आश्चर्यजनक रूप से मुझे एक डेढ साल की आयु से अभी तक की सभी बातें घटनायें सचित्र स्थान सहित याद हैं । जिन्हें प्रायः बहुत लोग भूल जाते हैं । मेरी शार्प मेमोरी और विलक्षण दिमाग होने का A ग्रेड सर्टीफ़िकेट सभी ने ही दिया है । तो आईये बचपन से शुरु करते हैं ।
- मेरी माँ शिक्षिका और पिता सिंचाई विभाग दोनों ही सरकारी नौकरी में थे । अतः हम लोगों को उनके जगह जगह ट्रांसफ़र के चलते अनेक गाँव शहरों में रहना पङा । तो मैं लगभग एक साल की आयु से शुरू करता हूँ ।
बङे कठिन थे वे दिन - उस समय मेरी छोटी बहन पैदा नहीं हुयी थी । मैं और मेरी बङी बहन ही थे । हम लोग शिकोहावाद के पास एक गाँव की हवेली में रहते थे । वहाँ से मम्मी का स्कूल लगभग डेढ कोस ( 1 कोस = 3 किमी ) था । हम दोनों ही बच्चे इतना पैदल नहीं चल सकते थे । अतः मेरी माँ एक को गोद में लेकर दूसरे को वहीं छोङकर कुछ दूर तक बैठा आती थी । फ़िर वापस आकर दूसरे को ले जाती थी । इस तरह गोद में चङे कुछ कुछ दूर का सफ़र तय कर हम स्कूल पहुँचते थे । यह समय आज से ठीक ( मेरा जन्मदिन - 23 - 3 - 1969 रात 1 बजकर 23 मिनट पर ) 42 साल पहले का था ।
उस समय आवादी बहुत कम थी । और जंगली क्षेत्र बहुत था । भेङिया लोमङी आदि हिंसक जानवरों की भरमार
थी । उस क्षेत्र में साँप भी बहुत थे । खेतों में खङी ऊँची ऊँची फ़सल उस सुनसान में दिल को कंपा देती थी । आप सोचिये । एकदम फ़िल्मी सिचुवेशन रियल लाइफ़ में थी । आप मेरी माँ का संघर्ष कल्पना करिये । पर प्रभु की कृपा इतने विकट हालातों में भी हमें एक चीटीं ने भी नहीं काटा ।
साँपों वाली हवेली - हम जिस हवेली में ऊपर छत के कमरों में रहते थे । उस हवेली में पुरानी व्यवस्था के अनुसार हवेली की सुरक्षा हेतु दस दस फ़ुट के मिट्टी के भराव के कमरे से बने हुये थे ।
इस बात को इस तरह समझिये कि - एक विशाल लम्बी पक्की ईंटों की दीवाल छत की ऊँचाई तक तीन तरफ़ बना ली जाये । फ़िर उस दीवाल के अन्दर मेन गेट का हिस्सा छोङकर दस फ़ुट दूरी पर एक और दीवाल बना ली जाये । और इस तीन तरफ़ा u शेप गैलरी को मिट्टी से भरकर एक मोटी दीवाल जैसा बनाकर तब उसके अन्दर के बङे हिस्से में रिहायशी स्थान कमरे आदि बनाये जाये । ये व्यवस्था इसलिये होती थी कि उस समय के कुछ डाकू आंङा ( सेंध लगाना ) बहुत लगाते थे । अतः डाकू आँङा न लगा सके ।
डाकूओं ने ( शायद मेरे डर के मारे ) तो मेरे सामने कभी आँङा नहीं लगाया । पर बङे बङे साँप और नाग बङी संख्या में आँङा लगाकर उस भराव में " स्नेक कालोनी " बनाकर रहने लगे । इस गेट बन्द कालोनी के गेट उन्होंने जगह जगह खोल ( फ़ोङ ) रखे थे ।
अब हाल यह था कि साँप उस जगह पर हमारे साथ इस तरह रहते थे । जैसे कुछ समय पहले सभी घरों में चूहे जी रहते थे । लेट्रिन जाओ । तो नीचे खड्डी में साँप ( ठंडक की वजह से ) उपले आदि लेने जाओ । तो वहाँ साँप । किचन में कोई बर्तन उठाओ । तो वहाँ साँप । विस्तर बिछाने के लिये खोलो । तो उसमें लिपटा निकल आये साँप । रात में सू सू के लिये जाओ । फ़िर तो 8 - 10 को चाँदनी में टहलता हुआ ही देखो ।
