20 जनवरी 2017

ओशो की चूक

ज्ञान और ध्यान की अनेकानेक स्थितियों के सटीक, मौलिक, स्वयंभू वर्णन की बात की जाये तो मेरे अनुभव में सिर्फ़ एक ही नाम आता है - कबीर !
वो भी अति संक्षिप्त रूप से एक या अधिकतम दो दोहों में, यदि संयुक्त रूप से तीन दोहे बनें, तो गौर कर लेना, तीसरे दोहे की भिन्न स्थिति है जो दोहरी रिश्तेदारी की भांति पूर्व के दूसरे दोहे से जुङ रही होगी ।
अतः निर्विवाद आज भी शिखर पर कबीर ही हैं और उनसे ज्ञात पूर्वकाल तक और इस लेख को लिखने तक ऐसा दूसरा हुआ ही नहीं ।
कबीर का घर शिखर पर, जहाँ सिलहली गैल ।
पपीलिका ठहरे नहीं, खलकन लादे बैल ।
शेष इस परंपरा में आने वाले नाम (तुलनात्मक कबीर) या तो बहुत क्षीण मौलिकता वाले हैं या फ़िर (नकल) छाप लेखन वाले; इस शब्द का अर्थ गहरे समझना, किसी पूर्वलिखित विषय के आधार पर उस विषय को अपने ‘भावशब्द’ दे देना भर !
उदाहरण के लिये जैसे राम, कृष्ण के जीवन चरित्र आधार पर अनेक कथानक लिखे गये ।  
यह इस तरह भी सिद्ध हो जाता है कि आप कोई भी वाणी लें, वह कबीर ने अवश्य कही है और यह ठीक नही लगता कि कबीर ने किसी की छाप ली हो । क्योंकि मैंने पहले ही ऊपर कह दिया कि कबीर को अभी तक कोई छू भी नही सका । यदि आपकी निगाह (और मेरी नाजानकारी) में ऐसा कोई हो तो ‘वाणी’ सहित अवगत कराने की कृपा करें ।

