31 अगस्त 2010

सभी वस्तुएं भय पूर्ण हैं

भोगों में रोग का भय है । उच्च कुल में पतन का भय है । धन में राजा का । मान में दीनता का । बल में दुश्मन का । और शरीर में काल का भय है । इस प्रकार संसार में मनुष्यों के लिए सभी वस्तुएं भय पूर्ण हैं । भय से रहित तो केवल वैराग्य है - भर्तृहरि ।
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जैसे नेत्रहीन के लिए यह जगत - अंधकारमय । और नेत्रवान के लिए - प्रकाशमय है । वैसे ही अज्ञानी के लिए जगत - दुखदायक है । और ज्ञानी के लिए - आंनददायक - स्वामी रामतीर्थ ।
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राह को आसान बनाओ तो कोई बात बने ।
जिन्दगी हंस के बिताओ तो कोई बात बने ।
राह में फूल भी कांटे भी कलियां भी हैं ।
गले सबको लगाओ तो कोई बात बने ।
भागो नहीं जागो । अनमोल सूत्र है । जब भी प्रतिकूल परिस्थिति आती है । हम पलायन करने लगते हैं । जबकि वो स्थाई नहीं होती । हाँ उस वक्त यदि हम शांत चित्त होकर मात्र देखते रहें । तो उसको जाने में कोई देर नहीं लगती । परंतु मुश्किल है - शांत चित्त होना । ध्यान साधना की चर्चा अक्सर आध्यात्मिक जगत में की जाती रही है । हम समझते हैं । इसका मतलब है - भगवान के दर्शन करना । तो सोच लेते हैं । अभी तो जिम्मेदारी पूरी कर लें । दर्शन तो बुढ़ापे में कर लेंगे । वस्तुतः भगवान के दर्शन की जरूरत है ही नहीं । जरूरत तो है भगवान की व्यवस्था के दर्शन की । जिसमें द्वंद्ववाद है । हरेक के साथ विपरीत बंधा है । विपरीत हमको तकलीफ देता है । ध्यान साधना 1 ऐसा अभ्यास है । जिसके द्वारा हम विपरीत को सहजता से स्वीकार करने योग्य हो जाते है । सही अर्थों में तो ये अभ्यास बालपन में ही होना चाहिए । ताकि जीवन को जीने की कला आ जाए । परंतु ऐसा नहीं होता । फलस्वरूप सारा जीवन विपरीत के साथ लड़ने में निकल जाता है । और अंत में प्राण यही पुकारते चले जाते हैं ।
सभी निरर्थक रहे आज तक जितने गीत लिखे ।
और कहाँ तक मेरा तन अब मेरे मीत लिखे ।
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राजा की 3 सीखें - बहुत समय पहले की बात है । सुदूर दक्षिण में
किसी प्रतापी राजा का राज्य था । राजा के 3 पुत्र थे । 1 दिन राजा के मन में आया कि पुत्रों को को कुछ ऐसी शिक्षा दी जाये कि समय आने पर वो राजकाज सम्भाल सकें । इसी विचार के साथ राजा ने सभी पुत्रों को दरबार में बुलाया । और बोला - पुत्रों, हमारे राज्य में नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है । मैं चाहता हूँ । तुम सब 4-4 महीने के अंतराल पर इस वृक्ष की तलाश में जाओ । और पता लगाओ कि वो कैसा होता है ? राजा की आज्ञा पाकर तीनो पुत्र बारी बारी से गए । और वापस लौट आये । सभी पुत्रों के लौट आने पर राजा ने पुनः सभी को दरबार में बुलाया । और उस पेड़ के बारे में बताने को कहा । पहला पुत्र बोला - पिताजी वह पेड़ तो बिलकुल टेढ़ा मेढ़ा, और सूखा हुआ था ।
- नहीं नहीं । वो तो बिलकुल हरा भरा था । लेकिन शायद उसमे कुछ कमी थी । क्योंकि उस पर 1 भी फल नहीं लगा था । दूसरे पुत्र ने पहले को बीच में ही रोकते हुए कहा । फिर तीसरा पुत्र बोला - भैया, लगता है आप भी कोई गलत पेड़ देख आये । क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा । वो बहुत ही शानदार था । और फलों से लदा पड़ा था । और तीनो पुत्र अपनी अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे कि तभी राजा अपने सिंहासन से उठे । और बोले - पुत्रों, तुम्हे आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है । दरअसल तुम तीनों ही वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो । मैंने जानबूझ कर तुम्हे अलग अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था । और तुमने जो देखा । वो उस मौसम के अनुसार था । मैं चाहता हूँ कि इस अनुभव के आधार पर तुम 3 बातों को गाँठ बाँध लो । 1 - किसी चीज के बारे में सही और पूर्ण जानकारी चाहिए । तो तुम्हें उसे लम्बे समय तक देखना परखना चाहिए । फिर चाहे । वो कोई विषय हो । वस्तु हो । या फिर कोई व्यक्ति ही क्यों न हो । 2 - हर मौसम 1 सा नहीं होता । जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा भरा या फलों से लदा रहता है । उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी उतार चढाव आते रहते हैं । अतः अगर तुम कभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हो । तो अपनी हिम्मत और धैर्य बनाये रखो । समय अवश्य बदलता है । और 3  - अपनी बात को ही सही मानकर उस पर अड़े मत रहो । अपना दिमाग खोलो । और दूसरों के विचारों को भी जानो । यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है । चाहकर भी तुम अकेले सारा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते । इसलिए भ्रम की स्थिति में किसी ज्ञानी व्यक्ति से सलाह लेने में संकोच मत करो । 
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