05 मार्च 2015

अदभुत रोग, शाहे विलायत

हिन्दू मुस्लिम विवाद, खास मुस्लिमों की धार्मिक सोच, नास्तिकों की सन्तों के प्रति धारणा, गुप्त ईश्वरीय विधान और सन्तों की रहस्यमय कार्यप्रणाली आदि पर एक दुर्लभ लेख ।
यह घटनाकृम द्वितीय विश्वयुद्ध 11Feb1915 के समय की है । अर्थात इसका समय इतना पुराना नहीं कि इसके प्रमाणित होने में किसी प्रकार की कठिनाई हो । इसके स्थान और जीवित साक्ष्य ( अगली पीढी ) अभी भी होंगे ।
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ऊपर का चित्र इस लेख में वर्णित दादा गुरु यानी श्री परमहंस दयाल जी का है । और दूसरा उनके सर्वोच्च सुयोग्य शिष्य श्री स्वरूपानन्द जी महाराज परमहंस का । जो वर्तमान में प्रसारित ‘सत्यनाम’ ज्ञान परम्परा के श्री अनिरुद्ध महाराज ( हंस जी के गुरु ) और राधास्वामी या जय गुरुदेव आदि मंडलों के जनक गुरु थे । आज के अधिकतर सतनाम मंडल स्वरूपानन्द जी की ही देन हैं ।
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टेरी में काफ़ी अधिक सर्दी पङती थी । परन्तु श्री परमहंस दयाल जी केवल एक मलमल का चोला ही पहनते थे । सर्दी के कारण 11Feb1915 को आपके पवित्र शरीर के दाहिने भाग पर फ़ालिज गिरा । बन्नू, कोहाट और कई स्थानों से डाक्टर तथा हकीम बुलाये गये । और चिकित्सा शुरू हो गयी । परन्तु कोई विशेष आराम न आया । आप पलंग पर लेटे रहते थे । लोग बारी बारी आकर सेवा करते थे । उन दिनों टेरी में याकी पठान आकर काफ़ी डाके डालते थे । श्री परमहंस दयाल जी की कृपा से स्थिति में बहुत सुधार हुआ । एक दिन श्री परमहंस दयाल जी ने स्वयं ये वचन फ़रमाये थे - लोगों ने समझ रखा है कि हम बीमार हैं । परन्तु वे भला इस रहस्य को क्या जाने । टेरी का संकट हमने अपने ऊपर ले रखा है । सत्य है । महापुरुषों के संकल्प में बहुत शक्ति होती है ।
हजूर दाता दयाल जी के इस अदभुत रोग के पीछे भी एक बहुत बङा रहस्य है । भला उनको यह तकलीफ़ क्यों हुयी ? यह सवाल दिलों में उठ सकता है । किन्तु इस राज पर से भी पर्दा उठ गया ।