पर - आश्चर्यजनक रूप से उस हवेली में बहुत बच्चे और अन्य महिलायें पुरुष थे । लेकिन किसी को भी कभी नहीं काटा । धोखे से किसी का पैर भी पङ जाये । तो भी कोई बात नहीं थी ।
बङी बहन पर अटैक - रक्षा बंधन के त्यौहार के समय की बात है । भुंजरिया ( सकोरा आदि मिट्टी के बर्तन में गेंहूँ बोने का रिवाज ) बोकर उन्हीं भराव के ऊपर बने कमरे की खिङकी में रख दी थी । उस कमरे के फ़र्श में नागराज ने एक गेट खोल रखा था । मेरी बङी बहन से भुंजरिया लाने को कहा गया । तो उसने डर के मारे मना कर दिया । क्योंकि वो खाली रहने वाला कमरा तो 100% साँपो का ही निवास था ।
तब मेरे क्रोधी पिता ने उसे डपट दिया । और कहा - मैं पीछे खङा हूँ । डर मत । और वे कमरे के गेट पर खङे भी हो गये । पर उनका ध्यान फ़र्श के उस बङे छेद पर नहीं था । इंसानी पदचाप सुनकर 10 फ़ुट लम्बे नागराज ने उस छेद में लगभग 3 फ़ुट ऊपर उठकर लगभग 10 इंची फ़न चौङा कर फ़ुफ़कार मारी ।
मेरी बहन ने समझा कि पिताजी ने खंखारा है । क्योंकि तम्बाकू खाने के कारण वे अकसर ही " हाक..खाक ( थू ) करते रहते थे । इतना सब कुछ महज एक मिनट के ही अन्दर हुआ ।
लेकिन जैसे ही वह पलटी । उसकी चीख निकल गयी । वह बाहर भागी । लेकिन बस डर ही था । नागराजा ने किसी को कुछ नहीं कहा । संभवतः घबराहट और जल्दी में धोखे से मेरी बहन का पैर उसके अधिक नजदीक पङ गया था । फ़िर भी भय से मेरी बहन कुछ दिनों के लिये बीमार हो गयी ।
मैं गुस्से में साँप से बदला लेने का उपाय सोचने लगा । और तभी मुझे मौका मिल गया । हमारे छत के बने कमरे के पास ही पुरानी स्टायल की बनी लेट्रीन थी । जिसमें लेट्रीन 15 फ़ीट नीचे जाकर गिरती थी । और मल स्टोर का मुँह खेत में खुलता था । जिसे मेहतरानी साफ़ कर जाती थी । लेट्रीन गिरने वाली जगह ठंडी रहने से अकसर साँप वहाँ सफ़ायी हो जाने के बाद लेट जाते थे ।
जैसे ही मैंने एक साँप को वहाँ नीचे लेटे हुये देखा । मैं जल्दी से जाकर न लगी होने पर भी उसके ऊपर टट्टी कर
आया । इस तरह एक वीर भाई ने अपनी बहन का बदला ले ही लिया ।
नोट - अगर किसी को इस बात पर विश्वास न आये । तो ये हजारों साल पुरानी बात नहीं है । जो प्रमाणित न हो । ये सभी स्थान कुछ बदलाव के साथ ज्यों के त्यों अभी भी मौजूद हैं ।
जब एक रात डाकू आये - उन दिनों डाकुओं का बङा खौफ़ था । सात आठ आदमी एक दो ऐसी बन्दूक जिससे चिङिया भी मुश्किल से ही मरे । और कुछ पुरानी रामलीला छाप तलवारें । कुछ घर में हुयी शादियों की कटारें और कुछ भाला जैसे हथियार अरेंज कर डाकू बन जाते थे ।
लेकिन उन दिनों के डाकुओं की खासियत थी कि किसी आदमी को थप्पङ भी नहीं मारते थे । बस थोङा धमका देते थे । जिधर औरतें हो । उधर निगाह तक नहीं उठाकर देखते थे । बङे बूङों के पैर छूते थे । बच्चों से भी उन्हें कोई मतलब नहीं था । एक और खासियत थी । किसी भी घर को पूरी तरह नहीं लूटते थे । बस अधिकतम तीस चालीस % । चाहे कितना ही माल भरा हो । अपनी जरूरत का ही लूटते थे ।