उपरोक्त के बाद मेरा दूसरा पसन्दीदा व्यक्तित्व है - ओशो !
लेकिन (ज्यादातर) सिर्फ़ एक टीकाकार, व्याख्याकार के रूप में, क्योंकि (आप गौर करना) ओशो ने मौलिक न के बराबर ही कहा, और अपने सुलझे, गम्भीर, दार्शनिक अंतःकरण द्वारा अधिकतर गूढ़ विषयों को स्पष्ट भर किया ।
परन्तु दर्शन की इतनी सटीक, बारीक और विस्त्रत व्याख्या करने वाला कम से कम मेरी नजर में तो दूसरा अभी तक नहीं है । अब यहाँ फ़िर वाक्य को ‘समग्र’ भाव में समझने की आवश्यकता है । मतलब कबीर के छोटी से छोटी और असंख्य स्थितियों के यथार्थ वर्णन की भांति ही ओशो ने जीवन, ध्यान, (मन परत आदि की) आंतरिकता आदि अनेकानेक स्थितियों पर (अन्य के तुलनात्मक) जितने और जैसे गहरे अर्थ दिये । उसका दूसरा उदाहरण मेरे लिये नही है ।
लेकिन ?
लेकिन मेरा मत है कि ओशो कबीर का ‘तलीय दर्शन’ नही कर सके । 
और कबीर संदर्भ, प्रसंगों में इसके कई उदाहरण कई बार मेरे सामने आये । 
परन्तु ओशो की जिस बङी चूक को बताने के लिये मैंने यह लिखा, वह ओशो जैसे व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर बङी ‘अजीब’ ही लगती है । और वह कबीर के ही एक पद और बेहद सामान्य ज्ञान को लेकर है ।
देखिये - इस पद,
अवधू जोगी जग थैं न्यारा ।
मुद्रा निरति सुरति करि सींगी । नाद न खंडै धारा ।
के आधार पर ओशो ने जो लम्बी व्याख्या की । इसमें आगे बीच में एक पंक्ति है ।
सहंस इकीस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै ।
(और ओशो ने इसका अर्थ निम्न किया)
(मैंने उपरोक्त से असम्बन्धित वाक्य हटा दिये हैं जो बीच बीच में बोलना अक्सर ओशो का स्वभाव था)
ओशो - इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां है शरीर में ? कैसे योगियों ने जाना । यह एक अनूठा रहस्य है । क्योंकि अब विज्ञान है । हां इतनी ही नाड़ियां हैं । और योगियों के पास विज्ञान की कोई भी सुविधा न थी । कोई प्रयोगशाला न थी । जांचने के लिए कोई एक्स-रे की मशीन न थी । सिर्फ भीतर की दृष्टि थी । पर वह एक्स-रे से गहरी जाती मालूम पड़ती है । उन्होंने बाहर से किसी की लाश को रख कर नहीं काटा था । कोई डिस्सेक्शन । कोई विच्छेद करके नहीं पहचाना था कि इतनी नाड़ियां है । उन्होंने भीतर अपनी ही आंख बंद करके । उर्जा जब उनके तृतीय नेत्र में पहुंच गई थी । और जब भीतर परम प्रकाश प्रकट हुआ था । उस प्रकाश में ही उन्होंने गिनती की थी । उस प्रकाश में ही उन्होंने भीतर से देखा था ।
इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां हैं । अभी सब अलग अलग हैं । अभी तुम ऐसे हो जैसे मनकों का ढेर । अभी तुम्हारे मनके माला नहीं बने । किसी ने धागा नहीं पिरोया । अभी तुम मनकों का ढेर हो । धागा भी रखा है । मनके भी रखे हैं । माला नहीं हैं ।
तुम्हारी इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां अभी माला के धागे नहीं बनी । माला नहीं बनी । क्योंकि किसी ने धागा नहीं पिरोया है । वह धागा क्या है ? उस धागे का नाम ही सुरति है । जिस दिन तुम सारी नाड़ियों को बोधपूर्वक देख लोगे । सहंस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै । और जिसकी मुद्रा हो गई निरति की । और जिसका वाद्य बज गया सुरति का । वह धागे से पिरो देता है सारी नाड़ियों को । वह अखंड एक हो जाता है । उसके भीतर एक का जन्म होता है ।
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अब गौर करें ‘इक्कीस हजार छह सौ नाड़ियां’ कितनी बार दोहराया है यानी असावधानी, बेख्याली में नहीं निकला, बल्कि पक्के तौर पर कहा ।
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जबकि मनुष्य के शरीर मे 72000 नाङियां है और ‘इक्कीस हजार छह सौ’ 24 घन्टे में आने वाली सांसों की गिनती है ।
इसका सही अर्थ यह है -  
सहंस इकीस छह सै धागा । निहचल नाकै पोवै ।
- (दिन रात चौबीसो घन्टे) हर स्वांस स्थिर हो जाओ ।
और (पूरे पद अनुसार) उस ‘केन्द्र विशेष’ पर केन्द्रित हो जाओ ?
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वैसे ओशो ने इस पूरे पद का ही स्तरहीन अर्थ किया है । पर वह बात उतनी गम्भीर नही है । लेकिन नाङियों वाली बात तो ‘सामान्य ज्ञान’ के अन्तर्गत है । इसलिये उल्लेखनीय है ।
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ओशो ने कबीर की बहुत प्रशंसा की और बहुत कुछ बोला भी ।
पर ?
गुरुता, शिष्यता, मुक्तभोग वर्जना, धन, संपत्ति स्त्रीगत सम्बन्ध (लेकिन सिर्फ़ ‘काम सम्बन्ध’ ही नहीं अन्य भी) आदि ज्ञान और शिष्यता के बेहद खास अंगों पर बेहद विरोधाभास है ।
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ओशो का यह पूरा प्रवचन आप निम्न या सर्च द्वारा अन्य स्थानों पर भी देख सकते हैं ।
https://oshoganga.blogspot.in/2014/11/6_19.html
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