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23 अगस्त 2012

आपकी नज़र में ओशो क्या हैं -


नमस्कार उमेश और अशोक भाई ! सबसे पहले तो मैं राजीव भाई का धन्यवाद देना चाहूँगा । उन्होंने आत्म चर्चा का यह ब्लाग चलाया हुआ है । मैं आपके ब्लाग से कुछ ही दिन पहले जुड़ा । कुछ गूगल में सर्च कर रहा था । तभी राधा स्वामी वाला टोपिक पढ़ा । अशोक भाई ! आप तो मेरा मतलब गलत समझ गए । पहली बात तो मेरे पास कोई सुई ही नहीं है । जो कहीं अटकेगी । देखिये । मैंने कहा था कि - यह सवाल गलत है । न कि जवाब । मैंने कहा कि आप यह सवाल अगर किसी राधा स्वामी मत के पुस्तक में लिखा तो बताइए । अगर यह सवाल ही गलत है । तो जवाब कैसे सही हो सकते हैं । अगर मान लीजिये । आपसे कोई कहे कि - पृथ्वी तिकोनी क्यों है । और आप उसका जवाब देना शुरु कर देंगे कि इस वजह से पृथ्वी तिकोनी है । तो आप ही बतायें । क्या जवाब सही होगा actually राधा स्वामी मत की बुराई की इन्टरनेट में बहुत भरमार है । मतलब कि अगर आप राधा स्वामी मत के बारे में गूगल में सर्च करोगे । तो आपको हजारों sites मिल जायेंगी । जिसमें राधा स्वामी मत reality मिलेगी । उदाहरण के तौर पर वंशवाद । सम्पति । काल पूजा ..आदि । और राजीव जी ! आप यह जान कर हैरान होंगे । आधे से ज्यादा सिर्फ अफवाहें हैं । मैंने राधा स्वामी मत पर बहुत ही

research किया है । मुझे यह तो नहीं पता कि राधा स्वामी मत में कितनी सच्चाई है । परन्तु यह पता है कि राधा स्वामी मत के लिए लोगों की अलग अलग धारणा बनी हुई है ।
जैसे ओशो को मत को लेकर लोगों के मन में अलग अलग धारणा बनी हुई  है । ओशो ने अपनी विचारधारा को नाम दिया था - जोरबा टू बुद्धा । जोरबा का अर्थ होता है । एक भोग विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति । और बुद्धा का अर्थ निर्वाण पाया हुआ । परन्तु लोगों ने जोरबा का चरित्र का याद रख लिया । और बुद्धा को सब भूल गए । नौबत यहाँ तक आ गयी । अगर आप ओशो आश्रम जायेंगे । तो सबसे पहले आपको HIV test करवाना पड़ेगा । यदि आपका HIV negative है । तो आपको ओशो आश्रम में प्रवेश मिल सकता है ।
खैर यह सब छोड़िये । हम अपने टोपिक पर आते हैं । यहाँ अगर ब्लॉग पर राधा स्वामी मत का खंडन करना है । तो सही बात पर करिये । गलत बात पर नहीं । राजीव जी ! आपने लिखा कि राधा स्वामी मत वाले पंचनामा को जपते है

। और आपकी विचारधारा के अनुसार वो सब काल के हैं । मैं इस बारे थोडा विस्तार से लिखूंगा । अभी थोड़ी समय की पाबन्दी है । और राजीव जी और अशोक जी और उमेश भाई से यह जानना चाहता हुँ कि - आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? लोग अधिकतर ओशो के विचार सामने रख देते हैं । इस ब्लाग में मुझे ऐसा लगता है कि ओशो को सबसे perfect गुरु माना जाता है । और अशोक भाई बा्की आगे ज़ल्दी ही लिखूंगा । आपका छोटा भाई - CM 
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वो सवाल Mr H. Thorne Crosbyne राधा स्वामी पंथ की तीन किताबों को पढ़ कर पूछे थे - अशोक । 

