09 जनवरी 2017

चौथा उत्तर

यह पूरा लेख अत्यन्त गहरे भाव वाला है । जो इसमें कहा है वो इसमें है ! इसलिये एक-एक शब्द अति सावधानी से पढ़ें ।
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सूफ़ी बोध कथायें साधारण भाव वाली नहीं होती और कभी कभी तो सीधे (मोक्ष) द्वार पर ले जाकर खङा करने वाली होती हैं ।
ठीक से समझना, द्वार पर ! द्वार के अन्दर नहीं, बल्कि देहरी पर भी नहीं, क्योंकि देहरी सिर्फ़ वो हलचल है जो कथा का मर्म पैठ जाने से हुयी ।
और हलचल इसका द्योतक है कि - अन्दर कुछ टूटा ।
और जब टूटा तो धुंधला धुंधला सा दरवाजा नजर आया । अब आगे बहुत सावधानी रखनी है क्योंकि एक तो अपनी टूटन को लेकर सहज रहना और दूसरे दरवाजा ओझल न हो जाये, इस पर भी तब तक केन्द्रित रहना है । जब तक दरवाजे के अन्दर प्रविष्ट न हो जाये ।
और जब एक बार प्रविष्टि हो जाती है फ़िर तुम्हारे करने के लिये कुछ (खास) नही रह जाता । क्योंकि फ़िर सब कुछ स्वतः स्फ़ूर्त है, प्राकृतिक है ।
लेकिन दरवाजे के पार जाना कठिन ही नहीं, बल्कि अति कठिन है ।
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एक गांव में एक फ़कीर आया । उस गांव के लोगों ने उसे बोलने के लिये आमन्त्रित किया ।
फ़कीर खुशी खुशी राजी हो गया ।
लेकिन जब बहुत से गांव वाले इकठ्ठे हो गये और जब वह मंच पर बैठा ।
उसने कहा - भाईयों, जो मैं बोलने को हूँ । जिस सम्बन्ध में बोलूंगा, क्या तुम्हें उसके बारे में पता है वह क्या है ?

बहुत से लोगों ने एक साथ कहा - नहीं, हमें कुछ पता नहीं ।
फ़कीर तुरन्त मंच से नीचे उतर आया ।
और बोला - फ़िर मैं ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना पसन्द नही करूंगा । जो कुछ नही जानते, जो कुछ नही जानते उस विषय के सम्बन्ध में, जिस पर बोलना है । उनके साथ कहाँ से बात शुरू की जाये ? इसलिये मैं बात ही शुरू नही करूंगा ।  
फ़िर वह उतरा और चला गया ।
सभी लोग हैरान रह गये ।
दूसरे दिन उन्होंने फ़िर फ़कीर से प्रार्थना की - आप चलिये बोलने ।
फ़कीर राजी हो गया ।
और मंच पर बैठकर उसने फ़िर पूछा - मैं जिस सम्बन्ध में बोलने को हूँ, क्या तुम्हें उसके बारे में पता है वह क्या है ?
सभी लोगों ने एक साथ कहा - हाँ पता है ।
क्योंकि पिछली बार ‘ना’ करने की भूल कर चुके थे और वह नही बोला था ।
फ़कीर ने कहा - तब फ़िर मैं नहीं बोलूंगा । क्योंकि जब तुम्हें पता ही है फ़िर बोलने का कोई प्रयोजन नहीं । जब तुम्हें ज्ञात है तो ज्ञानियों के बीच बोलना फ़िजूल है । 
वह मंच से उतरा और चला गया ।
तब गांव के लोगों ने उससे बुलवाने के लिये विचार किया । विचार किया, उसके प्रश्न पर ‘हाँ’ और ‘ना’ दोनों बेकार गयी ।
अगले दिन तीसरी बार फ़िर उन्होंने फ़कीर को राजी किया और कहा - चलें और हमें उपदेश दें ।
वह सहर्ष तैयार हो गया ।
वह मंच पर आकर बैठा और उसने पूछा - मित्रो, क्या तुम्हें पता है मैं क्या बोलने वाला हूँ ?
उन लोगों ने कहा - कुछ को पता है कुछ को नही पता ।
फ़कीर ने कहा - तब जिनको पता है, वो उनको बता दें जिनको नही पता है । मेरा क्या काम है ।
वह फ़िर उतरा और वापिस चला गया ।
चौथी बार गांव वालों की हिम्मत नही हुयी कि उसे बोलने के लिये आमन्त्रित करें । क्योंकि उनके पास तीन ही उत्तर थे । जो अब समाप्त हो गये थे और व्यर्थ हो गये थे ।
और चौथा उत्तर उनके पास नही था ।
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