगी कि महावीर ने कर्म तक को भौतिक कहा है । फिजिकल कहा है । मैटीरियल कहा है । जब आप क्रोध करते हैं । और किसी की हत्या कर देते हैं । तो आपने 1 कर्म किया - क्रोध का । और हत्या करने का । महावीर कहते हैं - यह भी सूक्ष्म अणुओं में आपमें चिपक जाता है । कर्म मल बन जाता है । यह भी मैटीरियल है । यह भी कोई इम्मैटीरियल चीज नहीं है । यह भी मैटर की तरह पकड़ लेता है आपको । और इसलिए महावीर निर्जरा जिसको कहते हैं । वे निर्जरा कहते हैं । इस कर्म मल से जिस दिन छुटकारा हो जाए । यह सारा का सारा जो कर्म अणु आपके चारों तरफ जुड़ गए हैं । ये गिर जाएं । जिस दिन ये गिर जाएंगे । उस दिन आप शुद्धतम शेष रह जाएंगे । वह निर्जरा होगी । निर्जरा का मतलब है - कर्म के अणुओं का झड़ जाना । कर्म भी..जब आप क्रोध करते हैं । तब आप 1 कर्म कर रहे हैं । वह क्रोध भी आणविक होकर ही आपके साथ चलता है । इसलिए जब आपका यह शरीर गिर जाता है । तब भी उसको गिरने की जरूरत नहीं होती । वह दूसरे जन्म में भी आपके साथ खड़ा हो जाता है । क्योंकि वह अति सूक्ष्म है । तो मेंटल बॉडी जो है । मनस शरीर जो है । वह एस्ट्रल बॉडी का सूक्ष्मतम हिस्सा है । और इसलिए इन चारों में कहीं भी कोई खाली जगह नहीं है । ये सब एक दूसरे के सूक्ष्म होते गए हिस्से हैं । मेंटल बॉडी पर काफी काम हुआ है । क्योंकि अलग से मनस शास्त्र उस पर काम कर रहा है । और विशेषकर पैरा साइकोलाजी उस पर अलग से काम कर रही है । परा मनोविज्ञान अलग से काम कर रहा है । और मन के इतने अदभुत खयाल विज्ञान की पकड़ में आ गए हैं । धर्म की पकड़ में तो बहुत समय से थे । विज्ञान की पकड़ में भी बहुत सी बातें साफ हो गई हैं । ओशो
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