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राजीव जी ! आज बहुत दिनों बाद मेल कर रहा हूँ । राजीव जी हमारे यहाँ टिब्बी में मेरा एक परिचित है । जो को आमंत्रित किया है । वो कहते हैं कि कबीर का जो असली ज्ञान है । वो सिर्फ उनके पास है । और किसी के पास नहीं । इसके बारे में आप क्या कहते हैं । आखिर सच्चाई क्या है ? राजीव जी  ये निर्णय ही नहीं कर पा रहा हूँ । जिस तरह किसा ...( आधा लिखा मेल ) सोहन गोधरा । राजस्थान ।
जगत गुरू रामपाल जी का शिष्य है । वो कहता है कि - रामपाल जी ने अध्यात्म चर्चा के लिए पूरे विश्व के संतो
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रामपाल की सच्चाई क्या है - रामपाल के बारे में कोई भी बात करना मुझे समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नहीं लगता । रामपाल के यहाँ जो भीङ है । वह अधिंकाश अशिक्षित और

ग्रामीण लोगों की है । खुद रामपाल भी अशिक्षित से अधिक नहीं है । बाकी शास्त्र पुराणों में तोङ मरोङ कर ऐसी बातें निकाल लेना कोई बङी बात नहीं है । जबकि वे पूर्णतः आधारहीन हों । मुझे हैरानी है । रामपाल और मधु परमहँस ( साहिब बन्दगी ) दोनों जोर शोर से कबीर की बात करते हैं । जबकि कबीर से इनका कोई लेना देना नहीं हैं । रामपाल तो लोगों ने बताया कि - कई कई वाणी नाम ? सतनाम के नाम पर देता है । और मधु परमहँस - सतगुरु सतनाम ..मंत्र देते हैं । ये दोनों ही " सोहंग " को गलत बताते हैं । जबकि कबीर ने इसी से शुरूआत बतायी है । और ये पूर्णतः निर्वाणी है । तथा स्वांस में प्रति 4 सेकेंड 2 सोऽऽ 2 हंऽऽ इस तरह हो रहा है । विश्व का कोई भी व्यक्ति - हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई यहूदी पारसी इसका तुरन्त परीक्षण कर सकता है । अतं इसमें सन्देह जैसी कोई बात ही नहीं है । इन दोनों का जो दीक्षा देने का तरीका है । वह भी हँस ज्ञान वाला नहीं है । मधु परमहँस को सामान्य धर्म शिक्षक और रामपाल को अनपढ धार्मिक शिक्षक से 

अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता । रही बात । उसके चैलेन्ज आदि की । थोङा इन्तजार करें । सभी नकली और झूठे लोग खुद पतन रूपी गढ्ढे में गिरने वाले हैं । कितने ही पाखण्डी गिर चुके । वह आप देख ही चुके । फ़िर भी कबीर या आत्म ज्ञान के सोहंग या निर्वाणी मंत्र का कोई खण्डन करता है । तो मुझे उसका चैलेंन्ज स्वीकार है । मुझे हर उस धार्मिक गुरु का चैलेंज स्वीकार है । जो खुद को इस समय सतगुरु कह रहा है । बशर्ते यह चैलेंज बङे स्तर पर हो । बाकी इनका इलाज सत्ता खुद ही कर रही है । इसलिये मुझे इनमें कोई कैसी भी दिलचस्पी नहीं है ।
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अगर यह सवाल ही गलत है । तो जवाब कैसे सही हो सकते हैं - मैं इस बात से सहमत हूँ कि किसी पर आरोप प्रत्यारोप करने से पहले ठीक से बात को 

समझ लेना चाहिये । लेकिन शायद आज लोगों के पास इतना समय ही नहीं कि बात को ठीक से समझ सकें । फ़िर इस ब्लाग में तो खास ऐसा है कि एक लेख की बात दूसरे या तीसरे लेख में भी हो रही होती है । इसलिये ऐसे में भृम की स्थिति बन सकती है । लेकिन उमेश जैसे लोग जो इस ब्लाग के मूल उद्देश्य और नब्ज से परिचित हैं । वे जानते हैं - ये सामाजिक धार्मिक ज्वलंत विचारों और क्रांति का खुला मंच है । अतः हम अपनी अपनी बात रखते हैं । और उस पर बहस या विचार करते हैं । इसलिये आपका कहना भी सही है कि - सवाल ही गलत हैं । लेकिन आप गौर करें । तो सवाल गलत नहीं थे ? राधा स्वामी की प्रचार पुस्तकें पढकर Mr H. Thorne Crosbyne के मन में आया कि - कोई 5 नाम ( राधा स्वामी पंचनामा ) या 1 व्यक्ति ( चरन सिंह ) ही आत्मिक ऊँचाई पर ले जाने में ( इस समय ) सक्षम है ? और ओशो ने कई दृष्टिकोण से इसका सटीक उत्तर दिया । किसी भी धार्मिक संस्थान में छोटे बङे अनेक स्तर पर प्रचार सामग्री प्रकाशित की जाती है ।  और अक्सर प्रचारक लोग इस तरह के आधारहीन तथ्य जोङ देते हैं । अतः मेरे विचार से आप राधास्वामी या चरन सिंह के बजाय सिर्फ़ प्रश्न भाव से ओशो के उत्तर देखें । तो वो एकदम सटीक हैं । फ़िर भी आपके दृष्टिकोण का हमें इंतजार रहेगा । क्योंकि वह कुछ अलग सत्य लिये भी हो सकता है । इसलिये कोई दुराग्रह रखना भी मेरा स्वभाव नहीं है ।
राधा स्वामी मत का खंडन करना है । तो सही बात पर करिये - बिलकुल चन्द्रमोहन जी ! मैं आपसे सहमत हूँ । 