टेरी के दो तहसीलदार थे । एक मालगुजारी विभाग का । और दूसरा अंग्रेजों के राजनैतिक प्रतिनिधि द्वारा नियुक्त अरबाब अजब खान टेरी का दूसरा तहसीलदार था ।
वह बहुत धर्मान्ध मतस्सवी मुसलमान था । टेरी के नबाव श्री परमहंस जी को सलाम करने आते जाते । तो उसे बहुत महसूस होता था । पीर हदायतुल्ला शाह साहिब श्री परमहंस दयाल जी के पास आते । तो भी उसे बहुत तकलीफ़ होती थी । हाफ़िज अब्दुल करीम साहिब रावलपिंडी से पीर शाह चिराग के गद्दीनशीं हजूर को सलाम करने आते । तो भी उसे बहुत दुख होता था । वह प्रचार किया करता था कि आप लोग इस हिन्दू फ़कीर के पास किसलिये आते हो ? वह श्री परमहंस दयाल जी के विरुद्ध प्रचार किया करता । नौशहरा में एक मशहूर सूफ़ी फ़कीर थे - बाबा नूरगुल ।
अरबाव अजब खान उनका मुरीद था । एक बार वह उनकी खिदमत में हाजिर हुआ । अर्ज की कि बाबा मैंने छुट्टी ले ली है । अगर आपकी इजाजत हो । तो मैं हज करने जाता हूँ ।
बाबा बहुत खुश हुये । उन्होंने फ़रमाया -  जरूर हज करो । हज से फ़ारिग होकर बगदाद चले जाना । वहाँ एक जंगल में इस हुलिये के एक फ़कीर मिलेंगे । वे इस समय के गौस उल आजम हैं । मुसलमानों के विश्वासानुसार हर शताब्दी में भारत में एक कुतुब रहता है । और मध्य पूर्व में एक - गौस उल आजम ।
बाबा नूर गुल बोले - गौस उल आजम से इजाजत ले ली है । आप उनके दर्शन करना । अपना सलाम भी करना । हमारा सलाम भी बोलना । अरबाव अजब खान हज करके बगदाद पहुँचे । और गौस उल आजम से मिले । उन्होंने फ़रमाया - हम तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे । हमने किसी जरूरी काम से कहीं जाना था । अच्छा किया । आप आ गये ।
अरबाव अजब खान ने दर्शन किये । सलाम किया । और बाबा साहिब का भी सलाम बोला । गौस साहिब बोले - अरबाव साहिब हम आपकी क्या खिदमत करें । हम आपको कुछ दे नहीं सकते । कुछ ले नहीं सकते । दर्शन ही दर्शन है । दीदार ही दीदार है । अरबाव ने अर्ज की - आप इतने बङे गौस होकर मुझे दुआ नहीं दे सकते । उन्होंने फ़रमाया - हम दुआ तो सबको देते हैं । पर ये बेफ़ायदा है । क्योंकि तुम हमारी प्रजा नहीं हो । अपने शहंशाह से दुआ लो । तुम्हारा शहंशाह तुम्हें दुआ दे सकता है । सब कुछ दे सकता है । असल में तुम्हारे मुर्शिद को भी पता नहीं कि इस समय हिन्दुस्तान में ‘शाहे विलायत’ कौन है ?
अरबाव ने हैरानी से पूछा - हजूर फ़िर बताईये । शाहे विलायत कौन हैं ?
गौस साहिब बोले - तुम समुद्र के किनारे बैठे हुये भी प्यासे हो । परमहंस अद्वैतानन्द जी इस समय भारत के ‘शाहे विलायत’ हैं । वही तुझ पर कृपा कर सकते हैं ।
तुम पास बैठे हुये भी हिन्दू मुसलमान के चक्कर में पङे हुये हो । वहाँ ऐसा कोई चक्कर नहीं । कोई भी फ़कीर न हिन्दू है । न मुसलमान  । फ़कीर ‘अहले अल्लाह’ होता है ।
अरबाव ने कहा - उन्हें तो इस समय फ़ालिज है । अधरंग है । उनका तो इलाज चल रहा है । वे इतने बङे महापुरुष हैं । तो फ़िर अपने को ठीक क्यों नहीं कर लेते । 
गौस साहिब ने फ़रमाया - तुम्हें क्या पता है कि उन्हें फ़ालिज वगैरह कुछ नहीं । इस समय जो बङी लङाई विश्व युद्ध हो रहा है । सन 1914 का । उसमें महाराज परमहंस जी ने अपना आधा शरीर दे रखा है । दो फ़कीर और हैं । जिन्होंने अपने शरीर का बायां हिस्सा दे रखा है । और परमहंस जी ने दायां । वे अंग्रेजों की ओर से लङ रहे हैं । यह ईश्वरीय फ़रमान है कि - यह लङाई अंग्रेज जीतेंगे ।
अरबाव अजब खान ने अर्ज की - जी मैं लिख लूँ ।
उन्होंने फ़रमाया - जरूर लिख लो । जो सच्चाई है । वह तो सच्चाई ही  है ।
अरबाव अजब खान टेरी लौटा । अंग्रेजों के प्रतिनिधि को सारी बात बताई । उसने कहा कि - परमहंस जी के पास प्रसाद लेकर जाओ ।
अरबाव अजब खान पंचायत लेकर टेरी में आया । श्री परमहंस दयाल जी उस समय पलंग पर लेटे हुये थे । अरबाव ने सलाम किया । परमहंस जी ने पूछा - हज कर आये । अच्छा हुआ ।
अरबाब ने अर्ज की - हाँ महाराज ..
- आप तो गौस उल आजम से भी मिलकर आये हैं । परमहंस जी ने सवाल किया ।
- हाँ महाराज मेरे मुर्शिद ने कहा था । उन्हें सलाम करके आना ।
परमहंस जी ने पूछा - क्या कहा था गौस साहिब ने ?
उसने सारी बात कह सुनाई । साथ ही पूछा कि - हजूर क्या यह ठीक है कि आपका आधा शरीर लङ रहा है ?
परमहंस जी मुस्कराकर बोले - तो क्या गौस उल आजम भी गलत कहेंगे । गौस उल आजम जो कहेंगे । सत्य ही कहेंगे ।
इतने शब्द कहकर हजूर परमहंस दयाल जी पलंग से उठे । और अपनी पहले जैसी तेज चाल से उस दालान में टहलने लगे । और फ़िर फ़रमाया - कहाँ है वह फ़ालिज ?
यह अदभुत दृश्य सभी ने देखा । सैकङों श्रद्धालु वहाँ मौजूद थे ।
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शीर्षक - अदभुत रोग, शाहे विलायत ( प्रष्ठ संख्या 67 )
पुस्तक - श्री स्वरूप दर्शन ( अष्टम संस्करण ) 2008 
प्रकाशक - सारशब्द मिशन प्रकाशन विभाग ।
मिलने का पता - नंगली ( मेरठ )
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श्री अद्वैत स्वरूप आश्रम 
w/9 राजौरी गार्डन, नई दिल्ली
110027
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