डाकू आ गये..डाकू आ गये - हमारी छोटी बहन का जन्म हो चुका था । एक रात अचानक भगदङ मच गयी - डाकू आ गये..डाकू आ गये । डाकू अपने आगमन की सूचना सिर्फ़ एक गोली चलाकर देते थे । और लोग अपनी अपनी बुद्धि अनुसार कोई लेट्रिन में । कोई खेत में । कोई ईंधन रखने की जगह । कोई पशु बाँधने की जगह छुप जाते थे । उनकी गोली से भयंकर और खतरनाक आवाज तो कमबख्त हमारे पङोसी दीवाली और इंडिया के मैच जीतने पर बम फ़ोङकर करते हैं ।
खैर..हम तीनों ही बच्चे छोटे थे । और मेरी ( बहुत डरपोक ) माँ तीनों को ही एक साथ संभाल नहीं सकती थी । दूसरे ( सबसे ) छोटी ( बहन ) को साथ ले जाने में ये खतरा था कि - वो अचानक रोकर डाकूओं को हमारी मौजूदगी की जगह बता सकती थी ।
अतः मेरी माँ ने तुरन्त निर्णय लिया कि डाकू यदि उनकी छोटी को मार भी डालेंगे । तो उनके पास एक लङका एक लङकी बचेंगे । अतः छोटी को बिस्तर पर ही छोङकर उन्होंने बङी बहन की उंगली पकङी । और मुझे गोद में उठाकर हवेली से बाहर कंडे ( उपले ) ईंधन रखने के स्टोर में आकर छुप गयीं । खुदा का शुक्र है । डाकुओं ने छोटी को छुआ तक नहीं । और वो आज भी जीवित है ।
उन दोनों ( रहने और स्कूल ) गाँवो की यादें बेहद लुभावनी है । वहाँ बहुत से पोखरें बगिया खलिहानी आदि ऐसे स्थान थे । जिनका जिक्र आप मेरी प्रेत आदि अन्य कहानियों में पाते हैं । इसी स्थान पर मुझे एक दिव्य अनुभव हुआ था ।
आगे कुँआ तो पीछे खाई - कुछ दिनों बाद ही मेरे पिता का ट्रान्सफ़र एक नहर कोठी के लिये हो गया । और सरकारी रूल के मुताविक सरकारी नौकरी में लगे पति पत्नी का एक ही जगह ट्रांसफ़र होने का नियम है । मेरी माँ का भी ट्रांसफ़र भी वहीं पास के स्कूल में हो गया ।
उस हवेली से भी चार कदम आगे - जंगल में बनी ये कोठी और कर्मचारियों के आवास किसी भुतहा फ़िल्म की याद दिलाते थे । हमारे आवास के एक तरफ़ कुछ ही दूरी पर धङधङाती हुयी दिल को कंपा देने वाली गंग नहर बहती थी । और दूसरी तरफ़ दो सौ मीटर की दूरी पर तीस फ़ुट से भी अधिक चौङा बम्बा । इन दोनों रावण कुम्भकरण के बीच में हम लोग । इसी बम्बे में डूबकर मेरी सबसे छोटी बहन मर गयी । और उसने फ़िर से जन्म लिया । उसी ने इसलिये कि - मरने के बाद वह बराबर माँ को स्वपन देती रही । और दुबारा ठीक वैसी ही रूप रंग में जनमी । पूर्व जन्म और अपने मरने की घटना भी उसने बोलना शुरू करने पर बतायी ।
मेरे पिता थोङे क्रोधी टायप के रहे हैं । एक दिन वे अपने साथियों के साथ हम सबको रात में अकेला छोङकर 40 किमी दूर नुमाइश देखने चले गये । मेरी बहुत डरपोक माँ ने वह रात कैसे उस डरावने जंगल में काटी होगी । आप कल्पना कर सकते हैं । हालांकि दूसरे कर्मचारियों के भी क्वार्टर थे । पर सब दूर दूर बने थे । हम बच्चे तो सो गये । माँ रात भर दरबाजा बन्द किये डर के मारे जागती रही । लघुशंका भी उन्होंने बर्तन में कमरे में ही की ।
वहाँ आम के ढेरों पेङ इतने घने थे कि चिलचिलाती दोपहर में भी शाम का अहसास होता था । उन्हीं दिनों एक छोटा हवाई जहाज वहाँ क्रेश हुआ था । यहाँ मुझे दूसरा दिव्य अनुभव हुआ ।
*** अभी खत्म नही हुआ है ।
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12 जुलाई 2011
कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन
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