मैं सिर्फ़ राधास्वामी ही नहीं । बल्कि ओशो ( के वर्तमान । ओशो के समय नहीं ) रामपाल ( की बकबास ) मधु परमहँस ( का बङबोला पन ) जैसे तमाम लोगों का खंडन करता हूँ कि - वे सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं । पहली बात तो इनका आत्म ज्ञान से कोई वास्ता ही नहीं । ये सदियों से स्थापित थ्योरी के एकदम विपरीत बोल रहे हैं । और प्रयोगात्मक ज्ञान से तो इनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है । जबकि वही असली होता है । मैंने संक्षेप में कई बार स्पष्ट किया है - जो भी व्यक्ति सांस में स्वतः होते निर्वाणी और धुनात्मक नाम के अतिरिक्त कोई भी अन्य नाम ( दीक्षा ) देता है । और अंतर में अधिकतम 3 महीने तक दिव्य प्रकाश नहीं कर पाता । निसंदेह वो व्यक्ति ( गुरु कहना तो बहुत गलत होगा ना ) पूरा धूर्त है । बस इसकी शर्त 1 ही है । शिष्य ने निर्धारित समय तक सही योग ध्यान सुमरन किया हो ।
इस ब्लाग में मुझे ऐसा लगता है कि ओशो को सबसे perfect गुरु माना जाता है - शायद आप ऐसा इसलिये कह रहे हैं । क्योंकि आप अभी इस ब्लाग

से नये नये जुङे हैं । और हमारे मुक्त विचारों से  पूर्णतयाः परिचित नहीं हो पाये । इस ब्लाग में ओशो को तो बहुत दूर कबीर रामकृष्ण जैसों को ( अब व्यक्तिगत तौर पर ) कोई महत्व नहीं दिया जाता । आत्म ज्ञान का अटल सूत्र है - सिर्फ़ समय का सदगुर ही महत्वपूर्ण है । बाकी सन्तों की वाणियाँ शिक्षायें उपदेश आदि तमाम लोगों को आत्म ज्ञान हेतु प्रेरित करते हैं । मार्ग दिखाते हैं । लेकिन भारत मुर्दा पूजकों का देश है । खुद कबीर ने कहा है - हाजिर की हुज्जत । गये की तलाशी । कबीर । ओशो । नानक । रैदास । तबरेज ।  ईसा । मुहम्मद । मीरा । मंसूर आदि आदि आत्म ज्ञानियों को हर तरह से परेशान करने में तत्कालिक लोगों ने कोई कसर नहीं छोङी । और आज ये सभी पूज्य हैं । पर - अब पछताय होत का जब चिङिया चुग गयी खेत । मेरा आशय है । किसी भी सन्त या आत्म ज्ञानी का तभी तक महत्व है । जब तक वह सशरीर है । फ़िर ( बाद में ) उसकी शिक्षायें लोगों

को मानसिक रूप से तैयार करती हैं । और पात्रता आ जाने पर समय के सदगुरु से उसकी भेंट हो जाती हई । आदि सृष्टि से यही नियम है । मैं यह बात पूरी  ठसक से इसलिये कहता हूँ । क्योंकि एकदम नीचे से लेकर ऊपर तक मेरे पास पूरा प्रयोगात्मक ज्ञान ( विधि ) है । और प्रमाण रूप में भारत के कई शहरों में हमारे साधक मौजूद हैं । जो निरंतर ध्यान प्रगति कर रहे हैं ।
आपकी नज़र में ओशो क्या हैं - 
शेष उत्तर शीघ्र ही

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326