चिंताहरण आगरा ताजमहल लाल किला निर्मल बंसल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चिंताहरण आगरा ताजमहल लाल किला निर्मल बंसल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

14 मई 2012

चिंताहरण & आगरा से लौटकर निर्मल बंसल

ऊना । हिमाचल प्रदेश । वर्तमान में भिलाई निवासी निर्मल बंसल अशोक  के साथ । दोनों लोग हमारे मण्डल के शिष्य ।

सदगुरु का दिव्य अनमोल आशीर्वाद ।
ऐसा है हमारा चिंताहरण आश्रम ।
भोजन का समय हुआ ।
बाबाजी मुँह इधर एण्ड स्मायल - फ़ोटो खिंच रहा है ।
इस ताजमहल को कई बार देखकर भी मुझे यही समझ में नहीं आया कि लोग इसे क्यों और क्या देखने आते हैं । फ़ालतू में सालों से एक जगह ही खङा ये दुनियाँ के लोगों को पागल बना रहा है । मैं इसकी शक्ल से इतनी बोरियत महसूस करता हूँ कि उधर से गुजरना होने पर उधर न देखकर बाजार में लगे ठेले वगैरह देखने लगता हूँ ।
कई बार तो फ़ुटपाथ पर कपङे बेचते चपटे मुँह के नेपाली लोगों को देखना मुझे ज्यादा अच्छा लगता है । आप आगरा में पहली बार किसी के यहाँ मेहमान हों । तो उसकी यही सोचकर पहले से मरी हुयी नानी दुबारा मरने लगती है कि अभी बोलेगा - ताजमहल दिखाईये । बेचारे आगरा वासियों को कभी कभी तो ये लगता है कि इस ताजमहल ने उन्हें अच्छे भले आदमी से गाइड बना दिया । वो भी मुफ़्त का । और अपनी जेब से खर्चने का भी । पर आप जानते ही हैं । मैं कितना इंटेलीजेंट हूँ । मैंने इसका एक बङिया उपाय निकाला है । एक चाय के डिब्बे से कङक चाय बनबा कर । उसको पीते पिलाते हुये । डिब्बे पर ही बना फ़ोटो दिखा देता हूँ । और कहता हूँ - वाह ताज और ताजमहल चाय । 
ये ताजमहल का बङा भाई लाल किला है । दोनों एक दूसरे के सामने खङे एक दूसरे की शक्ल देखते हुये बोर होते रहते हैं । पर एक दूसरे के पास नहीं जा पाते । क्योंकि बीच में सूर्य की लङकी यमुना बह रही है ना ।
पहले के चित्रकार केनबास के बजाय  दीवालों पर चित्र फ़ूल पत्ती बनाते थे । पूरा ताजमहल किसी शैतान आर्टिस्ट बच्चे की तरह इन लोगों ने बिगाङ कर रख दिया ।
बंसल जी दीवाल पर बिछे कालीन के साथ ।
मुझे इन इमारतों को देखकर आज तक ये समझ में नहीं आया कि इनकी ऐसी छत बनाने से क्या फ़ायदा । अगर कोई खटिया डालकर छत पर लेटना चाहे । तो वो लेटेगा । या खङा ही हो जायेगा । ये छते सिर्फ़ कबूतरों और बन्दरों के ही काम की हैं ।  मनिन्दर प्रसाद
आप यकीन मानों । इससे अच्छे फ़ूल पत्ती तो मैं बचपन में बना देता था । जब मुझे अ आ इ ई लिखना भी नहीं आता था । चील बिलऊआ करने से ही इससे बङिया चित्र बन जाते थे ।
ये जगह मुझको कुछ पसन्द आयी । मैंने कहा - इसको बेचोगे ? पर उन्होंने मना ही कर दिया ।
अब सीरियस बात - इसको बनबाने वाले ने क्या कभी ये सोचा था कि -  एक दिन ऐसा आयेगा । जब न मैं इनमें रह पाऊँगा । न ही मेरे वंशज । वास्तव में उन्होंने यही सोचा था कि मैं और मेरी पीढिया सैकङों साल इसमें आराम से रहने वाली हैं । पर ऐसा आज तक नहीं हुआ । इसके बाबजूद भी लोगों की अक्ल में नहीं आता है । 
- बंसल जी ने करीब 60 फ़ोटो खींचे थे । जिनमें मुझे अभी 15 ही प्राप्त हुये हैं । इसके अतिरिक्त दिल्ली और जयपुर से जो लोग आश्रम आये । उनके फ़ोटो यदि प्राप्त हुये । तो प्रकाशित कर दिया जायेगा ।

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326