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01 अक्टूबर 2011

क्या सुगन्ध को खोज सकते हैं - मोहिन्दर रंधावा

प्रिय कुलश्रेष्ठ जी ! सत श्री अकाल । कुलश्रेष्ठ जी ! मैं मोहिन्दर रंधावा आपके जबाब के लिये धन्यवाद करता हूँ । मैंने जो आपसे जानने की जो जिज्ञासा की थी । वो मेरे अनुसार पूरी नहीं हुयी । शायद मैं जो पूछना चाहता था । वो आप तक पहुँचा नहीं सका । मेरा आपको परेशान करने का कोई इरादा नहीं ।आपका शायद ऐसे लोगों से वास्ता ज्यादा पङता है । इसलिये आपकी सोच में ये आया । अब बात करता हूँ । आपसे प्रश्न की । खोज सत्य की कैसे हो सकती है । ये कोई वस्तु नहीं । जिसकी कोई खोज हो । इसे तो जाना ही जा सकता है । आपने उदाहरण देकर मुझे भृमित करने की कोशिश की है । क्या सुगन्ध को खोज सकते हैं । उसे तो केवल महसूस ही किया जा सकता है । आपने लिखा है - पहले खोजना । फ़िर जानना पङता है । ये बातें पदार्थों के लिये सही हैं । पर जो पदार्थों से ऊपर है । जैसे आत्मा । उन्हें कैसे खोजा जा सकता है ? कृपया करके सीधा सा उत्तर दें । मोहिन्दर रंधावा । भिलाई । ई मेल से ।
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सत श्री अकाल । मोहिन्दर जी ! सत्यकीखोज पर आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बहुत खुशी हुयी 


। आशा है । आपके साथ सतसंग का ये सफ़र यूँ ही जारी रहेगा ।
खैर..आईये आपके साथ बातचीत का सिलसिला आगे बढाते हैं ।
पहले मैं आपके मूल प्रश्न से अलग बिन्दु पर उत्तर दे दूँ । वास्तव में मैं कभी परेशान नहीं होता । बल्कि ऐसे हँसी मजाक करने वाले ( उस लेख के अनुसार ) चुटकी लेने वाले लोग मुझे खासे पसन्द हैं । गम्भीर रहना मुझे अच्छा नहीं लगता । बुद्ध ने काफ़ी कठिनाई से ज्ञान प्राप्त किया था । लेकिन बाद में उन्होंने लोगों से यही कहा - हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम । यानी हँसते खेलते हुये ध्यान का अभ्यास करो । बुद्ध कहना चाहते थे । हरेक कोई मेरी जैसी कठिनाई नहीं उठा सकता । और उठाने की कोई आवश्यकता भी नहीं है । मेरे अनुभव से तुम लाभ उठाओ । और सहज ही सुरति शब्द योग का अभ्यास करो । उसे जानो ।
यह बात सिर्फ़ बुद्ध पर ही नहीं । जीवन की प्रत्येक चीज में लागू होती है । अब जरूरी नहीं कि हरेक कोई ऐडीसन की तरह बल्ब का आविष्कार करके ही बल्ब जलाये । आज वो टेकनीक उपलब्ध है । और महज 10 रुपये में बल्ब उपलब्ध है । आपको बस उसे खरीद कर होल्डर में लगाना मात्र है ।
मेरे कहने का आशय यह है कि सत्यकीखोज फ़ैमिली का निर्माण मैंने इसी डिजायन में किया है कि यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति एक परिवार की तरह मित्रवत व्यवहार करे । और निसंकोच अपनी बात कह सके । दूसरे मैंने कई बार स्पष्ट किया है । कोई भी प्रश्न आपका नितांत व्यक्तिगत हो सकता है । पर मेरा उत्तर सर्वजन हिताय । 


