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06 जुलाई 2011

असल सुख का रास्ता क्या है ?

दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ।
गुरु से मिलने के क्या फ़ायदे हैं ? इसको गुरु अर्जुन देव जी बताते हैं । और गुरु क्या देते हैं ? जब हम गुरु के दर्शन करते हैं । तो हमारा ह्रदय शीतल होता है । और हमारे पाप नष्ट होते हैं । गुरु शाश्वत सत्य शाश्वत प्रेम शाश्वत जीवन के रहस्य से परिचय कराते हैं ।
निर्वाणी नाम के अभ्यास जप द्वारा गुरु हमें परमेश्वर से मिला देते हैं । गुरु हमें बोध कराते हैं कि वह मालिक आपके अन्दर बैठा हुआ है । अगर उससे मिलना है । तो चलो । मैं तुम्हें उनसे मिलाता हूँ ।
गुरु से मिलने का प्रथम फ़ायदा यही है कि जो भी श्रद्धा प्रेम से मिलता है । उसके पाप नष्ट हो जाते हैं ।
परन्तु गुरु चाहे कितने ही पहुँचे हुये हों । उनके रिश्तेदारों को भी सहज इस बात पर यकीन नहीं आता । और जब तक यकीन नहीं आता । तब तक वह लाभ नहीं होता । जो होना चाहिये ।
अर्जुन देव जी कहते हैं - मेरा गुरु ही मेरा असली पिता है । जिनके दर्शन करने से सब पापों का नाश हो जाता है । अतः गुरु रामदास जी के दर्शन करने से

मेरे सब पाप नष्ट हो गये । और उन्होंने मुझे परमात्मा से मिला दिया । पिता को परमात्मा समझना बङा ऊँची बात है ।
मेरा गुरु परमेसरु सुखदाई ।
ये कुल बृह्मांड और सारा संसार दुखी है । फ़िर बात ये है कि - सुख कैसे मिले । असल सुख का रास्ता क्या है ?
असली सुख गुरु और परमेश्वर के मिलाप से मिलता है । क्योंकि सिर्फ़ गुरु के जरिये ही परमात्मा मिलता है । और परमात्मा के मिलने से मुक्ति प्राप्त होती है । अर्जुन देव जी कहते हैं - मैं गुरु को ही परमेश्वर का रूप मानता हूँ । परमात्मा को तो जब देखेंगे । तब देखेंगे । परन्तु परमात्म स्वरूप गुरु को प्रत्यक्ष देखते हैं । इसलिये सन्त जब इस देह में बैठे होते हैं । तो वो कभी नहीं कहते मैं सन्त हूँ ।
बाहरि भीतरि एको जानहु
जब तुम वहाँ आंतरिक मंडलों पर पहुँचते हो । जब सुरति 9 द्वारों को छोङकर बृह्म और पारबृह्म में जायेगी । तो आपको खुद ही पता लग जायेगा । गुरु क्या हैं ? और क्या देते हैं ? नहीं तो अगर किसी ने कह दिया कि गुरु झूठा है । तो बहुत सों का विश्वास टूट जाता है । डगमगा जाता है ।
अगर किसी ने कह दिया - सच्चे हैं । तो विश्वास बंध जाता है । परन्तु अन्दर जाकर देख लेने पर खुद ही सब संशय समाप्त हो जाता है । और तब पता चल जाता है कि गुरु बाहर भीतर एक ही है । यही सबसे बङा स्वतः प्रमाण है । जिसको किसी सबूत की

आवश्यकता नहीं । पर थोङी मेहनत तो करनी ही होगी ।
पारबृह्म का नामु दृङाए अंते होय सखाई ।
गुरु क्या उपदेश देते हैं ? गुरु क्या कहते हैं ?
आप सोचते हो कि - गुरु कहते हैं कि 9 द्वारों के पिंजरे से ऊपर उठो । और स्थूल से ऊपर उठकर सूक्ष्म में आ जाओ । इसके बाद जब तुम सूर्य चन्द्र और तारामण्डल को पार करोगे । तो देखोगे । गुरु आगे सूक्ष्म शरीर में खङा है ।
वास्तव में सेवा कई प्रकार की होती है । कोई तन की सेवा करता है । कोई धन से सेवा करता है । कोई मन से सेवा करता है ।
लेकिन असली सेवा कुछ और ही है । वह असली सेवा है - अन्दर से गुरु को जानना । जब अन्दर गुरु प्रगट हो जाता है । तो फ़िर आप जो भी सवाल करते हो । गुरु उसका जबाब देते हैं । सदगुरु को अन्दर प्रत्यक्ष कर लें । उनके साथ बातें करें । और उनसे कहें कि - हमें अपने साथ ले चलिये । वे आपको अन्दर ले जायेंगे ।
बहुत से लोग सोचते हैं कि हमें नाम जप की मेहनत ना करनी पङे । और बिना मेहनत के ही मालिक अन्दर ले जाये । ऐसा कभी नहीं हो सकता । ये आपका काम है । और आपको ही करना होगा । पता नहीं फ़िर मनुष्य जन्म कब मिले ? और भजन से दुनियाँ के कामों का कभी नुकसान नहीं होता ।


ये भजन करना भी बहुत आसान है । कोई भी दुकानदार दुकान पर सुमिरन कर सकता है । औरत घर का काम काज करती हुयी सुमिरन कर सकती है । किसान हल चलाता हुआ सुमिरन कर सकता है । इस तरह सब कोई अपना अपना काम करते हुये सुमिरन कर सकता है ।
इसलिये इंसान के अन्दर जब तक प्रेम न हो । परमात्मा के प्रति खिंचाव न हो । तब तक अन्दर का परदा नहीं खुलता । ये परदा जब भी खुलता है । भक्ति रूपी प्रेम से ही खुलता है ।
मनुष्य की आत्मा पर तीन मुख्य शरीर है । पहला ये स्थूल शरीर है । इसके अन्दर सूक्ष्म शरीर है । और उसके अन्दर कारण शरीर है ।
गुरुमुख बनने के लिये भजन द्वारा अभ्यास से स्थूल शरीर को उतारना सीखा जाता है । फ़िर तुरीयापद में जाकर सूक्ष्म शरीर को भी उतार दे । और उसके बाद बृह्म में जाकर कारण शरीर को भी उतार दे । और उसके बाद पारबृह्म में जा । वहाँ जाकर तेरा अपना प्रकाश 12 सूरज का हो जायेगा । क्योंकि तू आत्मा है । जो परमात्मा का अंश है । मगर यहाँ माया के परदों से ढका हुआ है ।

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326