08 जनवरी 2017

परमात्मा, सृष्टि और मोक्ष रहस्य

एक तरह से यह असाधारण और दुर्लभ चित्र है । लेकिन यदि कुण्डलिनी या सुरति-शब्द योग सिद्धांतों का अध्ययन किया है तो फ़िर यह उत्तम ‘खेल चित्र’ है । इस चित्र के मूल और समय को लेकर कोई ठोस प्रमाण नही है । कुछ लोग इसे सन्त ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी-गीता के व्याख्याकार) का बताते हैं और कुछ और भी अधिक पुरातन ।
जो भी हो, असली बात तो ‘चित्र रहस्य’ और उसके प्रभाव, उपयोग की है ।
पासा पकड़ा प्रेम का । सारी किया सरीर ।
सतगुर दावा बताइया । खेलै दास कबीर ।
पहले मैंने सोचा कि इसकी सरल और स्पष्ट व्याख्या कर दूँ फ़िर यह अन्याय सा लगा । क्योंकि एक तो यह खेल विधि पर आधारित है । दूसरे इसको गौर से समझने पर अत्यधिक लाभ होगा ।
लेकिन फ़िर भी संकेत के तौर पर यह (लगभग) पूर्ण चित्र है । न सिर्फ़ पूर्ण बल्कि एक-एक भाग और सहायक चित्र आदि कुछ भी व्यर्थ या सजाबट के तौर पर नही है और अपने ही स्थान पर है ।
पूरा चित्र गौर से देख लेने पर भी हो सकता है । आप इसका सर्वोच्च रहस्य जो इसमें एकदम स्पष्ट और साफ़ है, शायद ही समझ पायें ।
फ़िर भी एक और संकेत के तौर पर यह चित्र ‘परमात्मा, सृष्टि और मोक्ष’ को पूर्णरूपेण बताता है ।
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दूसरा (नीचे वाला) चित्र लगभग इसकी नकल है जो मेरे विचार से अधूरा और त्रुटियुक्त भी है । लेकिन तुलना के लिये ठीक है ।
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तो इस चित्र का ‘रहस्य सुलझाने के लिये’ चित्र पर क्लिक करके फ़ोटो के पूर्ण चमक युक्त हो जाने पर सेव करें । और बेहद गौर से एक-एक चीज को समझें ।
चौपड़ खेल होत घट भीतर, जन्म का पासा डारा । 
दमदम की कोइ खबरि न जाने, कोइ कै न सकै निरुवारा । 
चौपड़ि माँडी चौहटै । अरध उरध बाजार ।
कहै कबीरा राम जन । खेलौ संत विचार ।
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