बहुउद्देशीय और दूर की सोच वाला होता है । जिससे बहुत लम्बे समय तक लोग लाभ उठायें । इसलिये प्लीज मेरा सभी लोगों से निवेदन है । आप बात में छुपी भावना को समझें । न कि शब्दों को पकङें ।
अब आईये । आपके मूल प्रश्न पर बात करते हैं । वास्तव में मैंने उदाहरण देकर आपको भृमित करने की कोशिश नहीं की । उदाहरण अपनी जगह स्थिति अनुसार एकदम सटीक हैं । पर आपका प्रश्न दरअसल थ्योरी का विषय कम प्रयोग का अधिक है । इसलिये ऐसा लगना स्वाभाविक ही है ।
आईये आपके इन्ही शब्दों को लेते हैं - ये बातें पदार्थों के लिये सही हैं । आत्मा के लिये नहीं ।
अब बात वही हो जाती है । पदार्थ कहाँ से आये ? ये पूरा खेल । अखिल सृष्टियाँ । सम्पूर्ण निर्माण जिस विराट माडल में हो रहा है । वह समस्त परमात्मा ( मूल आत्मा ) से ही है । फ़िर एक धूल का तुच्छ कण भी उससे अलग नहीं हो सकता है । मेरे कहने का मतलब ( जो मैंने पहले भी कई बार कहा है ) है । अक्सर लोग एक बहुत ही गलत बात कहते हैं कि - परमात्मा शब्दों वाणी का विषय नहीं । बल्कि अनुभव जन्य है । जबकि मेरा मानना है - सिर्फ़ परमात्मा ही नहीं । प्रत्येक चीज के बारे में बिना अनुभव के नहीं बताया जा सकता । चाहे वह छोटी से छोटी हो । या अति विशाल हो ।
आप एकदम सामने कप में तैयार रखी चाय के बारे में भी बिना अनुभव नहीं बता सकते कि वह कैसी है ?
चाय कैसी है ( प्रश्न उठा ) पी के देखते हैं ( भाव बना ) कप उठाकर सिप किया ( क्रियात्मक प्रयोग ) टेस्ट ज्ञात हुआ 


( अनुभव ) अब अगर चाय अच्छी ( आनन्द ) लगी । तो आपको उससे सम्बंधित मूल ( जङ ) ज्ञान ( चाय बनाना ) जानना ही होगा । इस चाय को सिद्ध ( पौधे को उगाने से चाय पत्ती बनाने तक । ) करना ही होगा । तब आप इस पर अधिकार ( योग द्वारा विभिन्न उपाधि प्राप्त होना ) प्राप्त कर सकते हैं ।
अब मेरा सिद्धांत तो यही कहता है । ये पहले 4 मुख्य स्टेप किये बिना आप किसी भी चीज के बारे में नहीं जान सकते । चाहे वह परमात्मा हो । या कैडबरी चाकलेट । अब दूसरे लोगों के पास कोई जादू हो । तो कह नहीं सकता । अब इसी बात को आगे देखिये । आप उसी चाय के टेस्ट को अपने मित्र बंसल जी को कितने ही अधिक से अधिक शब्दों में बताये । उनकी जीभ उस स्वाद का सटीक जायका प्राप्त नहीं कर सकती । उन्हें भी चाय को पीना ही होगा ।
लेकिन परमात्मा और भौतिक वस्तुओं में एक बात में तो काफ़ी बङा फ़र्क है । आप चाय को पीकर शब्दों वाणी द्वारा काफ़ी हद तक समझा सकते हैं । जो समझ में आ भी सकता है । पर परमात्मा के बारे में समझाना और समझना बहुत बहुत कठिन है । इसीलिये इसको मन वाणी से परे कहा गया है । क्योंकि शाश्वत उच्च स्थितियों में द्वैत खत्म हो जाता है । यानी जो वहाँ है । सिर्फ़ वही उसको जान सकता है । यदि वहाँ द्वैत की स्थिति होती । तो फ़िर निश्चय ही द्वैत रूपी संसार में भी उसको समझाया जा सकता था ।
अब जैसा कि आपने कहा कि मैं अपना मूल प्रश्न या उसमें छिपा आशय आप तक पहुँचा नहीं पाया । ऐसा नहीं है । मैं तुरन्त ही आपका आशय समझ गया था कि - आप दरअसल क्या कह रहे हैं ? आपका कहना था - आत्मा या परमात्मा या शाश्वत सत्य दरअसल खोजने की नहीं जानने की चीज है । उसको खोजा नहीं जा सकता । जबकि मेरा 100% मानना है । जानने से पहले । अनुभव से पहले जो यात्रा करनी होती है । वह खोज ही होती है । खोज के विभिन्न पङाव तय करने ही होते हैं । तब वास्तविक मंजिल की प्राप्ति होती है । सही है ना । आपका प्रश्न में ठोस बात यही है । और मेरे उत्तर में अभी भी ठोस बात यही है ।
यहाँ एक बहु प्रचलित बात को लेते हैं । तमाम सन्त वाणी । धार्मिक गृन्थ । एक सुर में यही बात कहते हैं कि - परमात्मा आपके अन्दर ही विराजमान है । बस उसको जानना है ।..अब आप बताईये । अपने अन्दर की ही बात या स्थिति को इंसान क्यों नहीं युगों से जान पा रहा । महसूस कर पा रहा । क्यों हिमालय आदि पर्वतों में हजारों लाखों साधु तपस्वी अपने शरीर को इसी लक्ष्य प्राप्ति में गला देते हैं । ये तो तपस्वियों का सच है । फ़िर आम आदमी के बारे में क्या कहा जाये ? सहज सोचा जा सकता है ।
सन्त मत में सबसे अधिक प्रचलित उदाहरण दूध में छिपे घी का दिया जाता है । दूध में घी है । ये सत्य है । और सिद्ध भी है । पर फ़िर भी दूध में आप घी को न तो महसूस कर सकते हैं ।  और न ही उपयोग में ला सकते हैं । दूध में छुपे बहुमूल्य घी को जानने के लिये । प्राप्त करने के लिये । उपयोग में लाने के लिये । आपको दूध से घी तक की ( खोज ) यात्रा से हर हालत में गुजरना ही होगा । तब आप दूध से घी के इस रूपान्तरण के बीच को क्या नाम देगें ?
अब आपकी दूसरी बात को लेते हैं - क्या सुगन्ध को खोज सकते हैं । उसे तो केवल महसूस ही किया जा सकता है ।
गहराई से सोचिये । सुगन्ध को भी खोजना ही होता है । इस उदाहरण के लिये आप कल्पना करिये । आपके बगल वाले घर में बहुत बेहतरीन खुशबू की ढेरों अगरबत्तियाँ जल रही हैं । या फ़िर परफ़्यूम ही बिखर गया है । अब आपको हल्की हल्की खुशबू ( आत्म जिज्ञासा । कभी कभी स्वयँ बन जाने वाली शून्य 0 स्थिति । गहरी नींद में तुरियातीत अवस्था में जाना । या कुछ लोगों को पूर्व संस्कारों से हल्की आत्मिक आनन्द की अनुभूति अनायास प्राप्त होना ) आ रही है । सवाल ये है । ये सिर्फ़ आपको हल्की सी झलक मिली । और झलक भी तब जब आप भाग्यवशात उस खुशबू ( यहाँ पूर्व जन्म के संस्कारों से आत्मज्ञान का बोध होना ) के नजदीक थे । अब आप इसको रियल रूप से कैसे महसूस कर सकते हैं ?
जाहिर है । आपको खुशबू ( आत्मस्थिति ) वाले स्थान ( सन्त के पास ) तक जाना होगा । उसकी जानकारी ( सतसंग ) करनी होगी । फ़िर उसको प्राप्त ( दीक्षा और नाम सुमरन ) करने का प्रयास करना होगा । अब आप वास्तविक रूप में उस खुशबू के अधिकारी ( पात्रता और प्राप्ति ) हुये । तब आप उसको सही रूप में महसूस ( स्वरूप स्थिति ) कर सकते हैं ।
एक और उदाहरण लीजिये । आपके हाथ में ही गुलाब का फ़ूल है । मगर इसकी खुशबू का पूर्ण आनन्द प्राप्त करने के लिये आपको इसको बार बार सूंघने की क्रिया करते हुये आनन्द को अधिक और अधिक महसूस करना होगा । तभी आप रियल इसकी खुशबू की गहराई समझेंगे । तो ये हाथ के गुलाब को बार बार सूंघकर आनन्द के चरम तक पहुँचने की क्रिया । अगर गहराई से विचार करें । तो खोज ही है ।
तो देखिये । बात वहीं आ जाती है । इस सत्य को वास्तविक रूप में जानने के लिये आपको खोज यात्रा करनी ही होगी । चलिये मैं जिद नहीं करता । दबाव नहीं देता । आप जैसे भी चाहें । explain करके मुझे और हमारे पाठकों को बतायें कि - आप इस बारे में क्या अलग विचार रखते हैं ? संभवत आपके विचार में कोई नई चेतना नई जागृति वाली बात हो । और आप निश्चित रहे । मुझे न कोई बात बुरी लगती है । और न ही मैं कोई परेशानी महसूस करता हूँ । हमारी आपकी बातचीत बहुत से अन्य लोगों के लिये संभावनाओं के नये द्वार खोलती है । अतः ऐसी कोई बात नहीं । जितनी बार भी आपके मन में प्रश्न उठे । आप बार बार निसंकोच पूछ सकते हैं । मैं अपने सभी पाठकों से भी आगृह करता हूँ । वे भी अगर इस बात पर कुछ अलग सोचते हों । तो कृपया अपने विचारों से अवश्य अवगत करायें ।
आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326